पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में गठित 16वें वित्त आयोग (16th Finance Commission) ने वर्ष 2026–31 के लिए अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की। इसने कर हस्तांतरण और अनुदानों में व्यापक सुधारों की सिफारिश की, जिससे राजकोषीय संघवाद, समानता तथा केंद्र–राज्य संबंधों पर विवाद उत्पन्न हो गया।
भारत में वित्त आयोग का परिचय
- वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है, जिसका गठन अनुच्छेद 280 के तहत संघ और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण की सिफारिश करने के लिए किया जाता है।
- इसका उद्देश्य सहकारी राजकोषीय संघवाद को बढ़ावा देना, ऊर्ध्वाधर (Vertical) और क्षैतिज (Horizontal) राजकोषीय असंतुलनों को समाप्त करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि राज्यों को अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों।

संवैधानिक आधार
- अनुच्छेद 280: इसके अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष में वित्त आयोग का गठन किया जाता है।
- अनुच्छेद 270: यह केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 275: यह संघ को वित्तीय सहायता की आवश्यकता वाले राज्यों को अनुदान (Grants-in-Aid) प्रदान करने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 281: इसके अंतर्गत राष्ट्रपति को आयोग की सिफारिशों को एक व्याख्यात्मक ज्ञापन (Explanatory Memorandum) सहित संसद के समक्ष प्रस्तुत करना होता है।
16वाँ वित्त आयोग (FC-16)
- उद्देश्य: करों के हस्तांतरण (Tax Devolution), अनुदान (Grants-in-Aid) तथा बजटीय स्थिरता और स्थानीय शासन (local governance) को सुदृढ़ बनाने के लिए पहलों पर सिफारिश करना।
- इसने 15वें वित्त आयोग की सिफारिश के अनुरूप विभाज्य कर पूल (Divisible Pool) में राज्यों की हिस्सेदारी 41% पर यथावत बनाए रखी।

FC-16 की प्रमुख सिफारिशें
- 41% ऊर्ध्वाधर कर हस्तांतरण बरकरार: कई राज्यों द्वारा इसे 50% किए जाने की मांग के बावजूद राज्यों की हिस्सेदारी 41% पर ही बरकरार रखी गई।
- अनुदानों का व्यापक पुनर्गठन: कुल अनुदान ₹10.1 लाख करोड़ (15वें वित्त आयोग) से घटाकर ₹9.47 लाख करोड़ कर दिए गए।
- वित्त आयोग के कुल हस्तांतरण में अनुदानों की हिस्सेदारी 19.4% से घटकर 8.3% रह गई।
- राजस्व घाटा अनुदान (RDGs), क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान तथा राज्य-विशिष्ट अनुदान समाप्त कर दिए गए।
- अनुदानों को मुख्यतः स्थानीय निकायों तथा आपदा प्रबंधन तक सीमित कर दिया गया।
- प्रदर्शन-आधारित हस्तांतरण पर अधिक जोर: स्थानीय निकायों के लिए लगभग ₹7.2 लाख करोड़ आवंटित किए गए।
- धनराशि का वितरण जल एवं स्वच्छता के परिणामों, राजस्व जुटाने तथा विधिवत लेखा-परीक्षित (Audited) खातों जैसी शर्तों के आधार पर किया जाएगा।
- हस्तांतरण सूत्र में परिवर्तन: आय दूरी (Income Distance) का भार 45% से घटाकर 42.5% कर दिया गया।
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान के लिए 10% भार दिया गया है, जिससे आर्थिक रूप से अधिक मजबूत राज्यों को प्रोत्साहन मिलेगा।
- उपकर (Cesses) और अधिभार (Surcharges): आयोग ने एक ‘ग्रैंड बार्गेन’ (Grand Bargain) का सुझाव दिया है, जिसके तहत उपकरों को धीरे-धीरे विभाज्य कर पूल में शामिल किया जाए, हालांकि इसके लिए कोई बाध्यकारी व्यवस्था प्रस्तावित नहीं की गई है।
मुख्य चिंताएँ
- समानीकरण (Equalisation) की भूमिका कमजोर होना: राजस्व घाटा अनुदान (RDGs) को समाप्त करना एक बड़ा परिवर्तन है।
- अनुच्छेद 275 के तहत दिए जाने वाले अनुदानों का उद्देश्य राज्यों की उन विशिष्ट राजकोषीय बाधाओं को दूर करना था, जिन्हें केवल करों के सूत्र-आधारित वितरण से दूर नहीं किया जा सकता।
- समानता (Equity) पर दक्षता (Efficiency) को प्राथमिकता: आयोग का मानना है कि समानीकरण का स्थान बेहतर राजकोषीय अनुशासन ले सकता है। लेकिन राज्यों की राजकोषीय क्षमता, भौगोलिक परिस्थितियाँ, विकास स्तर तथा जनसांख्यिकीय एवं सामाजिक क्षेत्र की जिम्मेदारियाँ काफी भिन्न हैं।
- इससे क्षेत्रीय असमानता और अधिक बढ़ सकती है।
- वंचित राज्यों पर दोहरी मार: विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों तथा पश्चिम बंगाल जैसे बजटीय कठिनाइयों से जूझ रहे राज्यों को कर हस्तांतरण में कमी और क्षतिपूरक अनुदानों के समाप्त होने से नुकसान हो सकता है।
- आय दूरी के भार में कमी के साथ यह उनकी मौजूदा राजकोषीय कठिनाइयों को और बढ़ा सकती है।
- राजकोषीय अनुशासन में असमानता: आयोग ने विभाज्य कर पूल से बाहर रहने वाले उपकरों और अधिभारों के प्रति उदार रुख अपनाया है, जबकि नैतिक जोखिम (Moral Hazard) से बचने के आधार पर राजस्व घाटा अनुदान समाप्त कर दिए गए हैं।
- राजकोषीय स्वायत्तता में कमी: प्रदर्शन-आधारित भुगतान जवाबदेही तो बढ़ाते हैं, लेकिन वे अतिरिक्त शर्तें भी लगाते हैं, जिससे व्यय प्राथमिकताएँ तय करने में राज्यों की स्वायत्तता सीमित हो जाती है।
आगे की राह: भारत के राजकोषीय संघवाद को सुदृढ़ बनाना
- संरचनात्मक रूप से पिछड़े राज्यों के लिए लक्षित निधियों को बनाए रखा जाए, ताकि समानीकरण के सिद्धांत को पुनर्स्थापित किया जा सके।
- दक्षता और समानता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, ताकि प्रोत्साहन सहकारी संघवाद के संवैधानिक दायित्वों के विपरीत न हों।
- उपकरों और अधिभारों को चरणबद्ध तरीके से विभाज्य कर पूल में शामिल कर पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ाई जाए।
- हस्तांतरण के ऐसे मानदंड अपनाए जाएँ जो राज्यों की राजकोषीय क्षमता, भौगोलिक परिस्थितियों तथा विकास संबंधी अंतर को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित करें।
- राज्यों की बजटीय स्वायत्तता बढ़ाई जाए, लेकिन अत्यधिक शर्तों के बजाय परिणाम-आधारित निगरानी के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
- ऐसी विभेदित रणनीति अपनाई जाए जो अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करे, लेकिन ऐतिहासिक या संरचनात्मक बाधाओं से बंधे राज्यों को दंडित न करे।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारतीय राजकोषीय संघवाद में प्रदर्शन-आधारित राजकोषीय हस्तांतरण और समानीकरण (Equalisation) के सिद्धांत के बीच उभरते तनाव का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: TH
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