सेंगोल
पाठ्यक्रम: जीएस-1/इतिहास
चर्चा में क्यों?
नवीन रूप से जारी एनसीआरटी कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक, “अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी एण्ड बियॉन्ड – भाग-2” में सेंगोल को न्यायपूर्ण शासन के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है।
सेंगोल (या चेंगोल)

- यह एक पारंपरिक तमिल राजदंड है, जो राजतंत्र, धार्मिकता, न्याय और वैध सत्ता का प्रतीक है।
- ऐतिहासिक रूप से यह धर्मपरायण राजसत्ता, राजकीय अधिकार की वैधता तथा शासक की दैवी और नैतिक आदर्शों के प्रति जवाबदेही का प्रतीक रहा है।
- इसे महान चोल साम्राज्य में कर्तव्य, सेवा और राष्ट्रभावना के मार्ग का प्रतीक माना जाता था।
- इसकी उत्पत्ति तमिलनाडु में हुई और यह शासकों का एक औपचारिक राजचिह्न था।
- उदाहरण के लिए, यह मदुरै नायकों के बीच देवी मीनाक्षी से जुड़ा हुआ था और बाद में इसे राजसिंहासन कक्ष में रखा जाने लगा, जो राजा के कार्य और उसके दायित्वों को दर्शाता था।
- रामनाथपुरम के सेतुपति शासकों ने भी राजा बनने पर रामेश्वरम मंदिर के पुजारियों से धार्मिक रूप से पवित्र किया हुआ सेंगोल प्राप्त किया था।
- राजाजी और अधीनमों के संतों के मार्गदर्शन में यह सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक बन गया।
NCERT द्वारा वर्णन
- NCERT सेंगोल को न्यायपूर्ण शासन के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में वर्णित करता है और उल्लेख करता है कि शैव अधीनम के संतों ने 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय जवाहरलाल नेहरू को इसे प्रस्तुत किया था, जो ब्रिटिश शासन से एक स्वतंत्र भारतीय राज्य को सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक था।
- यह विवरण संस्कृति मंत्रालय द्वारा सेंगोल के उस वर्णन के अनुरूप है, जिसमें इसे नैतिक रूप से संचालित राजसत्ता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- राजमोहन गांधी सहित इतिहासकारों ने कहा है कि नेहरू या सी. राजगोपालाचारी के दस्तावेजों और लेखन में ऐसा कोई अभिलेख नहीं मिलता, जो यह प्रमाणित करे कि सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का औपचारिक प्रतीक था।
स्रोत: TH
वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
चर्चा में क्यों?
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने अप्रैल 2024 से मार्च 2025 की संदर्भ अवधि (अर्थात वित्तीय वर्ष 2024-25) के लिए वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण (ASI) के परिणाम जारी किए हैं।
वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण
- इसका संचालन सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा किया जाता है।
- यह देश के सबसे महत्वपूर्ण सर्वेक्षणों में से एक है और औपचारिक विनिर्माण क्षेत्र को शामिल करता है।
- इसका प्रमुख उद्देश्य विभिन्न विनिर्माण उद्योगों की संरचना, वृद्धि और संगठन में होने वाले परिवर्तनों की गतिशीलता के बारे में उत्पादन, सकल मूल्य वर्धन, रोजगार, पूंजी निर्माण तथा कई अन्य मापदंडों के संदर्भ में सार्थक जानकारी उपलब्ध कराना है।
- इसके आँकड़े नीति-निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आधार के रूप में कार्य करते हैं, राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी के संकलन में सहायता करते हैं तथा विभिन्न मंत्रालयों की सूचना संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। साथ ही, ये हितधारकों को सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाते हैं।
प्रमुख निष्कर्ष
औद्योगिक क्षेत्र की वृद्धि
- भारत के औद्योगिक क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई। कारखानों की संख्या 2.6% बढ़कर 2.7 लाख हो गई, जबकि कारखानों में रोजगार 7.3% बढ़कर 1.67 करोड़ हो गया।
- औसत कारखाना आय 5.3% बढ़कर ₹2.28 लाख हो गई, लेकिन झारखंड एकमात्र ऐसा राज्य रहा जहाँ गिरावट दर्ज की गई। वहाँ औसत वेतन 5.2% घटकर ₹3.04 लाख रह गया।
- उत्तर प्रदेश औद्योगिक वृद्धि के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। यहाँ कारखानों की संख्या 12.8% बढ़कर 24,964 हो गई और श्रमिकों की संख्या में 14% की वृद्धि हुई, जबकि मजदूरी में 6.7% की वृद्धि हुई।
- तमिलनाडु में कारखानों (41,221) और श्रमिकों (26.1 लाख) की संख्या सबसे अधिक रही।
- गुजरात में कारखानों की संख्या में मामूली 1% की गिरावट आई, जिससे राष्ट्रीय हिस्सेदारी घटकर 12.4% रह गई और मजदूरी में केवल 2% की वृद्धि दर्ज की गई।
- बिहार में बड़े राज्यों के बीच मजदूरी में सबसे अधिक 16.7% की वृद्धि हुई, हालांकि वहाँ कारखानों में कार्यरत श्रमिकों की संख्या में 2% की गिरावट आई।
सकल मूल्य वर्धन और रोजगार संबंधी आँकड़े
- सकल मूल्य वर्धन (GVA) ₹2458.3 हजार करोड़ से बढ़कर ₹2694.2 हजार करोड़ हो गया, जो औद्योगिक मूल्य वर्धन में निरंतर 9.59% की वृद्धि को दर्शाता है।
- 2024-25 में महाराष्ट्र ने सबसे अधिक GVA दर्ज किया, जिसके बाद गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश का स्थान रहा।
- पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार का विस्तार जारी रहा। पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों की अनुमानित संख्या ASI 2023-24 में 1.96 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में 2.10 करोड़ हो गई, जिसमें 7.19% की वृद्धि हुई।
- तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हरियाणा 2024-25 में विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों की संख्या के मामले में पाँच प्रमुख राज्य रहे।
स्रोत: IE
राज्य और केंद्रीय करों एवं शुल्कों की प्रतिपूर्ति (RoSCTL) योजना
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
चर्चा में क्यों?
वस्त्र मंत्रालय ने परिधान/कपड़ों और मेड-अप्स के निर्यात के लिए RoSCTL योजना को मौजूदा दरों और प्रचलित नियमों के तहत 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2026 तक तीन महीने की अतिरिक्त अवधि के लिए बढ़ा दिया है।
राज्य और केंद्रीय करों एवं शुल्कों की प्रतिपूर्ति (RoSCTL) योजना
- इसे वस्त्र मंत्रालय द्वारा 2019 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य ऐसी सभी अंतर्निहित राज्य और केंद्रीय करों एवं शुल्कों की प्रतिपूर्ति करना है, जो किसी अन्य योजना के अंतर्गत शामिल नहीं हैं।
- यह निर्यात को शून्य-दर वाला बनाने के सिद्धांत पर आधारित है, जिससे निर्यात किए गए उत्पादों में शामिल उन करों की वापसी सुनिश्चित होती है, जिनकी पहले प्रतिपूर्ति नहीं हुई है।
- यह वस्त्र निर्यात क्षेत्र के लिए एक प्रमुख सहायता तंत्र के रूप में कार्य करती है, जिससे विशेष रूप से MSME निर्यातकों को लाभ मिलता है, जो इसके लाभार्थियों का एक बड़ा हिस्सा हैं।
- यह भारत के परिधान और मेड-अप्स निर्यात की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाती है।
प्रगति और महत्व
- इस योजना से 2025-26 के दौरान 444 से अधिक जिलों में लगभग 15,400 निर्यातकों को सहायता मिली, जिनमें अधिकांश लाभार्थी MSME हैं।
- योजना का व्यापक भौगोलिक विस्तार विकेंद्रित विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने तथा छोटे और मध्यम निर्यातकों की वैश्विक बाजारों में भागीदारी बढ़ाने में इसके महत्व को रेखांकित करता है।
- योजना के विस्तार से निर्यातकों के लिए नीति की निरंतरता और पूर्वानुमेयता को बढ़ावा मिलेगा तथा बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा वाले व्यापारिक वातावरण में भारत के श्रम-प्रधान और मूल्य-वर्धित वस्त्र एवं मेड-अप्स क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने में सहायता मिलेगी।
स्रोत: PIB
आसियान-भारत समुद्री अभ्यास (AIME-2026)
पाठ्यक्रम: जीएस-3/रक्षा
चर्चा में क्यों?
आसियान-भारत समुद्री अभ्यास (AIME-2026) का दूसरा संस्करण फिलीपींस के सुबिक बे में शुरू हुआ।
आसियान-भारत समुद्री अभ्यास
- यह भारत और आसियान देशों की समुद्री सेनाओं को पेशेवर, परिचालन और सामाजिक गतिविधियों के लिए एक साथ लाता है, जिसका उद्देश्य आपसी समझ, सहयोग और अंतर-संचालनीयता को बढ़ाना है।
प्रमुख विशेषताएँ
- बंदरगाह चरण में पेशेवर, परिचालन और सामाजिक गतिविधियों की एक श्रृंखला शामिल होगी, जिसमें विषय विशेषज्ञों के बीच विचार-विनिमय, खेल एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ, सामुदायिक सहभागिता और परिचालन समन्वय शामिल हैं। इसके बाद समुद्री चरण शुरू होने से पहले समुद्र-प्रस्थान पूर्व जानकारी-सत्र आयोजित किया जाएगा।
- अभ्यास इसके बाद समुद्री चरण में प्रवेश करेगा, जिसमें भाग लेने वाली समुद्री सेनाएँ समन्वित समुद्री अभ्यास और परिचालन गतिविधियाँ करेंगी।
- समुद्री चरण का उद्देश्य व्यावहारिक प्रशिक्षण और समुद्र में समन्वित गतिविधियों के माध्यम से पेशेवर समझ, परिचालन समन्वय और अंतर-संचालनीयता को बढ़ाना है।
महत्व
- AIME-2026 में INS सह्याद्रि और INS कुठार की भागीदारी भारतीय नौसेना की समुद्री साझेदारियों को मजबूत करने और ASEAN की समुद्री सेनाओं के साथ व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देने की निरंतर प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है।
- यह अभ्यास भारत की एक्ट ईस्ट नीति और MAHASAGAR (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र उन्नति) के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए आयोजित किया जा रहा है।
स्रोत :PIB
सभी अनिवार्य रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
चर्चा में क्यों?
आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने विपणन सत्र 2027-28 के लिए सभी अनिवार्य रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि को मंजूरी दी है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)
- सरकार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर 22 अनिवार्य फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित करती है। इसमें संबंधित राज्य सरकारों तथा केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के विचारों को भी ध्यान में रखा जाता है।
- इसके अतिरिक्त, तोरिया और छिलका उतरे नारियल का MSP क्रमशः सरसों एवं रेपसीड तथा खोपरा के MSP के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

MSP के निर्धारण के कारक
- CACP महत्वपूर्ण कारकों पर विचार करता है, जैसे—उत्पादन की लागत, घरेलू और वैश्विक बाजारों में विभिन्न फसलों की समग्र मांग-आपूर्ति की स्थिति, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कीमतें, फसलों के बीच मूल्य समानता, कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच व्यापार की शर्तें, मूल्य नीति का अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव तथा उत्पादन लागत पर न्यूनतम 50 प्रतिशत का लाभांश।

स्रोत : TH
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
पाठ्यक्रम: जीएस-2/सामाजिक न्याय
सन्दर्भ
- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा है कि सामाजिक मीडिया पर जातिसूचक गालियाँ अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधानों को लागू कर सकती हैं। न्यायालय ने कहा कि अधिनियम के अंतर्गत “सार्वजनिक दृष्टि” को केवल भौतिक स्थानों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के बारे में
- इस अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के सदस्यों के विरुद्ध अत्याचारों को रोकना है।
- यह पीड़ितों की सुरक्षा के लिए विशेष न्यायालयों और उपायों का भी प्रावधान करता है।
- यह अधिनियम जाति-आधारित दुर्व्यवहार से लेकर सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार तथा हिंसा तक के अपराधों को शामिल करता है।
- कानूनी प्रावधान: SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को जाति के नाम से जानबूझकर अपमानित, डराने या गाली देने को अपराध बनाती हैं, यदि यह कृत्य “सार्वजनिक दृष्टि में किसी भी स्थान पर” किया गया हो।
‘सार्वजनिक दृष्टि’ की न्यायिक व्याख्या
- हिमांशु वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “सार्वजनिक दृष्टि” से आशय ऐसे स्थान से है जहाँ जनता के सदस्य कथित कथन को देख या सुन सकते हों।
- सूरज वी. सुकुमार बनाम केरल राज्य (2022): केरल उच्च न्यायालय ने कहा कि SC/ST अधिनियम की व्याख्या तकनीकी नवाचारों के संदर्भ में की जानी चाहिए।
- न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट सामग्री की उपलब्धता और उसके प्रसार के कारण सार्वजनिक दृष्टि की अवधारणा डिजिटल क्षेत्र में भी लागू की जा सकती है।
- रामकृष्ण चौहान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026): सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि किसी कथित जाति-संबंधी घटना का केवल विद्यालय परिसर में घटित होना सार्वजनिक दृष्टि की आवश्यकता को पूरा नहीं करता।
- उन परिस्थितियों की जाँच करना आवश्यक है जिनमें कथित टिप्पणियाँ की गईं तथा यह भी देखना आवश्यक है कि क्या उन्हें जनता के सदस्यों ने देखा या सुना था।
स्रोत: IE
कॉरपोरेट औसत ईंधन अर्थव्यवस्था (CAFE-3) मानदंडों का तीसरा चरण
पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन, जीएस-3/पर्यावरण
सन्दर्भ
- केंद्र सरकार ने यात्री वाहनों के लिए कॉरपोरेट औसत ईंधन अर्थव्यवस्था (CAFE-3) मानदंडों के तीसरे चरण को अधिसूचित किया है, जो 1 अप्रैल 2027 से 31 मार्च 2032 तक प्रभावी होंगे।
CAFE मानदंड क्या हैं?
- कॉरपोरेट औसत ईंधन अर्थव्यवस्था (CAFE) मानदंड किसी वाहन निर्माता के यात्री-वाहन बेड़े की औसत ईंधन खपत और CO₂ उत्सर्जन को नियंत्रित करते हैं, न कि प्रत्येक व्यक्तिगत वाहन के लिए समान दक्षता आवश्यकता निर्धारित करते हैं।
- इसका उद्देश्य निर्माताओं को अधिक ईंधन-कुशल और कम उत्सर्जन वाले वाहन बनाने के लिए प्रोत्साहित करना है, जिससे पेट्रोलियम की खपत और परिवहन क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन को कम किया जा सके।
नए मानदंड क्या हैं?
- नए मानदंडों के तहत ईंधन-खपत का मानक 2027-28 में 3.996 लीटर प्रति 100 किमी से घटाकर 2031-32 में 3.3273 लीटर प्रति 100 किमी किया जाएगा। यह पाँच वर्षों की अवधि में लगभग 16.7% सुधार दर्शाता है।
- नए मानदंड भारत में बिक्री के लिए निर्मित या आयात किए जाने वाले नए यात्री वाहनों पर लागू होंगे।
- कॉरपोरेट औसत ईंधन दक्षता मानदंडों में 1,229 किलोग्राम को संदर्भ वाहन भार के रूप में उपयोग किया गया है।
- वाहन बेड़े की औसत ईंधन खपत की गणना संशोधित भारतीय ड्राइविंग चक्र (MIDC) का उपयोग करके की जाएगी और इसे प्रति 100 किमी पेट्रोल-समतुल्य लीटर में व्यक्त किया जाएगा।
- व्यक्तिगत मॉडलों के लिए ईंधन खपत की गणना उनकी अधिसूचित टेलपाइप CO₂ उत्सर्जन के आधार पर की जाएगी।
- CAFE-3 मानदंडों के तहत वाहन निर्माता निम्नलिखित को गिन सकते हैं:
- प्रत्येक बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन या रेंज-विस्तारित इलेक्ट्रिक वाहन को 3 वाहनों के रूप में।
- प्रत्येक प्लग-इन हाइब्रिड या फ्लेक्स-फ्यूल स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड को 2.5 वाहनों के रूप में।
- प्रत्येक स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड को 1.6 वाहनों के रूप में।
- प्रत्येक फ्लेक्स-फ्यूल इथेनॉल वाहन को 1.1 वाहनों के रूप में, जब बेड़े की ईंधन दक्षता की गणना की जाएगी।
कार्बन तटस्थता कारक
- CAFE-3 में कार्बन तटस्थता कारक (CNFs) भी पेश किए गए हैं, जो जैव ईंधन और इथेनॉल मिश्रण के उपयोग के आधार पर पात्र वाहनों के घोषित CO₂ उत्सर्जन को कम करते हैं।
- E20 या उससे अधिक इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल वाहनों, जिनमें स्ट्रॉन्ग और प्लग-इन हाइब्रिड भी शामिल हैं, के लिए घोषित उत्सर्जन में 8% की कमी की जा सकती है।
- फ्लेक्स-फ्यूल इथेनॉल वाहनों के लिए 22.3% की कमी मिलेगी।
- CNG वाहनों के लिए कमी 5% या अधिसूचित संपीड़ित बायोगैस मिश्रण प्रतिशत, इनमें से जो अधिक हो, उसके बराबर होगी।
- डीजल वाहनों के लिए कमी पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा अधिसूचित वास्तविक जैव ईंधन-मिश्रण प्रतिशत के अनुरूप होगी।
स्रोत: TH
‘बीमलाइन फॉर स्कूल्स’ प्रतियोगिता
पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी
सन्दर्भ
- भारतीय स्कूली विद्यार्थियों का एक समूह ‘बीमलाइन फॉर स्कूल्स’ प्रतियोगिता के 13वें संस्करण की पाँच विजेता टीमों में शामिल है।
‘बीमलाइन फॉर स्कूल्स’ प्रतियोगिता
- यह विश्वभर के उच्च विद्यालय के विद्यार्थियों के लिए भौतिकी की एक प्रतियोगिता है, जिसका आयोजन यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन (CERN) द्वारा किया जाता है।
- बीमलाइन एक ऐसी सुविधा है जो उच्च-ऊर्जा वाले उपपरमाण्विक कणों के प्रवाह उपलब्ध कराती है, जिनका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग करने के लिए किया जा सकता है।
- टीम ने पायन आवेश विनिमय का अध्ययन करने के लिए एक प्रयोग प्रस्तावित किया। इसका अर्थ यह अध्ययन करना है कि लिथियम और बेरिलियम जैसे हल्के परमाणुओं के साथ अंतःक्रिया करते समय कोई आवेशित पायन कितनी बार एक उदासीन पायन में परिवर्तित होता है।
- पायन उपपरमाण्विक कण हैं, जिनमें धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य विद्युत आवेश हो सकता है।
CERN
- CERN कण भौतिकी अनुसंधान के लिए दुनिया के प्रमुख केंद्रों में से एक है।
- स्थान: जिनेवा, स्विट्जरलैंड के निकट, फ्रांस-स्विट्जरलैंड सीमा पर।
- स्थापना: 1954 में, यूरोप में मौलिक वैज्ञानिक अनुसंधान में शांतिपूर्ण सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से।
- CERN का संचालन सदस्य देशों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक सदस्य देश CERN परिषद में दो आधिकारिक प्रतिनिधि भेजता है।
- CERN परिषद संगठन का सर्वोच्च प्राधिकरण है और सभी महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए जिम्मेदार है।
- इसकी सबसे प्रसिद्ध सुविधा लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (LHC) है, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली कण त्वरक है।
- 2012 में हिग्स बोसॉन की खोज में CERN ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस खोज ने हिग्स क्षेत्र के अस्तित्व के प्रमाण उपलब्ध कराए, जो उस तंत्र से संबंधित है जिसके माध्यम से मौलिक कण द्रव्यमान प्राप्त करते हैं।
स्रोत: TH
बॉन्ड प्रतिफल
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- 30-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड का प्रतिफल लगभग 25 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया।
परिचय
- बॉन्ड एक निवेशक द्वारा सरकार या कंपनी को दिया गया ऋण होता है। इसके बदले निवेशक को ब्याज प्राप्त होता है।
- प्रतिफल (Yield) उस निवेश पर मिलने वाले रिटर्न को दर्शाता है, जिसकी अपेक्षा कोई ऋणदाता किसी निश्चित अवधि के लिए सरकार को धन उधार देते समय कर सकता है।
- बॉन्ड की कीमत और प्रतिफल का विपरीत संबंध होता है; जैसे-जैसे बॉन्ड की कीमत बढ़ती है, सामान्यतः उसका प्रतिफल घटता है।
बॉन्ड प्रतिफल में वृद्धि के कारण
- अमेरिकी सरकार बड़ी मात्रा में ऋण ले रही है और निवेशक महंगाई तथा भविष्य की ब्याज दरों को लेकर भी चिंतित हैं।
- इसलिए वे अमेरिकी सरकार को लंबी अवधि के लिए धन उधार देने के बदले अधिक रिटर्न की मांग करते हैं।
प्रतिफल में वृद्धि के प्रभाव
- यह अमेरिकी सरकार के लिए उच्च उधारी लागत का संकेत देता है। यदि मौजूदा बॉन्ड पर प्रतिफल बढ़ रहा है, तो अमेरिकी सरकार को अपने ऋण पर अधिक ब्याज देना पड़ता है।
- बढ़ता हुआ अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल अन्य देशों को भी प्रभावित कर सकता है। चूँकि अमेरिकी सरकारी बॉन्ड वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए एक महत्वपूर्ण मानक हैं, इसलिए उच्च अमेरिकी प्रतिफल वैश्विक निवेश प्रवाह, मुद्राओं, ब्याज दरों और शेयर बाजारों को प्रभावित कर सकता है।
स्रोत: IE