पाठ्यक्रम: जीएस-3/कृषि
सन्दर्भ
- खाड़ी संघर्ष, वैश्विक उर्वरक एवं ऊर्जा बाज़ारों में उतार-चढ़ाव, तथा एल नीनो के कारण बढ़ते जलवायु तनाव के जोखिम ने भारतीय कृषि को सुदृढ़ बनाने और बाहरी निवेशों पर निर्भरता कम करने के उपाय के रूप में प्राकृतिक खेती (natural farming) में रुचि को पुनः बढ़ावा दिया है।
प्राकृतिक खेती का परिचय
- यह एक रसायन-मुक्त, कृषि-पारिस्थितिकीय खेती पद्धति है, जो बाहरी स्रोतों से प्राप्त निवेशों पर निर्भरता कम करती है तथा इसके स्थान पर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों, जैव विविधता, फसल विविधीकरण, मल्चिंग तथा सूक्ष्मजीवीय मिश्रणों पर आधारित होती है।
- इसका उद्देश्य पारंपरिक कृषि के विपरीत मृदा स्वास्थ्य में सुधार, जल संरक्षण, उत्पादन लागत में कमी तथा जलवायु लचीलेपन में वृद्धि करना है।
- प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) खेत पर उपलब्ध जैविक पदार्थों के पुनर्चक्रण, जैविक कीट प्रबंधन तथा स्वदेशी कृषि पद्धतियों के माध्यम से सतत कृषि उत्पादन को बढ़ावा देता है।
- यह खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की कृषि-पारिस्थितिकी (Agroecology) की अवधारणाओं—विविधता, पुनर्चक्रण, लचीलापन, स्थानीय ज्ञान, किसान सहभागिता तथा ग्रामीण परिपत्र अर्थव्यवस्थाओं—के अनुरूप है।
प्राकृतिक खेती के स्तंभ
बीजामृत (Bijamrita/Beejamrutha)
- यह गाय के गोबर, गौमूत्र, गुड़, दाल के आटे तथा मिट्टी से तैयार किया गया एक किण्वित सूक्ष्मजीवीय घोल है।
- यह सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को बढ़ाकर पोषक तत्वों को जैव-उपलब्ध बनाता है तथा रोगजनकों से सुरक्षा प्रदान करता है।
जीवामृत (Jivamrita/Jeevamrutha)
- यह गाय के गोबर, गौमूत्र तथा चूने पर आधारित बीजों के लिए एक सूक्ष्मजीवीय लेप है।
- यह प्रारंभिक जड़ों को फफूंद तथा बीज एवं मृदा जनित रोगों से सुरक्षित रखता है।
आच्छादन (मल्चिंग)
- शीर्ष मृदा को आवरण फसलों तथा फसल अवशेषों से ढकना।
- इससे ह्यूमस का निर्माण होता है, ऊपरी मृदा का संरक्षण होता है, जल धारण क्षमता बढ़ती है, मृदा जीवों को बढ़ावा मिलता है तथा खरपतवारों की रोकथाम होती है।
व्हापासा (नमी)(Whapasa-Moisture)
- मृदा का वातन, जो जीवामृत एवं आच्छादन का परिणाम है, बेहतर मृदा संरचना तथा ह्यूमस की मात्रा के कारण जल प्रबंधन में आए परिवर्तनों को दर्शाता है।
- इससे जल की उपलब्धता, जल उपयोग दक्षता तथा सूखे के प्रति लचीलापन बढ़ता है।
भारत में प्राकृतिक खेती की स्थिति
- भारत का कृषि क्षेत्र अभी भी आयातित उर्वरकों, जीवाश्म ईंधन आधारित निवेशों, भूजल दोहन तथा रसायन-प्रधान खेती पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे यह वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों तथा जलवायु संबंधी झटकों के प्रति संवेदनशील बना रहता है।
- इन चुनौतियों के समाधान हेतु केंद्र सरकार ने अनेक पहलें शुरू की हैं:
- प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) के माध्यम से ग्राम स्तर पर क्षमता निर्माण एवं किसान प्रशिक्षण द्वारा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना।
- पीएम-प्रणाम (PM-PRANAM: PM Programme for Restoration, Awareness, Nourishment and Amelioration of Mother Earth) के माध्यम से राज्यों को रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को सीमित करने के लिए प्रोत्साहित करना।
- आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, केरल तथा पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों ने प्राकृतिक खेती, कृषि-पारिस्थितिकी अथवा जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु नीतियाँ लागू की हैं।
- बढ़ते नीतिगत समर्थन के बावजूद, प्राकृतिक खेती का वर्तमान दायरा सीमित है तथा इसमें वह संस्थागत पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है जिसने हरित क्रांति की सफलता सुनिश्चित की थी।
| प्राकृतिक खेती एवं जैविक खेती के बीच प्रमुख अंतर | |
| प्राकृतिक खेती | जैविक खेती |
| पूरी तरह प्राकृतिक पारिस्थितिकीय प्रक्रियाओं पर आधारित, बाहरी निवेश न्यूनतम। | कृत्रिम रसायनों का प्रयोग नहीं, लेकिन स्वीकृत जैविक निवेशों की अनुमति देती है। |
| स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों (जैसे जीवामृत, बीजामृत, मल्चिंग) का उपयोग। | खरीदी गई जैविक खाद, कम्पोस्ट, जैव उर्वरक एवं जैव कीटनाशकों का उपयोग कर सकती है। |
| लागत बहुत कम क्योंकि अधिकांश निवेश खेत पर ही तैयार होते हैं। | प्रमाणित जैविक निवेश खरीदने के कारण लागत अपेक्षाकृत अधिक। |
| सामान्यतः प्रमाणन अनिवार्य नहीं; सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS) अपनाई जा सकती है। | प्रीमियम बाज़ारों के लिए औपचारिक जैविक प्रमाणन की आवश्यकता होती है। |
| आत्मनिर्भर कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र एवं न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप पर बल। | रासायनिक निवेशों के स्थान पर जैविक विकल्पों के उपयोग पर बल। |
| स्थानीय उपभोग एवं उत्पादन लागत में कमी को बढ़ावा देती है। | बाज़ार-उन्मुख, निर्यात एवं प्रीमियम मूल्य प्राप्ति की संभावना अधिक। |
| राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) के अंतर्गत प्रोत्साहित। | परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट जैसी योजनाओं के अंतर्गत समर्थित। |
प्राकृतिक खेती से संबंधित चिंताएँ एवं समस्याएँ
- कमज़ोर संस्थागत ढाँचा: प्राकृतिक खेती के लिए हरित क्रांति की तरह अनुसंधान संस्थानों, विस्तार सेवाओं, प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं, जैव-निवेश केंद्रों, खरीद व्यवस्था तथा समर्पित बाज़ारों का एकीकृत समर्थन तंत्र उपलब्ध नहीं है।
- संक्रमण संबंधी चुनौतियाँ: संक्रमण अवधि में किसानों को उपज को लेकर अस्थायी अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है, जिससे पर्याप्त वित्तीय एवं तकनीकी सहायता के अभाव में इसका अपनाया जाना हतोत्साहित होता है।
- सीमित वैज्ञानिक प्रमाण: यद्यपि क्षेत्रीय अनुभव उत्साहजनक हैं, फिर भी उत्पादकता, मृदा स्वास्थ्य, कीट प्रबंधन तथा दीर्घकालिक स्थिरता पर क्षेत्र-विशिष्ट अध्ययनों का अभाव है।
- इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (SAUs) तथा कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) की अधिक सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
- बाज़ार संबंधी बाधाएँ: प्राकृतिक खेती से उत्पादित वस्तुओं के लिए सामान्यतः मूल्य प्रीमियम अथवा सुनिश्चित खरीद उपलब्ध नहीं होती। सकारात्मक बाज़ार संकेतों के अभाव में किसान निवेश-प्रधान कृषि से हटने के लिए प्रेरित नहीं होते।
- श्रीलंका के अनुभव की गलत व्याख्या: उर्वरकों पर अचानक प्रतिबंध के बाद श्रीलंका में आई कृषि आपदा को अक्सर प्राकृतिक खेती के विरुद्ध उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- किंतु वास्तविक समस्या कृषि-पारिस्थितिकीय अवधारणाओं में नहीं, बल्कि संक्रमण के क्रम तथा संस्थागत तैयारी के अभाव में थी।
संबंधित प्रयास एवं नीतिगत गति (Policy Momentum)
सरकार ने कृषि परिवर्तन की दिशा में आधार तैयार कर दिया है:
- राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) किसान प्रशिक्षण, प्रदर्शन खेतों तथा क्लस्टर-आधारित कार्यान्वयन को बढ़ावा देता है।
- पीएम-प्रणाम राज्यों को उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए प्रेरित करता है।
- नीति आयोग की प्राकृतिक खेती परियोजना विभागों के बीच समन्वय के माध्यम से साक्ष्य-आधारित विस्तार को सक्षम बनाती है।
- MANAGE तथा अन्य समान संस्थान क्षमता निर्माण, जन-जागरूकता एवं ज्ञान प्रसार में सहयोग करते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भारत के प्राकृतिक खेती कार्यक्रमों को जलवायु-लचीली कृषि के महत्त्वपूर्ण उदाहरण के रूप में रेखांकित किया है।
- ये प्रयास दर्शाते हैं कि राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है, लेकिन अब इनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मजबूत संस्थागत समर्थन की आवश्यकता है।
केस स्टडी: अनुभव से सीख
- आंध्र प्रदेश का सामुदायिक प्रबंधित प्राकृतिक खेती (APCNF) कार्यक्रम भारत की सबसे व्यापक प्राकृतिक खेती पहल का प्रतिनिधित्व करता है।
- फूड प्लैनेट प्राइज़ 2026—जो विश्व के सबसे बड़े खाद्य प्रणाली पुरस्कारों में से एक है—से सम्मानित होने के बाद इस मॉडल को वैश्विक पहचान मिली है।
- यह दर्शाता है कि सफल कृषि परिवर्तन के लिए दीर्घकालिक संस्थागत निर्माण, किसानों का निरंतर मार्गदर्शन, सामुदायिक लामबंदी, क्षमता विकास, सुदृढ़ विस्तार सेवाएँ तथा बाज़ार समर्थन आवश्यक हैं।
- इसका अनुभव भारत के स्वयं सहायता समूह (SHG) आंदोलन के समान है, जो छोटे पायलट कार्यक्रमों से शुरू होकर निरंतर संस्थागत वित्तपोषण के माध्यम से विश्व के सबसे बड़े ग्रामीण आजीविका कार्यक्रमों में से एक बन गया।
आगे की राह: पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाना
- प्राकृतिक खेती को केवल वैचारिक विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक झटकों तथा निवेश बाज़ारों में उतार-चढ़ाव के विरुद्ध राष्ट्रीय लचीलापन रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रमुख प्राथमिकताएँ:
- समग्र संस्थागत समर्थन के साथ परस्पर जुड़े गाँवों को शामिल करते हुए क्लस्टर-आधारित ‘लिविंग लैंडस्केप’ विकसित करना।
- जैव-निवेश संसाधन केंद्र, किसान उत्पादक संगठन (FPOs), मृदा स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली, प्रदर्शन खेत तथा संक्रमण वित्त की व्यवस्था करना।
- ICAR, SAUs तथा KVKs के माध्यम से क्षेत्र-विशिष्ट वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना।
- प्राकृतिक खेती से उत्पादित वस्तुओं के लिए बाज़ार संपर्क, प्रमाणन सहायता, मूल्य शृंखला तथा खरीद व्यवस्था सुनिश्चित करना।
- प्राकृतिक खेती को जलवायु अनुकूलन, जल संरक्षण तथा ग्रामीण आजीविका कार्यक्रमों के साथ विभिन्न विभागों में एकीकृत करना।
- अचानक नीतिगत परिवर्तन करने के बजाय, साक्ष्य-आधारित चरणबद्ध तरीके से संक्रमण सुनिश्चित करना।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत के कृषि क्षेत्र के लिए प्राकृतिक खेती के महत्व का परीक्षण कीजिए। प्राकृतिक खेती के विस्तार में आने वाली संस्थागत चुनौतियों की चर्चा करते हुए इसके सफल अपनाने हेतु एक सुदृढ़ पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के उपाय सुझाइए। |
स्रोत: BL
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