भारत के देखभालकर्ता कार्यबल को सशक्त बनाने हेतु नीति आयोग की रिपोर्ट

पाठ्यक्रम: जीएस-1/ समाज, जीएस-3/ अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट “विकसित भारत @2047 में देखभाल की पुनर्कल्पना: देखभालकर्ताओं को सशक्त बनाने की रणनीतियाँ ” में भारत में देखभाल सेवाओं को विनियमित, मानकीकृत तथा पेशेवर बनाने के लिए राष्ट्रीय देखभालकर्ता परिषद (NCC) की स्थापना की वकालत की है।

देखभाल अर्थव्यवस्था (Care Economy) क्या है?

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, देखभाल (Caregiving) से तात्पर्य उन व्यक्तियों को शारीरिक, भावनात्मक तथा सामाजिक सहायता प्रदान करने से है, जो आयु, बीमारी या दिव्यांगता के कारण दैनिक गतिविधियाँ स्वतंत्र रूप से करने में सक्षम नहीं होते।
  • देखभालकर्ताओं (Caregivers) के दो प्रकार होते हैं—औपचारिक (Formal) और अनौपचारिक (Informal)।
  • औपचारिक देखभालकर्ता (Formal Caregiver), जिसे व्यक्तिगत देखभाल सहायक (Personal Care Aide) भी कहा जाता है, एक प्रशिक्षित पेशेवर होता है जो वृद्ध व्यक्तियों, दिव्यांग व्यक्तियों (PwDs) अथवा असाध्य या दीर्घकालिक बीमारियों से ग्रस्त रोगियों को उनकी दैनिक गतिविधियों में गैर-चिकित्सीय सहायता एवं सहयोग प्रदान करता है।
  • अनौपचारिक देखभालकर्ता (Informal Caregiver) परिवार के सदस्य, मित्र या स्वयंसेवक हो सकते हैं, जो वृद्धजनों की देखभाल करते हैं।
  • भारत का देखभाल सेवा बाज़ार (Care Services Market) वर्ष 2023 में 29.62 अरब अमेरिकी डॉलर का था और इसके 13.76% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ते हुए 2030 तक 72.31 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
देखभाल अर्थव्यवस्था

देखभाल सेवाओं की मांग क्यों बढ़ रही है?

  • जनसांख्यिकीय परिवर्तन : वृद्ध जनसंख्या में वृद्धि के कारण भारत में दीर्घकालिक वृद्ध देखभाल सेवाओं (Long-term Eldercare Services) की आवश्यकता बढ़ रही है।
  • शहरीकरण और प्रवासन: तीव्र शहरीकरण और प्रवासन के कारण संयुक्त परिवार व्यवस्था कमजोर हो रही है। एकल (न्यूक्लियर) परिवारों में सामान्यतः देखभाल के लिए अनौपचारिक सहयोगी नेटवर्क का अभाव होता है।
  • महिलाओं की कार्यबल में बढ़ती भागीदारी: अधिक महिलाओं के कार्यबल में शामिल होने से संगठित बाल देखभाल (Childcare) तथा देखभाल सेवाओं (Caregiving Services) की मांग बढ़ी है।

देखभाल अर्थव्यवस्था से संबंधित सरकारी पहल

  • शतायु (SHATAYU – Senior Holistic Care Assistance and Training for Your Utility) डैशबोर्ड: वर्ष 2026 में आयोजित “सुदृढ़ देखभाल अर्थव्यवस्था का निर्माण” विषयक राष्ट्रीय कार्यशाला के दौरान वरिष्ठ नागरिकों के लिए देशभर में देखभाल सेवाओं को समर्थन एवं सुदृढ़ करने हेतु विकसित एक डैशबोर्ड लॉन्च किया गया।
  • जीवन (JEEVAN – Joint Elderly Empowerment & Virtual Assistance Network) अनुप्रयोग: यह वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक सुलभ, नागरिक-केंद्रित मोबाइल अनुप्रयोग है, जिसे एकल-खिड़की सहायता तंत्र (Single-window Support Ecosystem) के रूप में विकसित किया गया है।
  • यह ऐप सरकारी कल्याणकारी योजनाओं, वरिष्ठ नागरिक गृहों तथा सहायता सेवाओं से संबंधित जानकारी को एक ही मंच पर उपलब्ध कराता है।
  • वयो मानस संजीवनी (Vayo Manasa Sanjeevani): यह वरिष्ठ नागरिकों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता को बढ़ावा देने तथा स्वस्थ वृद्धावस्था को प्रोत्साहित करने के लिए जागरूकता फैलाने एवं ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने की एक पहल है।

राज्य सरकारों द्वारा की गई पहल

  • जेरियाट्रिक देखभालकर्ता प्रशिक्षण कार्यक्रम (Geriatric Caregiver Training Programme): ओडिशा सरकार 3 माह का एक प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम संचालित करती है, जिसके माध्यम से वृद्ध व्यक्तियों को शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान करने का प्रशिक्षण दिया जाता है।
  • अवैतनिक देखभालकर्ताओं के लिए मासिक भत्ता (Monthly Allowance for Unpaid Caregivers): कर्नाटक भारत का पहला राज्य बना जिसने “देखभालकर्ता मासिक भत्ता योजना (Carer’s Monthly Allowance Scheme)” शुरू की। इसके अंतर्गत सेरेब्रल पाल्सी, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, पार्किंसन रोग तथा मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी गंभीर दिव्यांगताओं से ग्रस्त व्यक्तियों के माता-पिता को ₹1,000 प्रतिमाह का भत्ता प्रदान किया जाता है।

देखभाल अर्थव्यवस्था सुधारों के क्रियान्वयन में चुनौतियाँ

  • राजकोषीय सीमाएँ (Fiscal Constraints): देखभाल अवसंरचना के विस्तार तथा कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त सार्वजनिक निवेश एवं दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिबद्धता की आवश्यकता होगी।
  • देखभाल कार्य के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण (Social Attitudes to Care Work): देखभाल कार्य को अब भी सार्वजनिक नीति के विषय के बजाय परिवार की निजी जिम्मेदारी माना जाता है। समाज में गहराई से जमी पितृसत्तात्मक परंपराएँ अवैतनिक देखभाल कार्य की उचित मान्यता को सीमित करती हैं।
  • कमज़ोर नियामक क्षमता (Weak Regulatory Capacity): पूरे भारत में देखभाल संस्थानों के गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करना तथा उनकी निगरानी करना एक प्रशासनिक चुनौती है।
  • कुशल देखभाल कार्यबल का अभाव (Lack of Skilled Care Workforce): भारत में विशेषकर वृद्ध देखभाल, दिव्यांग देखभाल तथा प्रारंभिक बाल देखभाल के क्षेत्रों में पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित देखभाल कार्यबल उपलब्ध नहीं है।

आगे की राह

  • उपयुक्त कानूनी ढाँचे के साथ राष्ट्रीय देखभाल नीति (National Caregiving Policy) स्थापित की जाए।
  • राष्ट्रीय देखभालकर्ता परिषद (National Carer Council) को सर्वोच्च नियामक निकाय के रूप में स्थापित किया जाए।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से ⁠देशभर में देखभालकर्ता प्रशिक्षण पहलों का विस्तार किया जाए।
  • ⁠देखभाल सेवाओं को स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा तथा कौशल विकास कार्यक्रमों के साथ एकीकृत किया जाए।

स्रोत: NITI AAYOG

 

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