विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • पूर्व में विरोध-प्रदर्शनों के कारण स्थगित किए गए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को संसद के मानसून सत्र में विचारार्थ सूचीबद्ध किया गया है, जिससे विदेशी वित्तपोषण पर नियंत्रण संबंधी प्रावधानों को लेकर पुनः चर्चा प्रारंभ हो गई है।

पृष्ठभूमि : विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम का विकास

  • विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम पहली बार वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान लागू किया गया था।
  • इसका उद्देश्य विदेशी वित्तपोषण पर नियंत्रण स्थापित करना तथा भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं में बाह्य हस्तक्षेप को रोकना था।
  • इसका प्रमुख लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि विदेशी अंशदान राष्ट्रीय संप्रभुता, निर्वाचन प्रक्रिया अथवा लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले।
  • विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 ने पूर्व अधिनियम का स्थान लिया तथा विदेशी अंशदान की स्वीकृति एवं उपयोग के लिए अधिक कठोर नियामकीय व्यवस्था प्रदान की।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत राजनीतिक दलों, चुनावी उम्मीदवारों, सांसदों एवं विधायकों, न्यायाधीशों, लोक सेवकों, मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा राजनीतिक प्रकृति के संगठनों को विदेशी अंशदान प्राप्त करने से प्रतिबंधित किया गया।
  • शिक्षा, संस्कृति, धर्म, समाजसेवा अथवा आर्थिक गतिविधियों से संबंधित संगठनों के लिए विदेशी अंशदान प्राप्त करने हेतु पंजीकरण अथवा पूर्व अनुमति अनिवार्य की गई।
  • इसके पश्चात, विशेषकर वर्ष 2020 में किए गए संशोधनों के माध्यम से प्रशासनिक व्यय की सीमा निर्धारित की गई, विदेशी अंशदान के पुनः हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाया गया तथा प्रमुख पदाधिकारियों के लिए आधार की अनिवार्यता सहित अनुपालन संबंधी प्रावधानों को और अधिक कठोर बनाया गया।

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधान

  • विदेशी अंशदान से निर्मित परिसंपत्तियों का निहित होना: यदि किसी संगठन का विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण निरस्त कर दिया जाता है, तो उसके पास उपलब्ध विदेशी अंशदान तथा उससे निर्मित परिसंपत्तियाँ अस्थायी रूप से एक नामित प्राधिकरण में निहित हो जाएँगी।
    • यदि निर्धारित अवधि के भीतर इन परिसंपत्तियों की वापसी नहीं होती, तो उनका निहित होना स्थायी माना जाएगा।
  • आंशिक विदेशी वित्तपोषण वाली परिसंपत्तियाँ: यदि किसी परिसंपत्ति का निर्माण आंशिक रूप से विदेशी अंशदान से किया गया है, तब भी धारा 16क (2) के अंतर्गत संपूर्ण परिसंपत्ति नामित प्राधिकरण में निहित की जा सकेगी।
  • परिसंपत्तियों का निपटान: नामित प्राधिकरण को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त होंगे—
    • परिसंपत्तियों का केंद्र अथवा राज्य सरकार के विभागों अथवा स्थानीय निकायों को हस्तांतरण।
    • परिसंपत्तियों का विक्रय अथवा नीलामी।
    • विक्रय से प्राप्त राशि तथा अप्रयुक्त विदेशी अंशदान को भारत की संचित निधि में जमा कराना।
  • पंजीकरण का स्वैच्छिक समर्पण: यदि कोई संगठन स्वेच्छा से अपना विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण समर्पित करता है, तब भी उसके पास उपलब्ध शेष विदेशी अंशदान तथा उससे निर्मित परिसंपत्तियाँ नामित प्राधिकरण में निहित की जा सकती हैं।
  • सरकार को छूट प्रदान करने की शक्ति: यह विधेयक केंद्र सरकार को यह अधिकार प्रदान करता है कि यदि वह लोकहित में आवश्यक समझे, तो किसी व्यक्ति अथवा संगठन को इसके प्रावधानों से छूट प्रदान कर सके।

प्रमुख चिंताएँ एवं मुद्दे

  • कार्यपालिका को व्यापक विवेकाधिकार: अधिनियम की धारा 14 केंद्र सरकार को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह लोकहित के आधार पर किसी संगठन का पंजीकरण निरस्त कर सकती है।
    • किंतु लोकहित शब्द की स्पष्ट विधिक परिभाषा उपलब्ध नहीं है।
    • आलोचकों का मत है कि इससे सरकार को अत्यधिक विवेकाधिकार प्राप्त हो जाता है तथा पर्याप्त सुरक्षा उपायों का अभाव बना रहता है।
  • गैर-सरकारी संगठनों पर गंभीर प्रभाव: वर्तमान विधिक व्यवस्था की तुलना में यह विधेयक पंजीकरण निरस्त होने अथवा उसके नवीनीकरण न होने की स्थिति में परिसंपत्तियों के स्थायी हस्तांतरण का प्रावधान करता है।
    • विदेशी वित्तपोषण समाप्त होने पर अनेक संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पर्यावरण संरक्षण, परोपकारी कार्यों तथा आपदा राहत जैसी गतिविधियों को जारी रखने में असमर्थ हो सकते हैं।
  • दुरुपयोग की आशंका: यदि किसी संगठन के विरुद्ध बलपूर्वक धर्मांतरण अथवा सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न करने के आरोपों में अभियोजन प्रारंभ होता है, तो उसके पंजीकरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
    • अंतिम न्यायिक निर्णय से पूर्व ही ऐसे संगठनों को लंबे समय तक अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है तथा निराधार आरोपों के माध्यम से दुरुपयोग की संभावना भी बनी रहती है।
  • स्वैच्छिक समर्पण से संबंधित चिंताएँ: यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि यदि कोई संगठन स्वेच्छा से विदेशी वित्तपोषण समाप्त करना चाहता है, तो उसकी वैध अवधि में निर्मित परिसंपत्तियों को भी सरकार के अधीन निहित करने का औचित्य क्या है।
  • संवैधानिक प्रश्न: लोकहित के आधार पर चयनात्मक छूट प्रदान करने वाला प्रावधान अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के संदर्भ में चुनौती का विषय बन सकता है।
    • आलोचकों के अनुसार इसमें भेदभावपूर्ण व्यवहार के लिए स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ मानदंड निर्धारित नहीं किए गए हैं।

आगे की राह : नियामकीय ढाँचे का सुदृढ़ीकरण

  • लोकहित की स्पष्ट एवं व्यावहारिक विधिक परिभाषा निर्धारित की जाए, ताकि मनमानी व्याख्या की संभावना समाप्त हो।
  • परिसंपत्तियों के अधिग्रहण अथवा जब्ती से पूर्व अग्रिम सूचना, कारणयुक्त आदेश तथा स्वतंत्र अपीलीय समीक्षा जैसी प्रक्रियात्मक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
  • गंभीर उल्लंघनों एवं मात्र प्रक्रियात्मक त्रुटियों के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए दंडात्मक कार्रवाई अनुपातिक आधार पर की जाए।
  • जिन वास्तविक परोपकारी संस्थाओं द्वारा विदेशी अंशदान का दुरुपयोग नहीं किया गया है, उन्हें अपनी विधिसम्मत रूप से निर्मित परिसंपत्तियों के उपयोग अथवा सुव्यवस्थित हस्तांतरण की अनुमति दी जाए।
  • अनावश्यक अनुपालन भार बढ़ाए बिना डिजिटल प्रतिवेदन, नियमित लेखा-परीक्षण तथा सार्वजनिक प्रकटीकरण के माध्यम से पारदर्शिता को बढ़ावा दिया जाए।
  • ऐसा संतुलित नियामकीय ढाँचा विकसित किया जाए, जो राष्ट्रीय सुरक्षा एवं नागरिक समाज की रचनात्मक भूमिका दोनों के अनुरूप हो तथा केवल वास्तविक मानवीय, शैक्षिक एवं विकासात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हुए देश की संप्रभुता की रक्षा सुनिश्चित करे।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य विदेशी अंशदान के उपयोग में उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करना है, किंतु इसने संघवाद, नागरिक स्वतंत्रताओं तथा संवैधानिक संरक्षणों के संबंध में भी अनेक चिंताएँ उत्पन्न की हैं। विश्लेषण कीजिए। 

स्रोत: TH

 

Other News

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध संदर्भ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका, जी-20 में उसका उभरता प्रभाव तथा बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने दक्षिण एशिया तक सीमित सामरिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर वैश्विक एवं हित-आधारित रणनीतिक सहभागिता की आवश्यकता पर नए सिरे से विमर्श को गति दी है। भारत का सामरिक दृष्टिकोण...
Read More

पाठ्यक्रम: जीएस-3/समावेशी विकास; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सन्दर्भ भारत एआई शासन दिशानिर्देश (2025) तथा इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में हुई चर्चाओं में विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समावेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग पर बल दिया गया। लैंगिक-संवेदनशील एवं समावेशी एआई क्यों महत्वपूर्ण है? कृत्रिम...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध संदर्भ  हाल ही में लाल सागर एवं पश्चिम एशिया के वाणिज्यिक समुद्री मार्गों पर हुए हमलों, जिनमें भारतीय नाविकों की मृत्यु हुई, ने भारत के समुद्री कार्यबल की संवेदनशीलता तथा उनके लिए अधिक प्रभावी सुरक्षा तंत्र विकसित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। भारतीय समुद्री कार्यबल...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध संदर्भ  हाल ही में लाल सागर एवं पश्चिम एशिया के वाणिज्यिक समुद्री मार्गों पर हुए हमलों, जिनमें भारतीय नाविकों की मृत्यु हुई, ने भारत के समुद्री कार्यबल की संवेदनशीलता तथा उनके लिए अधिक प्रभावी सुरक्षा तंत्र विकसित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। भारतीय समुद्री कार्यबल...
Read More

पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन सन्दर्भ नीट-यूजी 2024 प्रश्नपत्र लीक ने भारत में प्रणालीगत भ्रष्टाचार और संस्थागत जवाबदेही पर चर्चा को पुनः प्रज्वलित कर दिया, जिससे पारदर्शिता, शासन सुधारों तथा भ्रष्टाचार-रोधी उपायों की प्रभावशीलता पर नई बहस शुरू हुई। भारत में भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत, निजी या किसी अनधिकृत समूह के लाभ के लिए...
Read More

पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन; जीएस-3/अर्थव्यवस्था सन्दर्भ  हाल के समय में भारत की विकास रणनीति पर हुई चर्चाओं में इस बात पर बल दिया गया है कि विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दीर्घकालिक घरेलू एवं विदेशी निवेश आकर्षित करने हेतु पूर्वानुमेय कर व्यवस्था, पारदर्शी विनियम तथा कुशल व्यापार सुगमता...
Read More

पाठ्यक्रम: जीएस-3/ अर्थव्यवस्था सन्दर्भ भारत के आर्थिक विकास के अनुमान में नीचे की ओर संशोधन किए जाने तथा परिवारों पर बढ़ते वित्तीय दबाव के बीच यह चिंता उभरकर सामने आई है कि अर्थव्यवस्था के-आकार (K-Shaped) के विकास प्रतिरूप की ओर बढ़ रही है। के-आकार की अर्थव्यवस्था क्या है? के-आकार की...
Read More
scroll to top