पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- भारत अपने मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के नेटवर्क का विस्तार कर रहा है, लेकिन पहले के एफटीए के अनुभवों ने बढ़ते व्यापार घाटे और सीमित निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
मुक्त व्यापार समझौता (FTA) क्या है?
- मुक्त व्यापार समझौते (FTA) दो या दो से अधिक देशों अथवा व्यापारिक समूहों के बीच ऐसे समझौते होते हैं, जिनमें उनके बीच होने वाले अधिकांश व्यापार पर सीमा शुल्क तथा गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने या समाप्त करने पर सहमति होती है।
- इनमें वस्तुओं तथा सेवाओं दोनों को शामिल किया जा सकता है।
- एफटीए (FTA) में निवेश, पेशेवरों की आवाजाही तथा नियामकीय सहयोग जैसे मुद्दों को भी शामिल किया जाता है।

भारत के मुक्त व्यापार समझौते (FTA)
- वर्तमान स्थिति: भारत के पास वर्तमान में 16 क्रियाशील मुक्त व्यापार समझौते (FTA) हैं, जो 28 देशों को कवर करते हैं। इनमें हाल ही में लागू भारत–यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) भी शामिल है।
- वर्ष 2020 के बाद भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA–स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन), ओमान तथा यूनाइटेड किंगडम के साथ एफटीए लागू किए हैं।
- कार्यान्वयन की प्रतीक्षा में अथवा वार्ता के अधीन एफटीए: भारत के 8 अतिरिक्त FTA, जिनमें 41 देश शामिल हैं, या तो कार्यान्वयन की प्रतीक्षा में हैं अथवा उन पर वार्ता चल रही है।
- भारत–न्यूज़ीलैंड एफटीए पर हस्ताक्षर हो चुके हैं और यह कार्यान्वयन की प्रतीक्षा में है।
- भारत संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, इज़राइल, पेरू, खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) तथा यूरेशियन आर्थिक संघ (EAEU) के साथ भी एफटीए पर वार्ता कर रहा है।
भारत अपने एफटीए नेटवर्क का विस्तार क्यों कर रहा है?
- भारत की निर्यात-आधारित वृद्धि: भारत का लक्ष्य 2030 तक 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात प्राप्त करना है। एफटीए, वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात के विस्तार का एक महत्वपूर्ण साधन है।
- बाज़ार तक पहुँच का विस्तार: एफटीए, शुल्क एवं गैर-शुल्क बाधाओं को कम या समाप्त करके भारतीय निर्यातकों को विदेशी बाज़ारों में प्राथमिकता प्राप्त पहुँच प्रदान करते हैं, जिससे भारतीय वस्तुओं एवं सेवाओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है।
- विदेशी निवेश आकर्षित करना: वरीयतापूर्ण व्यापार समझौते अधिक बाज़ार-निश्चितता प्रदान करके निवेश वातावरण में सुधार करते हैं, जिससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण को बढ़ावा मिलता है।
- आर्थिक एवं रणनीतिक साझेदारी: एफटीए, भारत की व्यापार कूटनीति और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ रणनीतिक सहभागिता को मजबूत करते हैं तथा एक्ट ईस्ट नीति, पड़ोसी प्रथम और भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी पहलों को समर्थन प्रदान करते हैं।
भारत की FTA रणनीति की चुनौतियाँ
- बढ़ता व्यापार घाटा: वर्ष 2007–09 से 2023–25 के बीच भारत का व्यापार घाटा आसियान (ASEAN) के साथ 381%, जापान के साथ 318% तथा दक्षिण कोरिया के साथ 268% बढ़ा, जबकि विश्व के शेष देशों के साथ यह वृद्धि 142% रही।
- वित्त वर्ष 2025 में भारत ने यूएई, ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस तथा EFTA देशों के साथ 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का व्यापार घाटा दर्ज किया।
- एफटीए लाभों का कम उपयोग: FTA के लिए पात्र भारतीय निर्यात का केवल 20–30% ही इन समझौतों के लाभ का उपयोग करता है, जबकि आयात पक्ष पर इसका उपयोग 60–70% आँका गया है।
- उत्पत्ति के नियम (RoO), प्रमाणन आवश्यकताओं तथा दस्तावेज़ीकरण के अनुपालन से लेन-देन की लागत बढ़ जाती है।
- उलटी शुल्क संरचना (Inverted Duty Structure): कच्चे माल और मध्यवर्ती वस्तुओं पर तैयार उत्पादों की तुलना में अधिक आयात शुल्क होने से भारतीय निर्माताओं की उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
- इससे घरेलू विनिर्माण कमजोर होता है, मूल्य संवर्धन घटता है तथा मेक इन इंडिया पहल के उद्देश्यों को नुकसान पहुँचता है।
- विनिर्माण का एफटीए साझेदार देशों की ओर स्थानांतरण: वर्तमान शुल्क संरचना कंपनियों को वियतनाम, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे एफटीए साझेदार देशों में विनिर्माण इकाइयाँ स्थापित करने तथा वहाँ से तैयार वस्तुओं का भारत में निर्यात करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- इससे घरेलू निवेश, रोजगार तथा औद्योगिक क्षमता में कमी आ सकती है और भारत का विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो सकता है।
- स्थिरता संबंधी उपाय: विकसित देश FTA को श्रम, पर्यावरण तथा जलवायु संबंधी मानकों से जोड़ रहे हैं, जिनमें यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) भी शामिल है।
- भारतीय निर्यातकों को कार्बन उत्सर्जन, स्थिरता तथा उचित परिश्रम (Due Diligence) से संबंधित अतिरिक्त अनुपालन आवश्यकताओं का सामना करना पड़ सकता है।
आगे की राह
- उलटी शुल्क संरचना (Inverted Duty Structure) में सुधार: घरेलू उत्पादकों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए कच्चे माल और मध्यवर्ती वस्तुओं पर शुल्क कम किया जाए।
- राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता का निर्माण: विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, लॉजिस्टिक्स तथा सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखलाओं में निवेश किया जाए, क्योंकि एफटीए के दीर्घकालिक लाभ मजबूत उत्पादन क्षमता पर निर्भर करते हैं।
- एफटीए प्रभाव निगरानी प्राधिकरण की स्थापना: एफटीए के उपयोग, क्षेत्रवार परिणामों, आयात में वृद्धि, व्यापार घाटे तथा नियामकीय प्रतिबद्धताओं के नीति-निर्माण पर प्रभाव की समय-समय पर निगरानी के लिए एक विशेष संगठन स्थापित किया जाए।
- गैर-शुल्क बाधाओं का समाधान: भारतीय निर्यातकों की बाज़ार पहुँच बढ़ाने के लिए मानकों, परीक्षण एवं अनुरूपता आकलन की पारस्परिक मान्यता पर बल दिया जाए।
- एफटीए वार्ता ढाँचे को सुदृढ़ बनाना: भविष्य के एफटीए भारत के आर्थिक एवं रणनीतिक हितों की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करें, इसके लिए व्यापार वार्ताकारों के प्रदर्शन मूल्यांकन एवं जवाबदेही की व्यवस्था की जाए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत का विस्तारित होता मुक्त व्यापार समझौता (FTA) नेटवर्क अवसरों और चुनौतियों दोनों को प्रस्तुत करता है। भारत की एफटीए रणनीति की सीमाओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए तथा ऐसे सुधार सुझाइए जो यह सुनिश्चित करें कि एफटीए सतत आर्थिक विकास में प्रभावी योगदान दे सके। |
स्रोत: TH
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