तीन ‘C’ से आगे: भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों की नई शब्दावली

पाठ्यक्रम: GS2/ अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सन्दर्भ

  • वर्ष 2020 में स्थापित व्यापक सामरिक साझेदारी (Comprehensive Strategic Partnership) के तीन वर्ष बाद प्रधानमंत्री मोदी की ऑस्ट्रेलिया की तीसरी यात्रा इस बात की परीक्षा है कि क्या संबंधों का स्वयं को “टी-20 मोड” बताना वास्तविक उपलब्धियों से मेल खाता है, अथवा व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में बढ़ती महत्वाकांक्षी घोषणाओं की तुलना में संस्थागत क्रियान्वयन अब भी पीछे है।

व्यापार और निवेश: आधारभूत स्तंभ

  • शुल्क-मुक्त पहुँच: ECTA के अंतर्गत भारत के सभी निर्यातों को ऑस्ट्रेलिया में शुल्क-मुक्त प्रवेश प्राप्त है, जिससे वस्त्र, औषधि, रसायन, अभियांत्रिकी उत्पाद, रत्न एवं आभूषण क्षेत्रों को लाभ मिलता है। वहीं भारत, ऑस्ट्रेलिया के व्यापार मूल्य के 90% हिस्से के लिए महत्त्वपूर्ण खनिज, ऊन, एवोकाडो और मैकाडामिया जैसे उत्पादों को वरीयतापूर्ण पहुँच प्रदान करता है।
  • व्यापार लक्ष्य: दोनों देशों का लक्ष्य वर्ष 2025 के 33 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार को वर्ष 2030 तक 100 अरब डॉलर तक पहुँचाना है।
  • निवेश प्रवाह: दोनों देशों के बीच संचयी द्विपक्षीय निवेश लगभग 50 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है। ऑस्ट्रेलिया की एयरट्रंक (AirTrunk) भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के अनुकूल डेटा केंद्रों के लिए 30 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रही है। वहीं भारतीय स्वामित्व वाली परदमन केमिकल्स (Perdaman Chemicals) ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा यूरिया संयंत्र (4.5 अरब डॉलर) स्थापित कर रही है, जिसके 98% से अधिक मॉड्यूल भारत में निर्मित किए गए हैं। यह विपरीत विनिर्माण (Reverse Manufacturing) संबंध का एक उदाहरण है।

रक्षा: सबसे तेज़ी से विकसित होता स्तंभ

  • संस्थागत त्रि-सेवा आदान-प्रदान तथा AUSINDEX, मालाबार और Talisman Sabre जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यास समुद्री पारस्परिक संचालन क्षमता को सुदृढ़ करते हैं।
  • साइबर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ड्रोन जैसे क्षेत्रों में उभरता सहयोग भारत की बढ़ती जहाज निर्माण क्षमता से जुड़ा हुआ है।
  • पारस्परिक लॉजिस्टिक सहायता समझौता (MLSA) दोनों देशों को एक-दूसरे की सुविधाओं तक पारस्परिक पहुँच प्रदान करता है, जिससे लॉजिस्टिक सहयोग और समुद्री क्षेत्रीय जागरूकता मजबूत होती है।
  • ‘2+2 मंत्रिस्तरीय संवाद’ के अंतर्गत ऑस्ट्रेलिया और भारत के विदेश एवं रक्षा मंत्री प्रत्येक दो वर्ष में रणनीतिक, रक्षा तथा क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर चर्चा करते हैं, जिससे उनकी व्यापक सामरिक साझेदारी और सुदृढ़ होती है।

ऊर्जा और शिक्षा: नए “E”

  • स्वच्छ ऊर्जा: सोलर टास्कफोर्स और ग्रीन हाइड्रोजन टास्कफोर्स महत्त्वपूर्ण खनिजों, विनिर्माण तथा रूफटॉप सौर ऊर्जा के क्षेत्रों में नवीकरणीय सहयोग का आधार हैं।
  • नागरिक परमाणु क्षमता: यूरेनियम निर्यात व्यवस्था के शीघ्र अंतिम रूप लेने की संभावना बताई जा रही है, जो कुछ शर्तों के साथ भारत की नागरिक परमाणु महत्वाकांक्षाओं को महत्वपूर्ण बढ़ावा दे सकती है।
  • शिक्षा: एक लाख से अधिक भारतीय विद्यार्थी ऑस्ट्रेलिया में अध्ययन कर रहे हैं, जबकि ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों के परिसर अब भारत में भी संचालित हो रहे हैं। दोनों देशों के बीच संयुक्त अनुसंधान उन्नत संगणना, स्वास्थ्य तथा अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में हो रहा है।
  • कौशल विकास और गतिशीलता: सौर ऊर्जा और खनन क्षेत्रों (गुजरात, उत्तर प्रदेश और ओडिशा) में व्यावसायिक कौशल हस्तांतरण, अस्थायी श्रमिक नियुक्तियों के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया में कार्यबल की कमी को दूर करने में सहायक है, यद्यपि रोजगार वीज़ा मार्गों का अभी पूर्ण उपयोग नहीं हो पाया है।

खेल और प्रवासी समुदाय: उभरती हुई सॉफ्ट पावर के माध्यम

  • दस लाख से अधिक भारतीय मूल का प्रवासी समुदाय, जिसे “जीवंत सेतु (Living Bridge)” कहा जाता है, दोनों देशों के बीच जन-से-जन संबंधों का प्रमुख आधार है।
  • 2030 राष्ट्रमंडल खेल तथा 2032 ब्रिस्बेन ओलंपिक खेल प्रशिक्षण, खेल चिकित्सा तथा अवसंरचना सहयोग के लिए महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।
  • कबड्डी और खो-खो जैसे पारंपरिक भारतीय खेल प्रवासी समुदाय से आगे भी लोकप्रिय हो रहे हैं, जो भारतीय सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर के प्रसार का संकेत है।

लघु-बहुपक्षीय (Minilateral) संरचना: केंद्रित आपूर्ति श्रृंखलाओं का संतुलन

  • त्रिपक्षीय प्रारूप (भारत–इंडोनेशिया–ऑस्ट्रेलिया, भारत–फ्रांस–ऑस्ट्रेलिया),ऑस्ट्रेलिया–कनाडा–भारत प्रौद्योगिकी एवं नवाचार साझेदारी (नवंबर 2025 में प्रारंभ) तथा भारत–जापान–ऑस्ट्रेलिया आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन पहल का उद्देश्य महत्त्वपूर्ण खनिजों, दुर्लभ मृदा तत्वों(Rare earth elements) और सेमीकण्डक्टर के सन्दर्भ में बाज़ार के प्रभुत्व का संतुलन स्थापित करना है। यह परोक्ष रूप से चीन की केंद्रित आपूर्ति पर निर्भरता की प्रतिक्रिया है।
  • प्रस्तावित भारत–ऑस्ट्रेलिया–संयुक्त अरब अमीरात त्रिपक्षीय व्यवस्था अभी अंतिम रूप नहीं ले सकी है।
  • क्वाड, हिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय संगठन (IORA) तथा प्रशांत द्वीपीय देशों के साथ स्वास्थ्य, वित्तीय प्रौद्योगिकी (Fintech) और आपदा राहत के क्षेत्रों में व्यापक सहयोग जारी है।

चुनौतियाँ/चिंताएँ

  • संस्थागत विकास से तेज़ बढ़ती घोषणाएँ: संबंधों को लगातार नए नाम दिए जा रहे हैं—तीन ‘सी’ से तीन ‘डी’ और अब विकास, रक्षा, ऊर्जा एवं शिक्षा। किंतु केवल नए नाम देने से धरातल पर नए परिणाम स्वतः प्राप्त नहीं होते।
  • सशर्त प्रतिबद्धताएँ: यूरेनियम निर्यात अभी केवल “संभावित” है, अंतिम रूप से संपन्न नहीं हुआ है।
  • प्रारंभिक अवस्था के तंत्र: वर्ष 2025 के अंत में प्रारंभ हुई प्रौद्योगिकी एवं नवाचार साझेदारी का अभी तक कोई ठोस क्रियान्वयन रिकॉर्ड नहीं है।
  • अपर्याप्त उपयोग: रोजगार-आधारित वीज़ा कार्यक्रम लागू होने के बावजूद उनका पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है।
  • नेतृत्व-निर्भर गति: प्रगति का बड़ा भाग शीर्ष नेतृत्व के व्यक्तिगत तालमेल पर आधारित माना जाता है, न कि बाध्यकारी संस्थागत व्यवस्थाओं पर। इससे वर्तमान नेतृत्व के बाद संबंधों की स्थिरता को लेकर चिंता बनी रहती है।

आगे की राह

  • विशेष रूप से यूरेनियम निर्यात तथा प्रौद्योगिकी साझेदारी जैसे सैद्धांतिक समझौतों को बाध्यकारी तथा समयबद्ध समझौतों में परिवर्तित किया जाए।
  • केवल संयुक्त सैन्य अभ्यासों तक सीमित न रहकर उभरती प्रौद्योगिकियों में संयुक्त उत्पादन के माध्यम से रक्षा औद्योगिक सहयोग को सुदृढ़ किया जाए।
  • वीज़ा तथा कौशल गतिशीलता के संस्थागत तंत्रों को मजबूत बनाया जाए ताकि माँग और उपयोग के बीच बेहतर संतुलन स्थापित हो सके।
  • लघु-बहुपक्षीय सहयोग को केवल घोषणात्मक स्तर तक सीमित न रखकर उसे कार्यक्षम (functional) आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन परियोजनाओं में परिवर्तित किया जाए।

निष्कर्ष

  • भारत–ऑस्ट्रेलिया संबंध सभ्यतागत निकटता के संक्षिप्त प्रतीक से आगे बढ़कर एक बहुआयामी और ठोस साझेदारी में विकसित हो चुके हैं, जिसे विशेष रूप से चीन की आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभुत्व संबंधी साझा चिंताओं ने आकार दिया है। किंतु इस गति को बनाए रखने के लिए व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में संस्थागत क्रियान्वयन तंत्र को सुदृढ़ करना आवश्यक है, ताकि संबंध केवल शीर्ष नेताओं की व्यक्तिगत समझ पर निर्भर न रहें।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] “भारत–ऑस्ट्रेलिया व्यापक सामरिक साझेदारी की शब्दावली का विस्तार तो तेज़ी से हुआ है, किंतु उसका संस्थागत विकास अभी भी घोषणाओं से पीछे है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

स्रोत: TH

 

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