एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा रूपरेखा: भारत के ऊर्जा भविष्य के लिए 

पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा

संदर्भ

  • हाल ही में, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) ने एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा रूपरेखा के महत्त्व को रेखांकित किया है। इसका उद्देश्य वर्ष 2047 तक ऊर्जा आत्मनिर्भरता तथा 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्यों को आगे बढ़ाते हुए भारत की ऊर्जा सुरक्षा, सततता एवं विकासात्मक उद्देश्यों के मध्य समन्वय स्थापित करना है।

भारत की वर्तमान ऊर्जा स्थिति

  • भारत विश्व के सबसे तीव्र गति से विकसित हो रहे ऊर्जा बाज़ारों में से एक है। विगत एक दशक में देश ने ऊर्जा उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा अपने ऊर्जा मिश्रण के विस्तार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं—
    • सौभाग्य योजना : प्रत्येक परिवार तक सार्वभौमिक विद्युत कनेक्शन उपलब्ध कराना।
    • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY): स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन की उपलब्धता का विस्तार।
    • नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता में वृद्धि: वर्ष 2015 में लगभग 40 गीगावाट (GW) से बढ़ाकर वर्ष 2025 में लगभग 260 गीगावाट तक।
    • विश्व का तीसरा सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक बनना।
    • वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता तथा 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य।
  • भारत में एकीकृत ऊर्जा विकास को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक पहलें संचालित की जा रही हैं। इनमें प्रमुख हैं—
    • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन 
    • राष्ट्रीय सौर मिशन 
    • कृषि के सौरकरण हेतु पीएम-कुसुम योजना 
    • राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति, 2018
    • विद्युत गतिशीलता हेतु फेम योजना
    • संशोधित वितरण क्षेत्र योजना 
    • वन नेशन–वन ग्रिड पहल
    • राष्ट्रीय स्मार्ट ग्रिड मिशन
    • अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन 
    • COP-26 में घोषित ‘पंचामृत’ प्रतिबद्धताएँ
  • हालाँकि, आधारभूत ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा औद्योगिक गतिविधियों को समर्थन प्रदान करने में कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों का महत्त्व अभी भी बना हुआ है।
  • इसके अतिरिक्त, भारत की ऊर्जा व्यवस्था अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, जिनमें प्रमुख हैं—
    • ऊर्जा आयात पर निर्भरता,
    • ऊर्जा की बढ़ती खपत,
    • विखंडित प्रशासनिक व्यवस्था,
    • ऊर्जा की वहनीयता संबंधी चिंताएँ,
    • क्षेत्रीय एवं सामाजिक असमानताएँ।

भारत को एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा रूपरेखा की आवश्यकता 

  • भारत की ऊर्जा प्रणाली की बढ़ती जटिलता को देखते हुए योजना निर्माण एवं शासन के लिए एक समान एवं समन्वित रूपरेखा विकसित करना आवश्यक हो गया है। ऐसी एकीकृत रूपरेखा निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति करेगी—
    • विविधीकृत एवं सुदृढ़ ऊर्जा प्रणालियों के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना।
    • विभिन्न ईंधनों, प्रौद्योगिकियों एवं संस्थानों के मध्य समन्वय को सुदृढ़ करना।
    • आर्थिक विकास, वहनीयता एवं सततता के उद्देश्यों के मध्य संतुलन स्थापित करना।
    • हरित हाइड्रोजन, बैटरी ऊर्जा भंडारण तथा कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) जैसी उभरती ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए दीर्घकालिक योजना तैयार करना।
    • संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित करना तथा नीतियों के क्रियान्वयन में दोहराव को कम करना।
    • वर्ष 2047 तक ऊर्जा आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की प्राप्ति में सहयोग करना।
  • भारत का ऊर्जा संक्रमण केवल एक ईंधन स्रोत से दूसरे स्रोत की ओर परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ऊर्जा प्रणाली में व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन के रूप में देखा जाना चाहिए।

आईएनएसए द्वारा प्रस्तावित एकीकृत ऊर्जा रूपरेखा के प्रमुख स्तंभ

  • पर्याप्तता: यह स्तंभ विश्वसनीय एवं विविधीकृत ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य भविष्य की चुनौतियों के प्रति ऊर्जा प्रणाली की लचीलापन बढ़ाना तथा उसकी संवेदनशीलता को कम करना है। इस स्तंभ के अंतर्गत प्रमुख रणनीतियाँ हैं—
    • पारंपरिक एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का संतुलित उपयोग।
    • ऊर्जा परिवहन एवं वितरण प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण।
    • ऊर्जा भंडारण क्षमता में वृद्धि।
    • ऊर्जा प्रबंधन में डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना।
  • ऊर्जा तक पहुँच: इस स्तंभ का उद्देश्य सभी नागरिकों को विश्वसनीय, गुणवत्तापूर्ण एवं समानतापूर्ण ऊर्जा सेवाएँ उपलब्ध कराना है। प्राथमिकता के प्रमुख क्षेत्र हैं—
    • अंतिम छोर तक ऊर्जा संपर्क सुनिश्चित करना।
    • विद्युत आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार।
    • विकेन्द्रीकरण के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों का विस्तार।
    • स्वच्छ खाना पकाने हेतु ऊर्जा की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • वहनीयता: आर्थिक विकास तथा औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए सुलभ एवं किफायती ऊर्जा अत्यंत आवश्यक है। अतः आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य ऊर्जा संक्रमण इस रूपरेखा का महत्वपूर्ण आधार है। इस स्तंभ का प्रमुख फोकस निम्नलिखित है—
    • उपभोक्ता संरक्षण।
    • ऊर्जा बाज़ार की दक्षता में वृद्धि।
    • वित्तीय नवाचार को प्रोत्साहन।
    • स्वच्छ प्रौद्योगिकियों का लागत-प्रभावी विस्तार।
  • सततता : सततता के संदर्भ में यह रूपरेखा सभी देशों के लिए समान दृष्टिकोण अपनाने के बजाय भारत की विकासात्मक प्राथमिकताओं को आधार बनाती है। इसकी प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं—
    • क्षेत्रीय स्तर पर न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण।
    • जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर समुदायों को सहायता प्रदान करना।
    • कार्यबल के कौशल विकास को प्रोत्साहित करना।
    • विकासोन्मुख होने के साथ-साथ पर्यावरणीय दृष्टि से सतत समाधान विकसित करना।
  • इसके अतिरिक्त, सर्कुलर अर्थव्यवस्था तथा कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण को इस रूपरेखा के अंतर्व्यापी सक्षमकारी घटकों के रूप में माना गया है।

आगे की राह : भारत के ऊर्जा पारितंत्र को सुदृढ़ बनाने हेतु आवश्यक कदम

  • संस्थागत उपाय : विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों के मध्य समन्वय को सुदृढ़ करने के लिए ऊर्जा शासन की एक राष्ट्रीय स्तर की समन्वित रूपरेखा का निर्माण किया जाए।
  • ऊर्जा अवसंरचना का विकास : विद्युत पारेषण अवसंरचना, स्मार्ट ग्रिड अवसंरचना तथा बैटरी भंडारण अवसंरचना का आधुनिकीकरण एवं विस्तार किया जाए।
  • नवीकरणीय ऊर्जा को तीव्र गति प्रदान करना : नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों, अपतटीय पवन ऊर्जा , हरित हाइड्रोजन तथा उन्नत जैव-ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के व्यापक अपनाने को प्रोत्साहित किया जाए।
  • घरेलू विनिर्माण क्षमता में सुधार: ‘मेक इन इंडिया’ पहल के माध्यम से ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित घरेलू विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ एवं प्रतिस्पर्धी बनाया जाए।
  • न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण : जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर समुदायों के लिए सामाजिक सुरक्षा, पुनः कौशल विकास  तथा आजीविका के विविधीकरण की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
  • वित्तपोषण एवं नवाचार : अत्याधुनिक ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के विकास हेतु अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश बढ़ाया जाए तथा नवाचार-आधारित वित्तपोषण तंत्र को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष 

  • भारत का ऊर्जा संक्रमण केवल अधिक ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य एक ऐसे ऊर्जा पारितंत्र का निर्माण करना है जो सुदृढ़ , किफायती  तथा सतत हो।
  • भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) द्वारा प्रस्तावित एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा रूपरेखा एक समग्र रणनीति है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा क्षेत्र की विभिन्न विखंडित नीतियों एवं रणनीतियों को एकीकृत करते हुए उन्हें राष्ट्र के विकासात्मक लक्ष्यों के अनुरूप समन्वित करना है।
  • वर्ष 2047 तक ऊर्जा आत्मनिर्भरता तथा 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इस प्रकार का समन्वित, समग्र एवं दीर्घदृष्टिपूर्ण प्रयास अत्यंत आवश्यक होगा।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत के ऊर्जा संक्रमण के लिए क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति के स्थान पर एकीकृत एवं भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप दृष्टिकोण की आवश्यकता है। भारत के ऊर्जा भविष्य के संदर्भ में एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा रूपरेखा के महत्त्व का परीक्षण कीजिए।

स्रोत: TH

 

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