इंदिरा पॉइन्ट
पाठ्यक्रम: जीएस-1/ भूगोल
सन्दर्भ
- श्री विजया पुरम (पोर्ट ब्लेयर) स्थित लाइटहाउस और लाइटशिप निदेशालय (Directorate of Lighthouses and Lightships) ने इंदिरा प्वाइंट पर संरक्षण एवं विकास कार्यों के लिए अंडमान एवं निकोबार तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण तथा पर्यावरण मंत्रालय से स्वीकृति का अनुरोध किया है।
इंदिरा प्वाइंट (Indira Point) क्या है?

- इंदिरा प्वाइंट भारत का सबसे दक्षिणी स्थल बिंदु है।
- यह अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के ग्रेट निकोबार द्वीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित है।
- पहले इसका नाम पिग्मेलियन प्वाइंट (Pygmalion Point) था। वर्ष 1985 में इसका नाम बदलकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में इंदिरा प्वाइंट रखा गया।
- यहाँ स्थित प्रकाशस्तंभ (Lighthouse) वर्ष 1972 में स्थापित किया गया था और वर्ष 1975 से कार्यरत है।
- 26 दिसंबर 2004 की हिंद महासागर सुनामी के दौरान ग्रेट निकोबार द्वीप लगभग 4.25 मीटर तक धँस गया, जिसके कारण इंदिरा प्वाइंट का एक भाग समुद्र में डूब गया तथा प्रकाशस्तंभ के आसपास का क्षेत्र भी प्रभावित हुआ।
- यह क्षेत्र मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के निकट स्थित होने के कारण रणनीतिक एवं समुद्री दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस परियोजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति की आवश्यकता क्यों है?
- परियोजना स्थल पारिस्थितिकीय दृष्टि से संवेदनशील द्वीपीय तटीय विनियमन क्षेत्र (ICRZ) की श्रेणियों में आता है।
- ICRZ-1A के नियम अधिकांश विकास गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाते हैं। केवल पारिस्थितिकी पर्यटन, सड़क निर्माण (स्टिल्ट पर बनी सड़कों सहित) तथा विशेष परिस्थितियों में रक्षा, सामरिक अथवा सार्वजनिक उपयोगिता परियोजनाओं को अनुमति दी जाती है, बशर्ते विस्तृत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन किया गया हो।
- ICRZ-IV के अंतर्गत भूमि पुनर्भरण, तटबंध (Bunding) तथा तटीय कटाव नियंत्रण जैसी कुछ गतिविधियों की अनुमति एवं विनियमन किया जाता है।
स्रोत: IE
इंडियाहैंडमेड
पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
सन्दर्भ
- इंडियाहैंडमेड एक समर्पित डिजिटल मार्केटप्लेस बाज़ार है, जो भारत की हथकरघा एवं हस्तशिल्प परंपराओं को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ता है।
परिचय
- वर्तमान में भारत में लगभग 64.66 लाख हथकरघा एवं हस्तशिल्प कारीगर हैं।
- इस कार्यबल में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी है। वर्ष 2025 तक हथकरघा बुनकरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 71% तथा कुल कारीगरों में 64% है।
- इंडियाहैंडमेड का शुभारंभ वर्ष 2023 में किया गया था, ताकि हस्तनिर्मित उत्पादों की पहचान को बढ़ावा दिया जा सके तथा विक्रेताओं के लिए व्यापक बाज़ार उपलब्ध कराया जा सके।
- विकसितकर्ता: वस्त्र मंत्रालय के अंतर्गत डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन।
- मुख्य विशेषताएँ:
- विशेषीकृत ऑनलाइन बाज़ार: यह बुनकरों एवं कारीगरों को अपने हथकरघा एवं हस्तशिल्प उत्पाद ऑनलाइन बेचने की सुविधा प्रदान करता है।
- खरीदारों से सीधा संपर्क: कारीगरों एवं बुनकरों को सीधे खरीदारों से जोड़ता है, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम होती है तथा उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है।
- डिजिटल सशक्तिकरण: कारीगरों एवं बुनकरों को डिजिटल उपकरण तथा ऑनलाइन पहचान उपलब्ध कराई जाती है, जिससे वे ई-वाणिज्य में अधिक प्रभावी ढंग से भाग ले सकें।
- इस मंच पर परिधान, घरेलू सजावट, गृह-सज्जा सामग्री, चित्रकला, फर्नीचर, धार्मिक वस्तुएँ, स्टेशनरी, संगीत वाद्ययंत्र, आभूषण, बैग तथा जूते-चप्पल सहित अनेक प्रकार के उत्पाद उपलब्ध हैं।
- यह भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त उत्पादों तथा एक जिला–एक उत्पाद (ODOP) श्रेणी के उत्पादों को भी विशेष रूप से प्रदर्शित करता है।
स्रोत: PIB
भारतीय बॉण्डों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का रिकॉर्ड निवेश प्रवाह
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- सामान्य सीमा (General Limit) के अंतर्गत ऋण प्रतिभूतियों (Debt Securities) में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का प्रवाह जून 2026 में ₹55,518 करोड़ रहा ।
परिचय
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) से तात्पर्य विदेशी व्यक्तियों, संस्थागत निवेशकों अथवा निधियों द्वारा शेयर, बॉण्ड, म्यूचुअल फंड तथा सरकारी प्रतिभूतियों जैसे वित्तीय साधनों में किए गए निवेश से है।
- FPI निवेशक जिन कंपनियों में निवेश करते हैं, उनके प्रबंधन अथवा निर्णय-निर्माण में भाग नहीं लेते तथा सामान्यतः निष्क्रिय निवेशक (Passive Investors) माने जाते हैं।
- विदेशी संस्थागत निवेश (FII), FPI की एक श्रेणी है, जिसमें म्यूचुअल फंड, पेंशन फंड, बीमा कंपनियाँ तथा हेज फंड जैसे विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा निवेश किया जाता है।
- ये संस्थाएँ सामूहिक निधियों का निवेश वित्तीय बाज़ारों में करती हैं तथा निवेश संबंधी अनुसंधान एवं निर्णय लेने में अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
- सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs) केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक परियोजनाओं के वित्तपोषण, राजकोषीय घाटे के प्रबंधन तथा बाज़ार में तरलता नियंत्रण के लिए जारी की जाने वाली व्यापार योग्य ऋण प्रतिभूतियाँ हैं।
- विदेशी निवेशक सामान्य मार्ग (General Route) तथा पूर्णतः सुलभ मार्ग (Fully Accessible Route–FAR) के माध्यम से भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश कर सकते हैं।
पूंजीगत लाभ (Capital Gains)का वर्गीकरण :
दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (LTCG): जब सरकारी प्रतिभूति निर्धारित न्यूनतम अवधि से अधिक समय तक धारण की जाती है।
- सूचीबद्ध (Listed) सरकारी प्रतिभूतियाँ: 12 माह से अधिक।
- असूचीबद्ध (Unlisted) सरकारी प्रतिभूतियाँ: 24 माह से अधिक।
अल्पकालिक पूंजीगत लाभ (STCG): जब सरकारी प्रतिभूति निर्धारित अवधि से कम समय तक धारण की जाती है।
- सूचीबद्ध सरकारी प्रतिभूतियाँ: 12 माह तक।
- असूचीबद्ध सरकारी प्रतिभूतियाँ: 24 माह तक।
- वैश्विक पूंजी को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी कर व्यवस्था के महत्व को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) तथा विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के लिए कर छूट की व्यवस्था की है।

स्रोत: TH
विक्रम-1 भारत की अंतरिक्ष नवाचार क्षमता का प्रदर्शन करेगा
पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
सन्दर्भ
- स्काईरूट एयरोस्पेस ने घोषणा की है कि मिशन आगमन के दौरान विक्रम-1 छह पेलोड (Payloads) को अंतरिक्ष में ले जाएगा।
विक्रम-1 क्या है?
- विक्रम-1 एक चार-चरणीय कक्षीय प्रक्षेपण यान (Orbital Launch Vehicle) है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस ने विकसित किया है।
- इसके प्रथम तीन चरण ठोस ईंधन (Solid Fuel) आधारित हैं, जो प्रारंभिक चरण में शक्तिशाली प्रणोदन प्रदान करते हैं, जबकि अंतिम हाइपरगोलिक द्रव ईंधन (Hypergolic Liquid) चरण सटीक कक्षीय संचालन (Orbital Manoeuvres) में सहायता करता है।
- यह भारत का पहला निजी क्षेत्र द्वारा विकसित कक्षीय श्रेणी का रॉकेट है।
- विक्रम-1 निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit–LEO) में 350 किलोग्राम तथा सूर्य-समकालिक कक्षा (Sun-Synchronous Orbit–SSO) में 260 किलोग्राम तक का पेलोड स्थापित कर सकता है।
विक्रम-1 द्वारा प्रक्षेपित किए जाने वाले पेलोड
रचनात्मकता एवं भारत की वैज्ञानिक विरासत को समर्पित पेलोड
- कॉस्मिक ब्लूम (Cosmic Bloom): कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा विकसित, जिसमें एल्यूमिनियम आधार प्लेट पर हीरे के आभूषण की विशेष कलाकृति स्थापित की गई है।
- माइक्रोआर्ट (Microart): 18 कैरेट स्वर्ण से निर्मित एक रॉकेट, जिसमें सर सी. वी. रमन, डॉ. विक्रम साराभाई तथा डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की सूक्ष्म मूर्तियाँ स्थापित हैं, जिनमें से प्रत्येक चावल के एक दाने से भी छोटी है।
- प्रौद्योगिकी प्रदर्शन पेलोड:कॉसमोसर्व (Cosmoserve) द्वारा विकसित रोबोटिक भुजाएँ (Robotic Arms)।
- ग्राहा स्पेस (Grahaa Space) द्वारा विकसित SOLARAS।
- स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित SCOPE।
- एक अंतर्राष्ट्रीय पेलोड uD3PP एवं mD3RN, जिन्हें जर्मनी की डीक्यूब्ड जीएमबीएच (Dcubed GmbH) ने विकसित किया है।
एफडीए द्वारा पहली PROTAC दवा को मंजूरी
पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
सन्दर्भ
- अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने ESR1 उत्परिवर्तनयुक्त (ESR1-mutated), ER-पॉज़िटिव तथा HER2-नेगेटिव एडवांस ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित रोगियों के लिए वेपडेजेस्ट्रेंट (Vepdegestrant) दवा को मंजूरी प्रदान की है।
परिचय
- यह विश्व की पहली FDA-अनुमोदित चिकित्सा है, जो PROTAC (Proteolysis-Targeting Chimera) प्रौद्योगिकी पर आधारित है।
- यह स्वीकृति उन दवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त करती है, जो हानिकारक प्रोटीनों को केवल ब्लॉक (Block) करने के बजाय कोशिकाओं से पूरी तरह हटाने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।
PROTAC कैसे कार्य करता है?
- PROTAC का पूरा नाम प्रोटियोलाइसिस-टार्गेटिंग काइमेरा (Proteolysis-Targeting Chimera) है। यह एक विशेष प्रकार का अणु है, जिसे कोशिका से विशिष्ट प्रोटीनों को हटाने के लिए बनाया गया है।
PROTAC के दो सिरे होते हैं—
- एक सिरा टारगेट प्रोटीन (Target Protein) से जुड़ता है।
- दूसरा सिरा E3 लाइगेज़ (E3 Ligase) नामक एंजाइम से जुड़ता है, जो कोशिका में प्रोटीन अपघटन (Protein Degradation) की प्रक्रिया में भाग लेता है।
- इन दोनों को जोड़कर PROTAC लक्ष्य प्रोटीन को कोशिका द्वारा नष्ट (Degrade) करा देता है। इस प्रक्रिया को लक्षित प्रोटीन अपघटन (Targeted Protein Degradation) कहा जाता है।
महत्व
- पारंपरिक दवाएँ प्रोटीन से जुड़कर उसकी कार्यक्षमता को रोकती हैं। इसलिए प्रभाव बनाए रखने के लिए उनका लंबे समय तक शरीर में उपस्थित रहना आवश्यक होता है।
- इसके विपरीत, PROTAC उत्प्रेरक (Catalyst) की तरह कार्य करता है। लक्ष्य प्रोटीन नष्ट हो जाता है, जबकि स्वयं PROTAC नष्ट नहीं होता।
- एक बार किसी प्रोटीन के अपघटन की प्रक्रिया प्रारंभ करने के बाद PROTAC उससे अलग होकर उसी प्रकार के दूसरे प्रोटीन को भी नष्ट कर सकता है। इस प्रकार एक ही PROTAC अणु अनेक बार कार्य कर सकता है।
स्रोत: TH
सबसे प्राचीन क्वासारों की खोज
पाठ्यक्रम: जीएस-3/अंतरिक्ष
सन्दर्भ
- यूक्लिड स्पेस टेलिस्कोप (Euclid Space Telescope) ने अब तक खोजे गए सबसे प्राचीन क्वासारों का पता लगाया है, जिससे वैज्ञानिकों के समक्ष लंबे समय से बनी एक ब्रह्मांडीय पहेली और गहरी हो गई है।
परिचय
- क्वासार किसी दूरस्थ आकाशगंगा का अत्यधिक चमकीला केंद्र होता है, जिसे अतिविशाल ब्लैक होल ऊर्जा प्रदान करता है।
- जब गैस ब्लैक होल की ओर सर्पिलाकार गति से गिरती है, तो गुरुत्वाकर्षण ऊर्जा का अत्यधिक भाग विकिरण में परिवर्तित हो जाता है, जिससे क्वासार एक लाख करोड़ (Trillion) सूर्यों के समान चमकता है।
- क्वासार आकाशगंगाओं तथा ब्लैकहोल के प्रारंभिक विकास को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
- सबसे प्राचीन क्वासार युग्म से प्राप्त प्रकाश उस समय का है, जब ब्रह्मांड की आयु लगभग 67 करोड़ वर्ष थी, जो वर्तमान 13.8 अरब वर्ष की आयु का केवल 5% है।
- इस खोज ने वर्ष 2021 में स्थापित सबसे प्राचीन एवं सबसे दूरस्थ क्वासार के रिकॉर्ड को लगभग 2 करोड़ वर्ष से पीछे छोड़ दिया है।
ब्लैक होल
- ब्लैकहोल अत्यधिक घनत्व वाली ऐसी खगोलीय वस्तु है, जिसका गुरुत्वाकर्षण इतना प्रबल होता है कि प्रकाश भी उससे बाहर नहीं निकल सकता।
- इसकी कोई ठोस सतह नहीं होती। यह अंतरिक्ष का वह क्षेत्र है, जहाँ पदार्थ अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण अत्यधिक संकुचित हो जाता है।
- इस विनाशकारी संकुचन से अत्यधिक द्रव्यमान अत्यंत छोटे क्षेत्र में केंद्रित हो जाता है।
- ब्लैकहोल का निर्माण: जब अत्यधिक विशाल तारे का नाभिकीय ईंधन समाप्त हो जाता है, तो वह विस्फोटित होकर अपने ही भार के कारण भीतर की ओर धँस जाता है और ब्लैकहोल का निर्माण होता है।
- ब्लैकहोल के केंद्र में गुरुत्वीय विलक्षणता (Gravitational Singularity) होती है, जहाँ सामान्य सापेक्षता सिद्धांत (General Theory of Relativity) लागू नहीं होता।
- ब्लैकहोल का अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण इसी विलक्षणता (singularity) से उत्पन्न होता प्रतीत होता है।
क्या आप जानते हैं?
ज्ञात ब्लैकहोल मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—
- तारकीय द्रव्यमान (Stellar Mass): सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 5 से कई दर्जन गुना।
- अतिविशाल (Supermassive): सूर्य के द्रव्यमान का 1 लाख से अरबों गुना।
- इनके बीच मध्यम द्रव्यमान (Intermediate Mass) वाले ब्लैकहोल्स के अस्तित्व की संभावना है, किंतु अब तक उनकी पुष्टि नहीं हुई है।
- स्पेगेटीकरण (Spaghettification): जब कोई वस्तु ब्लैकहोल के इवेंट होराइजन (Event Horizon) के निकट पहुँचती है, तो वह क्षैतिज दिशा में संकुचित तथा ऊर्ध्वाधर दिशा में अत्यधिक खिंच जाती है, ठीक स्पेगेटी की तरह।
- पृथ्वी के सबसे निकट ज्ञात ब्लैकहोल गैया BH1 (Gaia BH1) है, जो लगभग 1,500 प्रकाश-वर्ष दूर स्थित है।
- सैजिटेरियस A (Sagittarius A*)* पृथ्वी से 25,000 से अधिक प्रकाश-वर्ष दूर स्थित निकटतम अतिविशाल ब्लैकहोल है, जिसका द्रव्यमान सूर्य से लाखों गुना अधिक है।
- शोधकर्ता इसे संक्षेप में Sgr A* (उच्चारण: सैजिटेरियस ए स्टार) कहते हैं। यह धनु (Sagittarius) तारामंडल में आकाशगंगा (Milky Way) के केंद्र में स्थित है।
स्रोत: TH
आईएनएस महेंद्रगिरि
पाठ्यक्रम: जीएस-3/रक्षा
सन्दर्भ
- भारतीय नौसेना विशाखापट्टनम में परियोजना-17A के अंतर्गत निर्मित छठे स्वदेशी स्टेल्थ फ्रिगेट आईएनएस महेंद्रगिरि (F38) को नौसेना में शामिल करने जा रही है।
परिचय
- पूर्वी घाट की महेंद्रगिरि पर्वतमाला के नाम पर रखे गए इस स्टेल्थ फ्रिगेट का डिज़ाइन भारतीय नौसेना के युद्धपोत डिज़ाइन ब्यूरो (Warship Design Bureau) ने तैयार किया है तथा इसका निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई ने किया है।
- यह आधुनिक संयुक्त डीज़ल अथवा गैस (CODOG) प्रणोदन प्रणाली से संचालित है, जो इसे उच्च गति एवं समुद्री अभियानों में लंबी परिचालन क्षमता प्रदान करती है।
- यह युद्धपोत स्वदेशी एवं अत्याधुनिक हथियारों तथा सेंसर्स(Sensors) से सुसज्जित है, जिनमें—
- सतह से सतह पर मार करने वाली प्रक्षेपास्त्र प्रणालियाँ,
- सतह से वायु में मार करने वाली प्रक्षेपास्त्र प्रणालियाँ,
- उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली,
- व्यापक पनडुब्बी रोधी युद्ध प्रणाली,
- तथा एकीकृत युद्ध प्रबंधन प्रणाली शामिल हैं।
- 75% से अधिक स्वदेशी सामग्री के उपयोग के साथ आईएनएस महेंद्रगिरि आत्मनिर्भर भारत पहल का उत्कृष्ट उदाहरण है।
परियोजना-17A (नीलगिरि श्रेणी कार्यक्रम)
- परियोजना-17A को परियोजना-17 (शिवालिक श्रेणी) के फ्रिगेटों की अगली पीढ़ी के रूप में विकसित किया गया है।
- इसके अंतर्गत कुल 7 स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं—
- 4 का निर्माण मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL), मुंबई द्वारा।
- 3 का निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता द्वारा।
- इन युद्धपोतों का विस्थापन (Displacement) 6,670 टन, लंबाई 149 मीटर, अधिकतम गति 28
- 28 नॉट तथा 225 कर्मियों को साथ लेकर संचालन करने की क्षमता है।
स्रोत : PIB