तीव्र शुष्कीकरण की ओर अग्रसर भारत में जल सुरक्षा 

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन

संदर्भ

  • भारतीय शहर गंभीर जल-संकट का सामना कर रहे हैं, जो सतत एवं जलवायु-लचीले जल प्रबंधन के माध्यम से जल सुरक्षा को सुदृढ़ करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

भारत में जल-संकट की स्थिति

  • वैश्विक जनसंख्या का लगभग तीन-चौथाई भाग जल-असुरक्षित देशों में निवास करता है, जहाँ लगभग चार अरब लोग वर्ष में कम-से-कम एक माह तक गंभीर जल-अभाव का सामना करते हैं।
  • भारत में जल संसाधनों का वितरण अत्यंत असमान है। विश्व के कुल जल संसाधनों का केवल 4% भाग भारत के पास है, जबकि यहाँ विश्व की लगभग 18% जनसंख्या निवास करती है।
  • ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (CEEW) के शोध के अनुसार, भारत के 15 प्रमुख नदी बेसिनों में से 11 जल-संकट की स्थिति में हैं, जहाँ प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,700 घन मीटर से कम है।
  • इनमें कृष्णा, कावेरी, माही तथा ताप्ती नदी बेसिन जैसे कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,000 घन मीटर से भी कम है, जो जल-अभाव की सीमा मानी जाती है।

जल सुरक्षा के समक्ष चुनौतियाँ

  • जल प्रदूषण: औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज तथा कृषि अपवाह नदियों, झीलों, आर्द्रभूमियों एवं भूजल संसाधनों को प्रदूषित कर रहे हैं।
  • जल परिवहन के दौरान उच्च हानि : पाइपलाइनों में रिसाव तथा प्राचीन वितरण प्रणालियों के कारण अंतिम उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पूर्व ही पर्याप्त मात्रा में जल की हानि हो जाती है।
  • अपर्याप्त अपशिष्ट जल उपचार: इसके कारण अनुपचारित सीवेज नदियों एवं झीलों में प्रवाहित होता है, जिससे वे उपयोग के योग्य नहीं रह जातीं।
  • जलवायु परिवर्तन: तापमान में वृद्धि एवं अनियमित मानसून के कारण सूखे की घटनाओं की आवृत्ति बढ़ी है, जिससे जल-संबंधी तनाव में वृद्धि हुई है।
  • भूजल का अत्यधिक दोहन: कृषि, उद्योग एवं घरेलू उपयोग हेतु भूजल के अंधाधुंध दोहन के कारण अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर निरंतर गिर रहा है।
  • शहरीकरण: शहरी जनसंख्या एवं औद्योगिकीकरण में वृद्धि के कारण जल की मांग निरंतर बढ़ रही है।
  • अधिक जल-आधारित फसलों की खेती: जल-गहन फसलों की खेती भारत के स्वच्छ जल संसाधनों का बड़ा भाग उपभोग कर रही है, जिससे जल उपयोग दक्षता में कमी आ रही है।

जल सुरक्षा सुदृढ़ करने हेतु सरकारी पहलें

  • जल जीवन मिशन : यह योजना सुनिश्चित सिंचाई का विस्तार, खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता में सुधार तथा सतत जल संरक्षण को बढ़ावा देती है। इसके अंतर्गत ‘जल संचय’ (वर्षा जल संचयन) एवं ‘जल सिंचन’ (जल के दक्ष उपयोग) के माध्यम से सिंचाई प्रणाली को सुदृढ़ किया जाता है।
  • नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना: इस योजना का उद्देश्य नदी बेसिन स्तर पर जल संसाधनों की समेकित योजना, सर्वेक्षण एवं विकास को प्रोत्साहित करना है।
  • राष्ट्रीय जल मिशन : यह मिशन जल संरक्षण, जल की बर्बादी को न्यूनतम करने तथा जल संसाधनों के समान एवं न्यायसंगत वितरण पर बल देता है।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): यह योजना “प्रति बूंद अधिक फसल” के सिद्धांत के माध्यम से सिंचाई कवरेज बढ़ाने एवं जल उपयोग दक्षता में सुधार का लक्ष्य रखती है।
  • सूक्ष्म सिंचाई निधि : यह निधि राज्यों को ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों के विस्तार हेतु सहायता प्रदान करती है, जिससे जल उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सके।
  • अटल भूजल योजना : यह योजना जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में सामुदायिक सहभागिता पर आधारित भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देती है तथा व्यवहार परिवर्तन एवं स्थानीय भागीदारी के माध्यम से भूजल के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करती है।

जल सुरक्षा सुदृढ़ करने हेतु आवश्यक अन्य उपाय

  • जल अवसंरचना एवं जल सेवाओं के सूक्ष्म जलवायु जोखिम आकलन के माध्यम से जल प्रणालियों को जलवायु-प्रतिरोधी बनाने में निवेश किया जाना चाहिए। ऐसे आकलन तटीय एवं निम्न-स्थित क्षेत्रों सहित उच्च एवं अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में निवेश को प्राथमिकता देने में सहायक होते हैं।
  • शहरों को जल जोखिम आकलन हेतु अर्बन चैलेंज फंड (UCF) जैसी वर्तमान व्यवस्थाओं का प्रभावी उपयोग करना चाहिए।
    • उदाहरण: आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम को हाल ही में जलापूर्ति एवं जल निकासी परियोजनाओं के लिए UCF के अंतर्गत ₹1,501 करोड़ की स्वीकृति प्राप्त हुई है, जिसका एक भाग जल जोखिम आकलन पर भी व्यय किया जा सकता है।
  • स्वच्छ जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए जल उपयोग की रैखिक प्रणाली से चक्रीय प्रणाली की ओर संक्रमण आवश्यक है।
    • उपचारित जल का पुनः उपयोग वाहन धुलाई, उद्यानों के रख-रखाव तथा डेटा केंद्रों के शीतलन जैसे कार्यों में किया जा सकता है।
  • ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिए, क्योंकि ये पारंपरिक बाढ़ सिंचाई की अपेक्षा अधिक दक्षता से फसलों तक जल पहुँचाती हैं। इसके लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं—
    • लघु एवं सीमांत किसानों के लिए सूक्ष्म सिंचाई सब्सिडी का पुनर्गठन करते हुए आधार इकाई एक हेक्टेयर के स्थान पर 0.4 हेक्टेयर निर्धारित की जानी चाहिए।
    • किसानों को कम जल-आवश्यकता वाली तथा अधिक मूल्य प्रदान करने वाली फसलों, जैसे बागवानी एवं तिलहन फसलों की ओर स्थानांतरण हेतु प्रोत्साहित एवं सहयोग प्रदान किया जाना चाहिए। आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र में इसका सफल उदाहरण देखा गया है।
  • निर्णय-निर्माण को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नदी बेसिन स्तर पर व्यापक आँकड़ों का सृजन आवश्यक है। वर्तमान में भारत में नदी बेसिन स्तर पर जल निकासी, जल हानि एवं जल उपभोग संबंधी पर्याप्त आँकड़ों का अभाव है, जिसके कारण वास्तविक जल उपयोग, दक्षता में सुधार तथा न्यायसंगत जल आवंटन का आकलन कठिन हो जाता है।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित निगरानी प्रणाली के माध्यम से जल परिवहन अवसंरचना में होने वाली हानियों का पता लगाया जा सकता है तथा उनका सटीक मापन एवं डेटा संकलन किया जा सकता है।
    • उदाहरण: दिल्ली तथा ओडिशा के भुवनेश्वर जैसे शहर जल वितरण के दौरान होने वाली भौतिक जल हानियों की पहचान एवं उन्हें कम करने के उद्देश्य से स्मार्ट बल्क वाटर मीटर स्थापित कर रहे हैं।

निष्कर्ष

  • जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक संसाधन है, जो मानव जीवन, आजीविका एवं पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है। जल-दिवालियापन की स्थिति को समाप्त करना सामाजिक कल्याण की आधारशिला सिद्ध होगा।
  • दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारदर्शी सुशासन तथा समाज में विश्वास की भावना ऐसे प्रमुख साधन हैं, जिनके प्रभावी उपयोग से भारत अब भी जल-सुरक्षित भविष्य की दिशा में निर्णायक परिवर्तन ला सकता है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत का जल संकट भौतिक जल-अभाव की अपेक्षा सुशासन, आँकड़ा प्रबंधन तथा जल मांग प्रबंधन की विफलता का अधिक परिणाम है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

स्रोत: TH, PIB

 

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