हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए भारत और अन्य देश द्वारा ‘जी माइनस टू’ का निर्माण

पाठ्यक्रम: जीएस-2 / अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सन्दर्भ

  • प्रधानमंत्री मोदी की पूर्व की ओर यात्रा, जिसमें इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड शामिल हैं, तथा हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री ताकाइची और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली की दिल्ली यात्राएँ, एक उभरते हुए प्रतिरूप की ओर संकेत करती हैं, जिसे “जी माइनस टू (G Minus Two)” कहा जा रहा है।

“जी माइनस टू” क्या है?

  • जी-2 (G2) की अवधारणा का अस्वीकार: भारतीय रणनीतिकार लंबे समय से इस विचार को लेकर असहज रहे हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन मिलकर एशिया का संचालन करें। राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा समय-समय पर जी-2 का उल्लेख तथा उनकी सरकार द्वारा हिंद-प्रशांत शब्द के प्रति असहजता ने इस चिंता को और बढ़ाया है।
  • न तो कोई गुट, न ही चीन को रोकने की रणनीति: जी माइनस टू न तो चीन-विरोधी गठबंधन है और न ही कोई स्वतंत्र तीसरा गुट। यह केवल एशियाई शक्तियों के बीच द्विपक्षीय तथा लघु-बहुपक्षीय साझेदारियों का एक परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र है, जिसका उद्देश्य देशों के लिए रणनीतिक अवसर और स्वतंत्रता का विस्तार करना है।
  • फिर भी अमेरिका पर आधारित: इसका उद्देश्य अमेरिका से दूरी बनाना नहीं है। जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देश अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को और मजबूत कर रहे हैं, क्योंकि एशियाई शक्तियों का कोई भी संयोजन अकेले चीन की सैन्य शक्ति का संतुलन नहीं बना सकता।

यह परिवर्तन क्यों हो रहा है?

  • चीन के साथ व्यापारिक परस्पर निर्भरता को समाप्त नहीं किया जा सकता: भारत का चीन के साथ व्यापार लगभग 150 अरब डॉलर है, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया का व्यापार 300 अरब डॉलर से अधिक है तथा आसियान (ASEAN) का चीन के साथ व्यापार एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है। इसलिए पूर्ण आर्थिक अलगाव व्यावहारिक नहीं है।
  • वास्तविक उद्देश्य अलगाव नहीं, बल्कि जोखिम कम करना है: देश यह चाहते हैं कि चीन निर्यात प्रतिबंधों या आपूर्ति श्रृंखला में बाधा उत्पन्न करके इस परस्पर निर्भरता का हथियार के रूप में उपयोग न कर सके, लेकिन साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि चीन से पूरी तरह संबंध तोड़ना संभव नहीं है।
  • ट्रम्प की अप्रत्याशित नीतियों ने इसकी आवश्यकता बढ़ा दी है: टैरिफ वॉर तथा अमेरिका की बदलती नीतियों ने एशियाई देशों को केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय आपसी संबंध मजबूत करने के लिए प्रेरित किया है।

प्रत्येक साझेदार भारत के लिए क्या लेकर आता है?

  • जापान: उन्नत विनिर्माण, रक्षा प्रौद्योगिकी तथा अवसंरचना वित्तपोषण।
  • दक्षिण कोरिया: जहाज़ निर्माण, सेमीकंडक्टर तथा रक्षा उत्पादन में विशेषज्ञता।
  • ऑस्ट्रेलिया: महत्त्वपूर्ण खनिजों, समुद्री सुरक्षा तथा पूर्वी हिंद महासागर में स्थिरता के लिए एक महत्त्वपूर्ण साझेदार।
  • इंडोनेशिया: दो महासागरों के संगम पर स्थित होने के कारण हिंद-प्रशांत का भौगोलिक एवं रणनीतिक केंद्र। इसलिए भारत–इंडोनेशिया सहयोग को क्षेत्रीय व्यवस्था में लंबे समय से अपेक्षित कड़ी माना जाता है।
  • न्यूज़ीलैंड: व्यापार, शिक्षा तथा कुछ चुनिंदा प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में एक छोटा लेकिन उपयोगी साझेदार।

भारत के लिए महत्त्व

  • अधिक कूटनीतिक अवसर: भारत अब अमेरिका और चीन के बीच किसी एक को चुनने के लिए बाध्य नहीं है; वह एशिया के अन्य देशों के साथ स्वतंत्र रूप से अपने संबंधों का विस्तार कर सकता है।
  • रक्षा उद्योग को लाभ: तकनीकी रूप से उन्नत एशियाई सेनाओं के साथ सहयोग भारत की रक्षा विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं को सीधे बल प्रदान कर सकता है।
  • क्षेत्रीय विश्वसनीयता में वृद्धि: दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ गहरे सुरक्षा और आर्थिक सहयोग से भारत स्वयं को केवल साझेदारी प्राप्त करने वाला देश नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित कर सकता है।
  • बहुपक्षीय मंचों पर अधिक प्रभाव: एशिया की प्रमुख औद्योगिक शक्तियों के साथ मजबूत द्विपक्षीय संबंध समय के साथ वैश्विक संस्थानों में भारत की बड़ी भूमिका के दावे को सशक्त बना सकते हैं।

चुनौतियाँ

  • मध्यम शक्तियों के सहयोग की संरचनात्मक सीमाएँ: चाहे सहयोग कितना भी समन्वित क्यों न हो, ये देश मिलकर भी क्षेत्र में अमेरिका या चीन जैसी शक्ति का विकल्प नहीं बन सकते। यह रणनीति केवल रणनीतिक अवसर बढ़ाती है, समान शक्ति संतुलन स्थापित नहीं करती।
  • चीन के साथ आर्थिक परस्पर निर्भरता एक वास्तविक बाधा बनी हुई है: सुरक्षा के प्रति सबसे अधिक सजग देश भी दशकों से बने व्यापारिक संबंधों को आसानी से समाप्त नहीं कर सकते।
  • सफलता भारत की आंतरिक तैयारियों पर निर्भर है: इन साझेदारियों का वास्तविक लाभ भारत के आर्थिक सुधारों तथा रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की गति पर निर्भर करेगा। केवल शिखर सम्मेलन आधारित कूटनीति पर्याप्त नहीं होगी।
  • औपचारिक संरचना के बिना समन्वय की सीमाएँ: चूँकि जी माइनस टू जानबूझकर किसी संधि-आधारित गठबंधन का रूप नहीं लेता, इसलिए इसमें औपचारिक गठबंधन जैसी बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ नहीं हैं। परिणामस्वरूप इसकी सफलता निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है।

आगे की राह

  • उच्च-स्तरीय यात्राओं और संवादों को रक्षा सह-उत्पादन, महत्त्वपूर्ण खनिजों तथा प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में ठोस और क्षेत्र-विशिष्ट परिणामों में परिवर्तित किया जाए।
  • भारत की आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता तथा विनिर्माण क्षमता को प्राथमिकता दी जाए, क्योंकि साझेदारियाँ उतनी ही मजबूत होती हैं जितनी क्षमता भारत स्वयं लेकर आता है।
  • लघु-बहुपक्षीय व्यवस्थाओं का व्यावहारिक उपयोग किया जाए और प्रतीकात्मक विस्तार के बजाय प्रत्येक क्षेत्र में पूरक क्षमता वाले साझेदारों का चयन किया जाए।

निष्कर्ष 

  • “जी माइनस टू” भारत की हिंद-प्रशांत सोच में एक शांत लेकिन महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है। यह अमेरिका–चीन संबंधों को लेकर चिंता व्यक्त करने के बजाय सक्षम एशियाई साझेदारों के साथ व्यावहारिक गठबंधन निर्माण पर बल देता है।
  • किंतु इस व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा शिखर सम्मेलनों की प्रतीकात्मक सफलता में नहीं, बल्कि इस बात में होगी कि क्या भारत अपनी बाहरी कूटनीतिक सक्रियता के साथ-साथ आवश्यक आर्थिक सुधारों और रक्षा आत्मनिर्भरता को भी आगे बढ़ा पाता है, ताकि ये साझेदारियाँ वास्तव में गहरी और दीर्घकालिक बन सकें।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] अमेरिका–चीन संबंधों में अनिश्चितता के बीच अधिक संतुलित हिंद-प्रशांत व्यवस्था के निर्माण में मध्यम शक्तियों की लघु-बहुपक्षीय व्यवस्था (भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया) की भूमिका का परीक्षण कीजिए।

स्रोत: IE

 

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