इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवाह की समान वैधानिक आयु को बरकरार रखा

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन व्यवस्था एवं राजव्यवस्था

सन्दर्भ

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि कोई भी पर्सनल लॉ (Personal Law), बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) तथा यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO) के अंतर्गत बाल विवाह पर लगाए गए प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं कर सकती।

न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ

  • PCMA का समान रूप से लागू होना: न्यायालय ने कहा कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 धर्म की परवाह किए बिना भारत के प्रत्येक नागरिक पर समान रूप से लागू होता है।
  • विवाह की वैधानिक आयु PCMA द्वारा निर्धारित की जाती है और यह व्यक्तिगत विधियों के आधार पर अलग-अलग नहीं हो सकती।
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धार्मिक व्यक्तिगत विधियाँ संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से ऊपर नहीं हो सकतीं।

पीसीएमए (PCMA), 2006 और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 के बीच संबंध:

  • POCSO अधिनियम के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति बच्चा है, तथा किसी बच्चे के साथ यौन संबंध, उसकी सहमति होने पर भी, एक दंडनीय अपराध है।

विधिक ढाँचा

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006:

  • इस अधिनियम के अनुसार 21 वर्ष से कम आयु का पुरुष तथा 18 वर्ष से कम आयु की महिला “बालक/बालिका” माने जाते हैं।
  • यदि विवाह के किसी भी पक्ष की आयु निर्धारित सीमा से कम है, तो वह बाल विवाह कहलाता है।

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012:

  • यह अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को बच्चा मानता है।

मुस्लिम व्यक्तिगत विधि (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937:

  • यह अधिनियम निर्धारित करता है कि मुसलमानों के विवाह, मेहर, तलाक तथा उत्तराधिकार से संबंधित मामलों का निर्णय मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) के अनुसार होगा।
  • पारंपरिक मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, यौवन प्राप्त कर चुके लड़के या लड़की (जिसे सामान्यतः 15 वर्ष की आयु माना जाता है) को विवाह का अनुबंध करने के लिए सक्षम एवं विधिक रूप से पात्र माना जाता है।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 14: राज्य भारत के राज्यक्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता तथा विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद 15(3): राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 21: विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 44: राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।

निर्णय का महत्त्व

  • बाल संरक्षण कानूनों को सुदृढ़ करना: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि बाल संरक्षण संबंधी कानूनों को उन व्यक्तिगत प्रथाओं पर प्रधानता प्राप्त है जो कम आयु में विवाह की अनुमति देती हैं।
  • लैंगिक समानता: यह निर्णय बाल विवाह को रोककर महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देगा, उन्हें शिक्षा के अधिक अवसर उपलब्ध कराएगा तथा उनकी स्वायत्तता, गरिमा और निर्णय लेने की क्षमता को सुदृढ़ करेगा।

प्रमुख चिंताएँ क्या हैं ?

  • व्यक्तिगत विधियों के साथ टकराव: व्यक्तिगत विधियों को अप्रभावी बनाने वाला यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता से संबंधित प्रश्न भी उठाता है।
  • क्रियान्वयन की चुनौतियाँ: कानूनी प्रतिबंध के बावजूद सामाजिक परंपराओं, गरीबी, शिक्षा की कमी तथा लैंगिक असमानता के कारण बाल विवाह की समस्या अभी भी बनी हुई है।

आगे की राह

  • ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है जिसमें समानता, गरिमा और बाल संरक्षण जैसे संवैधानिक मूल्यों का व्यक्तिगत विधियों के साथ समन्वय स्थापित किया जा सके।
  • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के साथ-साथ बालिकाओं की शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण तथा सामाजिक जागरूकता पर अधिक बल दिया जाना चाहिए, ताकि बाल विवाह के मूल कारणों का स्थायी समाधान किया जा सके।

स्रोत: TH

 

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