पाठ्यक्रम: जीएस-2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध; वैश्विक समूह
सन्दर्भ
- नई दिल्ली 12-13 सितंबर को 18वें BRICS नेताओं के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने के लिए तैयार है। भारत की ब्रिक्स (BRICS) अध्यक्षता ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ विषय द्वारा निर्देशित है।
ब्रिक्स का परिचय
- ब्रिक्स (BRICS) उभरती अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक दक्षिण का एक प्रमुख मंच है, जिसमें प्रारंभ में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन शामिल थे तथा 2010 में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ।
- इसके विस्तार से इसके जनसांख्यिकीय, आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव में काफी वृद्धि हुई है।
- ब्रिक्स (BRICS) अर्थव्यवस्था, वित्त, व्यापार, प्रौद्योगिकी, विकास और वैश्विक शासन जैसे क्षेत्रों में अधिक सहयोग चाहता है, साथ ही अधिक प्रतिनिधित्व वाली और बहुध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत करता है।
ऐतिहासिक विकास: BRIC से BRICS+ तक
- ब्रिक्स (BRICS) एक आर्थिक समूह से विकसित होकर रणनीतिक स्वायत्तता, विकास सहयोग और वैश्विक शासन में सुधार के लिए एक व्यापक मंच बन गया है।
- वर्ष 2001: अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन के लिए BRIC शब्द गढ़ा।
- वर्ष 2009: पहला BRIC शिखर सम्मेलन रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित किया गया।
- वर्ष 2010: दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ, जिससे BRICS का गठन हुआ।
- वर्ष 2024: मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और UAE पूर्ण सदस्य बने।
- वर्ष 2025: इंडोनेशिया पूर्ण सदस्य के रूप में BRICS में शामिल हुआ, जिससे वैश्विक दक्षिण में इसका प्रतिनिधित्व और व्यापक हुआ।
- इसके अलावा, बेलारूस, बोलीविया, कज़ाखस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम BRICS के साझेदार देश (Partner Countries) के रूप में शामिल हुए।
- वर्ष 2026: भारत अध्यक्षता संभालता है और नई दिल्ली में 18वें शिखर सम्मेलन की मेजबानी करता है।
2026 में ब्रिक्स (BRICS) और भविष्य: ‘POWER’ रूपरेखा
- भारत की अध्यक्षता के लिए चीन के समर्थन को पॉवर (POWER) की पाँच-अक्षरी रूपरेखा के माध्यम से देखा जा सकता है, जो ब्रिक्स के अधिक सहयोग की संभावित भविष्य की दिशा को दर्शाती है।
- P – Principle (सिद्धांत): ब्रिक्स को संयुक्त राष्ट्र चार्टर, संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को बनाए रखना चाहिए।
- यह भू-राजनीतिक संघर्षों, आधिपत्यवाद और शक्ति की राजनीति के बीच नियम-आधारित और बहुध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत कर सकता है।
- मानवता के साझा भविष्य वाले समुदाय की चीन की परिकल्पना, साथ ही वैश्विक सुरक्षा पहल और वैश्विक शासन पहल जैसी पहलकदमियाँ, सामान्य वैश्विक चुनौतियों के प्रति उसके दृष्टिकोण को दर्शाती हैं।
- O – Openness (खुलापन): धीमी वैश्विक आर्थिक सुधार, संरक्षणवाद, शुल्क संबंधी बाधाएँ, डिकपलिंग और आपूर्ति-श्रृंखला में व्यवधान आर्थिक वैश्वीकरण के लिए खतरा हैं।
- इसलिए ब्रिक्स को डब्ल्यूटीओ पर केंद्रित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का समर्थन करना चाहिए, जिसमें सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र (MFN) जैसे सिद्धांत शामिल हैं।
- ऊर्जा, खनिजों, बुनियादी ढाँचे तथा औद्योगिक और आपूर्ति-श्रृंखलाओं में अधिक सहयोग लचीले और खुले वैश्वीकरण को बढ़ावा दे सकता है।
- W – Win-Win (सभी के लिए लाभ): विकास को ब्रिक्स सहयोग के केंद्र में बने रहना चाहिए।
- सदस्यों को संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को गति देनी चाहिए, वर्ष 2030 के बाद के वैश्विक विकास एजेंडे में योगदान देना चाहिए और विकासशील देशों की समान भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
- व्यापक आर्थिक नीति समन्वय, व्यापार और निवेश सुविधा, स्थानीय मुद्रा में लेन-देन, सीमा-पार भुगतान और मजबूत वित्तीय सुरक्षा तंत्र के माध्यम से आर्थिक सहयोग को और गहरा किया जा सकता है।
- ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और लचीली कृषि के लिए सहयोग महत्वपूर्ण है।
- E – Engine (विकास का इंजन): ब्रिक्स देश विश्व की लगभग आधी आबादी, वैश्विक आर्थिक उत्पादन के लगभग 30% और वैश्विक व्यापार के एक-पाँचवें हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- इनके पास प्रमुख प्राकृतिक संसाधन, विनिर्माण क्षमताएँ और बड़े बाजार हैं।
- चीनी दृष्टिकोण में उद्धृत अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2028 तक ब्रिक्स की अधिक वृद्धि जी-7 की तुलना में लगभग तीन गुना तेज हो सकती है।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्मार्ट विनिर्माण, नए औद्योगीकरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी,एआई, स्वास्थ्य, कृषि और शिक्षा के माध्यम से ब्रिक्स विकास का इंजन बन सकता है।
- चीन ने चीन-ब्रिक्स एआई डेवलपमेंट एंड कॉपरेरेशन सेंटर और चीन-ब्रिक्स न्यू क्वालिटी प्रोडक्टिव फोर्सेस रिसर्च सेंटर की स्थापना की है।
- R – Responsibility (जिम्मेदारी): बब्रिक्स की जिम्मेदारी है कि वह शांति, विकास, निष्पक्षता और वैश्विक दक्षिण की एकजुटता को बढ़ावा दे।
- भारत और चीन क्रमशः वर्ष 2026 और 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालेंगे, जिससे निरंतरता और स्थिरता के लिए उनके बीच रचनात्मक समन्वय महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारत और विश्व के लिए महत्व
ब्रिक्स भारत को निम्नलिखित के लिए एक मंच प्रदान करता है:
- वैश्विक दक्षिण में अपने नेतृत्व को मजबूत करना;
- संयुक्त राष्ट्र, आईएमएफ, विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ में सुधारों को आगे बढ़ाना;
- आर्थिक और तकनीकी साझेदारियों का विस्तार करना;
- व्यापार और वित्तीय तंत्रों में विविधता लाना;
- रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीयता को आगे बढ़ाना।
- चीन-भारत संबंधों में सुधार, जिसमें छह वर्ष के निलंबन के बाद सीधी उड़ानों की बहाली और सीमा व्यापार को फिर से खोलना शामिल है, ब्रिक्स में अधिक सुचारु सहयोग को सुविधाजनक बना सकता है।
संबंधित मुद्दे और चिंताएँ
- ब्रिक्स (BRICS) को आंतरिक भू-राजनीतिक मतभेदों, अलग-अलग आर्थिक हितों, भारत-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, रूस से संबंधित तनाव, संरक्षणवाद, संस्थागत सीमाओं और इसके विस्तारित सदस्यता से जुड़े प्रश्नों का सामना करना पड़ता है।
- अधिक वित्तीय सहयोग के लिए अंतर-संचालनीयता, पारदर्शिता और व्यापक आर्थिक स्थिरता आवश्यक है।
निष्कर्ष और आगे की राह
- भारत को आम सहमति-आधारित, समावेशी और मुद्दा-उन्मुख ब्रिक्स कूटनीति अपनानी चाहिए।
- प्राथमिकताओं में डब्ल्यूटीओ सुधार, विकास वित्त, स्थानीय मुद्रा में भुगतान, लचीली आपूर्ति शृंखलाएँ, खाद्य-ऊर्जा सुरक्षा, एआई शासन, जलवायु कार्रवाई और लोगों के बीच मजबूत आदान-प्रदान शामिल होने चाहिए।
- वर्ष 2026 का शिखर सम्मेलन ब्रिक्स (BRICS) को उभरते आर्थिक प्रभाव का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह से सैद्धांतिक, खुले, पारस्परिक रूप से लाभकारी, विकास-उन्मुख और जिम्मेदार वैश्विक सहयोग की ‘POWER’ में बदल सकता है।
- इसकी सफलता केवल विस्तार पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि सामूहिक प्रभाव को प्रभावी संस्थानों, व्यावहारिक परिणामों और वैश्विक दक्षिण के लिए एक मजबूत आवाज में बदलने पर निर्भर करेगी।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] जाँच कीजिए कि सिद्धांत,खुलापन, सभी के लिए लाभकारी सहयोग, विकास का इंजन और जिम्मेदारी आदि से युक्त पॉवर (POWER) की रूपरेखा किस प्रकार वैश्विक दक्षिण को सशक्त बना सकती है और वैश्विक शासन को मजबूत कर सकती है। |
स्रोत: TH