पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी; GS2/ अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- बीजिंग में आयोजित दूसरे विश्व ह्यूमनॉइड खेलों ने चीन की उस महत्वाकांक्षा को रेखांकित किया है, जिसके अंतर्गत वह अमेरिका-चीन के बीच बढ़ती प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा के बीच AI, रोबोटिक्स और विनिर्माण को एकीकृत कर वैश्विक वैज्ञानिक महाशक्ति बनने का प्रयास कर रहा है।
चीन एवं अमेरिका में विनिर्माण से वैज्ञानिक नेतृत्व की ओर
- उभरती हुई प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा का केंद्र वैज्ञानिक अनुसंधान, AI, विनिर्माण, पूंजी, ऊर्जा, आपूर्ति शृंखलाओं और बाजारों को एकल नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में एकीकृत करना है।
- चीन ने ‘नई गुणवत्ता वाली उत्पादक शक्तियों’ को बढ़ावा दिया है। उसका तर्क है कि भविष्य में आर्थिक वृद्धि का आधार सस्ते श्रम, अवसंरचना और पूंजी संचय के बजाय तीव्रता से नवाचार पर निर्भर होना चाहिए।
- AI इस रणनीति के केंद्र में है, क्योंकि चीन इसे रोबोटिक्स, मशीन टूल्स, ऑटोमोबाइल, जैव-प्रौद्योगिकी, उन्नत सामग्री, ऊर्जा, कृषि और वैज्ञानिक अनुसंधान सहित विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक रूप से लागू करना चाहता है।
- चीन की पारंपरिक शक्ति उसका विशाल विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र है। अब वह तकनीकी अनुकूलन से आगे बढ़कर मौलिक वैज्ञानिक खोज की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। विगत कई दशकों में चीन ने विदेशी प्रौद्योगिकियों को आत्मसात करने तथा उनमें सुधार करने की व्यापक क्षमता विकसित की है।
- वर्ष 2025 में चीन का अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय कथित रूप से GDP के लगभग 2.8% तक पहुँच गया, जबकि बुनियादी अनुसंधान पर व्यय में 11% की वृद्धि हुई।
- संयुक्त राज्य अमेरिका इसके विपरीत दिशा से एक पूरक रणनीति अपना रहा है।
- उसकी प्रमुख शक्तियों में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय, प्रयोगशालाएँ, प्रौद्योगिकी कंपनियाँ, वेंचर कैपिटल और वित्तीय बाजार शामिल हैं; किंतु वैश्वीकरण ने अमेरिकी नवाचार एवं घरेलू विनिर्माण के बीच संबंध को कमजोर किया है।
- अमेरिका अब इस संबंध को पुनर्स्थापित करने तथा महामारी, आपूर्ति-शृंखला व्यवधानों और चीन पर रणनीतिक निर्भरता से उजागर हुई कमजोरियों को कम करने का प्रयास कर रहा है।
- इस प्रकार, चीन विनिर्माण से विज्ञान की ओर बढ़ रहा है, जबकि अमेरिका विज्ञान को पुनः विनिर्माण से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।
चीन का बदलाव एवं अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा
- चीन के पास विनिर्माण की व्यापक क्षमता, आपूर्ति-शृंखलाओं का एकीकरण तथा बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकियों के परिनियोजन की क्षमता है, जो उसके विज्ञान-औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाती है।
- अमेरिका को अग्रणी वैज्ञानिक अनुसंधान, उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों, विश्वविद्यालयों, पूंजी बाजारों तथा उच्चस्तरीय नवाचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बढ़त प्राप्त है।
- AI इन दोनों क्षेत्रों के बीच सेतु का कार्य कर सकता है, क्योंकि यह वैज्ञानिक खोज, डिजाइन और विनिर्माण को निरंतर एवं परस्पर संबद्ध प्रक्रियाओं में बदल सकता है।
- यही कारण है कि प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक शक्ति का एक महत्वपूर्ण घटक बन गई है।
- दोनों देश रणनीतिक निर्भरता को लेकर चिंतित हैं—चीन उन्नत अमेरिकी प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता को लेकर तथा अमेरिका चीनी विनिर्माण एवं आपूर्ति-शृंखलाओं पर निर्भरता को लेकर।
चीन-अमेरिका प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में भारत के समक्ष चुनौतियाँ
- निम्न R&D तीव्रता एवं निजी क्षेत्र की कमजोर भागीदारी: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय GDP का केवल लगभग 0.64% है, जबकि चीन में यह लगभग 2.8% और अमेरिका में 3.5% है।
- WIPO के अनुमान के अनुसार, भारत का R&D व्यय लगभग 75 बिलियन डॉलर (PPP-समायोजित) है, जबकि चीन का लगभग 786 बिलियन डॉलर और अमेरिका का लगभग 782 बिलियन डॉलर है।
- भारत में बुनियादी एवं अनुप्रयुक्त अनुसंधान में निजी क्षेत्र की पर्याप्त भागीदारी का अभाव है।
- संस्थागत एवं वैज्ञानिक-प्रणालीगत सुधार: भारत में 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के परिणामस्वरूप वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र में उसी स्तर का परिवर्तन नहीं हो सका।
- नौकरशाहीकरण, विखंडित वित्तपोषण, विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग की सीमितता तथा शोधकर्ताओं के लिए अपर्याप्त प्रोत्साहन नवाचार की गति को बाधित करते हैं।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण को केंद्रीय स्थान पर बनाए रखना आवश्यक है। सभ्यतागत गौरव, प्रमाण, प्रयोग और वैज्ञानिक जिज्ञासा के स्थान पर मिथकों को स्थापित करने का विकल्प नहीं हो सकता।
भारत के संबंधित प्रयास
- भारत ने निम्नलिखित पहलों के माध्यम से उभरती चुनौती को स्वीकार किया है:
- इंडियाAI मिशन: कंप्यूटिंग अवसंरचना, डेटासेट, स्वदेशी AI क्षमताओं तथा AI अनुप्रयोगों का विकास करना।
- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन: सेमीकंडक्टर विनिर्माण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना।
- राष्ट्रीय क्वांटम मिशन: क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार, सेंसिंग तथा उन्नत सामग्रियों के क्षेत्र में क्षमताओं का निर्माण करना।
- राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन/अनुसंधान-संबंधी सुधार: अनुसंधान वित्तपोषण तथा उद्योग-अकादमिक सहयोग को सुदृढ़ करने का प्रयास।
- राष्ट्रीय रोबोटिक्स नीति का मसौदा: भारत के रोबोटिक्स पारिस्थितिकी तंत्र के विकास तथा औद्योगिक स्तर पर इसके उपयोग को बढ़ावा देने का उद्देश्य।
- हालाँकि, इन पहलों को केवल नीतिगत घोषणाओं तक सीमित रहने के बजाय अनुसंधान क्षमता, व्यावसायीकरण और बड़े पैमाने के विनिर्माण में परिणत करना आवश्यक है।
आगे की राह: भारत के लिए रोडमैप
- भारत को वैश्विक एकीकरण और घरेलू क्षमता निर्माण पर आधारित दो-आयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है:
- R&D व्यय को क्रमिक रूप से GDP के 2–3% तक बढ़ाना तथा इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी को अधिक व्यापक बनाना।
- प्रतिस्पर्धात्मक वित्तपोषण, स्वायत्तता और परिणाम-आधारित मूल्यांकन के माध्यम से विश्वविद्यालयों तथा सार्वजनिक प्रयोगशालाओं में सुधार करना।
- विश्वविद्यालय-उद्योग-सरकार के बीच सुदृढ़ संबंध तथा प्रभावी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण संस्थानों का निर्माण करना।
- भारतीय वैज्ञानिकों तथा वैश्विक स्तर पर कार्यरत भारतीय प्रतिभाओं की स्वदेश वापसी के लिए प्रोत्साहन तैयार करना।
- AI को विनिर्माण, कृषि, स्वास्थ्य सेवा, रक्षा, ऊर्जा तथा पदार्थ विज्ञान के साथ एकीकृत करना।
- अलगाववादी ‘प्रौद्योगिकी संप्रभुता’ की दिशा में बढ़ने के बजाय वैश्विक विश्वविद्यालयों, कंपनियों, पूंजी तथा प्रौद्योगिकी नेटवर्क के साथ साझेदारी को गहरा करना।
- सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, क्वांटम प्रौद्योगिकी, उन्नत सामग्री तथा कंप्यूटिंग अवसंरचना के क्षेत्र में घरेलू क्षमताओं का विकास करना।
निष्कर्ष
- निर्णायक प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा केवल उस देश द्वारा नहीं जीती जाएगी जिसके पास सबसे बुद्धिमान AI मॉडल या सबसे प्रभावशाली रोबोट हो। सफलता उस देश को मिलेगी जो ज्ञान को उत्पादन से सबसे प्रभावी ढंग से जोड़ सकेगा।
- अतः भारत का उद्देश्य चीन या अमेरिका की प्रतिकृति बनना नहीं, बल्कि एक खुले, प्रतिस्पर्धी और वैज्ञानिक रूप से कठोर नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना होना चाहिए, जो भारत की जनसांख्यिकीय एवं बौद्धिक क्षमताओं को प्रौद्योगिकी तथा रणनीतिक शक्ति में परिवर्तित करने में सक्षम हो।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: उभरती हुई अमेरिका-चीन प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विज्ञान–प्रौद्योगिकी–विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में भारत के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: IE
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