पाठ्यक्रम:GS2/शासन
संदर्भ
- मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 की पाँचवीं वर्षगांठ तथा भारत में सड़क दुर्घटनाएँ 2024 रिपोर्ट के साथ भारत में जारी सड़क सुरक्षा संकट पर पुनः ध्यान केंद्रित हुआ है।
भारत में सड़क सुरक्षा के बारे में
- सड़क सुरक्षा एक सार्वजनिक नीति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शासन संबंधी चुनौती है, जिसमें सड़क उपयोगकर्ता, वाहन, अवसंरचना, प्रवर्तन तथा दुर्घटना के पश्चात की देखभाल शामिल हैं।
- भारत में तीव्र शहरीकरण, मोटरीकरण और सड़क नेटवर्क के विस्तार ने आवागमन को बढ़ाया है, लेकिन साथ ही व्यवस्थागत कमजोरियों को भी उजागर किया है।
- सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) की भारत में सड़क दुर्घटनाएँ 2024 रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 1.77 लाख लोगों की मृत्यु हुई।
- यह विधायी मंशा और बुनियादी स्तर पर प्राप्त परिणामों के बीच वर्तमान अंतर को रेखांकित करता है।
- यह चुनौती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सड़क दुर्घटनाएँ पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों, मोटरसाइकिल चालकों तथा अन्य असुरक्षित सड़क उपयोगकर्ताओं को अनुपातहीन रूप से प्रभावित करती हैं।
- सुंदर समिति (2007) तथा इसके बाद की रिपोर्टों ने संस्थागत सुधार, उच्चतर जवाबदेही और बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता को रेखांकित किया।
MVAA 2019 के प्रमुख प्रावधान
- मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019, जो 1 सितंबर 2019 से प्रभावी हुआ, ने निम्नलिखित उपायों के माध्यम से भारत के कानूनी ढाँचे को सुदृढ़ किया:
- कई यातायात उल्लंघनों के लिए अधिक दंड तथा खतरनाक ड्राइविंग के विरुद्ध अधिक प्रभावी निवारक व्यवस्था।
- वाहन मालिकों, चालकों तथा अन्य हितधारकों की अधिक जवाबदेही।
- दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले गुड सामरिटन (Good Samaritans) को संरक्षण।
- सड़क दुर्घटना के बाद की महत्वपूर्ण ‘गोल्डन ऑवर’ अवधि की मान्यता।
- वाहन सुरक्षा तथा वाहन रिकॉल से संबंधित प्रावधानों को सुदृढ़ करना।
- प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन के अधिक उपयोग को बढ़ावा देना।
- हालाँकि, अधिनियम का कार्यान्वयन अभी भी असमान है। हेलमेट और सीट-बेल्ट का अनुपालन, बाल सुरक्षा उपकरणों का उपयोग, प्रवर्तन क्षमता, सड़क अभियांत्रिकी तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया में राज्यों के बीच काफी भिन्नता है।
उपलब्धियाँ एवं सकारात्मक प्रभाव
- वाहन (Vahan) और सारथी (Sarathi) प्लेटफॉर्म के माध्यम से डिजिटलीकरण ने लाइसेंसिंग और वाहन पंजीकरण में पारदर्शिता को बढ़ाया है।
- गुड सामरिटन से संबंधित प्रावधानों ने दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने में सामान्य लोगों की हिचकिचाहट को कम किया है। वाहन सुरक्षा मानकों को भी अधिक कठोर बनाया गया है, जिसमें नए मॉडलों में अनिवार्य एयरबैग, एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (ABS) तथा सीट-बेल्ट रिमाइंडर जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।
- राष्ट्रीय राजमार्गों पर वर्ष 2025 के आँकड़ों ने कुछ रिपोर्टों में वर्ष 2024 की तुलना में दुर्घटनाओं और मृत्यु के मामलों में लगभग 11% की कमी दर्शाई है। इसका श्रेय बेहतर सड़क अभियांत्रिकी, दुर्घटना-प्रवण स्थानों (Black Spots) के सुधार तथा प्रभावी प्रवर्तन को दिया गया है।
- वाहनों की संख्या में तीव्र वृद्धि के बावजूद प्रति 10,000 वाहनों पर दीर्घकालिक मृत्यु दर में कमी आई है। वर्ष 2014 में लगभग 191 मिलियन वाहनों की तुलना में वर्ष 2024 तक वाहनों की संख्या 350 मिलियन से अधिक हो गई। यह तीव्र मोटरीकरण के बीच सापेक्ष सड़क सुरक्षा में कुछ सुधार का संकेत देता है।
भारत में सड़क सुरक्षा के लिए प्रमुख विधायी ढाँचे
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988: यह मोटर वाहनों, ड्राइविंग लाइसेंस, पंजीकरण और यातायात विनियमन से संबंधित प्रमुख कानून है।
- मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019: इसने दंड, जवाबदेही, पीड़ितों के संरक्षण और प्रवर्तन व्यवस्था को सुदृढ़ किया।
- केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989: ये वाहनों और चालकों के लिए परिचालन तथा सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं को निर्धारित करते हैं।
- राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा नीति, 2010: यह जागरूकता, प्रवर्तन, अभियांत्रिकी, आपातकालीन देखभाल और अनुसंधान पर आधारित व्यापक नीतिगत ढाँचा प्रदान करती है।
- मोटर वाहन ड्राइविंग विनियमन, 2017 तथा बाद के सुरक्षा विनियम: इनका उद्देश्य चालक व्यवहार और वाहन सुरक्षा मानकों में सुधार करना है।
- सड़क सुरक्षा के लिए 4Es, अर्थात् शिक्षा (Education), अभियांत्रिकी (Engineering), प्रवर्तन (Enforcement) और आपातकालीन देखभाल (Emergency Care) के अंतर्गत समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। इनके साथ प्रौद्योगिकी और डेटा का उपयोग भी बढ़ाया जा रहा है।
- भारत न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम (Bharat NCAP): यह वाहनों की दुर्घटना सुरक्षा के आकलन के लिए स्टार-रेटिंग प्रणाली है, जो लगभग वर्ष 2023 से परिचालन में है।
प्रमुख चिंताएँ एवं मुद्दे क्या हैं?
- कार्यान्वयन की कमी: सशक्त कानून स्वयं अनुपालन सुनिश्चित नहीं करते। राज्यों और शहरों में प्रवर्तन व्यवस्था अलग-अलग है।
- असुरक्षित सड़क उपयोगकर्ता: पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों, दोपहिया वाहन चालकों और बच्चों को अनुपातहीन रूप से अधिक जोखिम का सामना करना पड़ता है।
- असुरक्षित स्कूली परिवहन: सुरक्षा मानकों के असंगत अनुपालन, अपर्याप्त बाल सुरक्षा उपकरणों तथा जोखिमपूर्ण बच्चों को चढ़ाने-उतारने की व्यवस्थाओं के कारण बच्चों की सुरक्षा खतरे में रहती है।
- सड़क अभियांत्रिकी की कमियाँ: दुर्घटना-प्रवण ब्लैक स्पॉट, खराब चौराहा डिजाइन, अपर्याप्त पैदल यात्री अवसंरचना और कमजोर सड़क सुरक्षा ऑडिट अभी भी प्रमुख चिंताएँ हैं।
- मानवीय कारक: तीव्र गति से वाहन चलाना, नशे में वाहन चलाना, ध्यान भटकाकर वाहन चलाना, हेलमेट/सीट-बेल्ट का उपयोग न करना और थकान सड़क दुर्घटनाओं में निरंतर योगदान देते हैं।
- दुर्घटना के बाद देखभाल: एंबुलेंस सेवाओं, ट्रॉमा केयर और समन्वित आपातकालीन प्रतिक्रिया में देरी ऐसी चोटों को भी घातक बना सकती है, जिनसे व्यक्ति को बचाया जा सकता था।
- डेटा संबंधी कमियाँ: बिखरे हुए दुर्घटना आँकड़े जोखिमपूर्ण स्थानों, व्यवहारों और प्रभावी हस्तक्षेपों की साक्ष्य-आधारित पहचान को सीमित करते हैं।
वैश्विक मानक
- वैश्विक स्तर पर ‘सुरक्षित प्रणाली दृष्टिकोण’ /‘विजन जीरो’ की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति है। यह मानता है कि मनुष्य गलतियाँ करते हैं और सड़क व्यवस्था को इस प्रकार डिजाइन किया जाना चाहिए कि ये गलतियाँ घातक परिणामों में परिवर्तित न हों।
- स्वीडन जैसे देशों ने सुरक्षित सड़क डिजाइन, गति प्रबंधन, वाहन सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही के संयोजन की प्रभावशीलता प्रदर्शित की है।
- सड़क सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की कार्रवाई का दशक 2021–2030 का उद्देश्य वर्ष 2030 तक वैश्विक सड़क दुर्घटना से होने वाली मृत्यु और चोटों में कम-से-कम 50% की कमी लाना है।
- अतः भारत के दृष्टिकोण को व्यक्तिगत सड़क उपयोगकर्ताओं को दोष देने से आगे बढ़कर ऐसी सहिष्णु एवं सुरक्षित सड़क प्रणाली के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है, जो मानवीय त्रुटियों के बावजूद गंभीर परिणामों को रोक सके।
आगे की राह: भारत में सड़क सुरक्षा ढाँचे का सुदृढ़ीकरण
- सुरक्षित प्रणाली दृष्टिकोण अपनाना: अधिक सुरक्षित सड़कों, वाहनों, नियंत्रित गति और जिम्मेदार सड़क उपयोगकर्ता व्यवहार को एकीकृत करना।
- डेटा-आधारित प्रवर्तन को सुदृढ़ करना: उच्च जोखिम वाले व्यवहारों को लक्षित करने के लिए AI-सक्षम कैमरों, ई-चालान, टेलीमैटिक्स और वास्तविक समय के दुर्घटना डेटाबेस का उपयोग करना।
- ब्लैक स्पॉट समाप्त करना: अनिवार्य सड़क सुरक्षा ऑडिट कराना तथा खतरनाक सड़क खंडों और चौराहों का शीघ्र सुधार करना।
- स्कूली आवागमन को सुरक्षित बनाना: स्कूल बस सुरक्षा मानकों, आयु-उपयुक्त बाल सुरक्षा प्रणालियों, सुरक्षित चढ़ने-उतरने के क्षेत्रों तथा वाहनों/चालकों की नियमित जाँच को प्रभावी रूप से लागू करना।
- आपातकालीन देखभाल में सुधार: गोल्डन ऑवर के दौरान जीवन बचाने के लिए एकीकृत एंबुलेंस नेटवर्क, ट्रॉमा केयर क्षमता और दुर्घटनाओं की त्वरित रिपोर्टिंग प्रणाली विकसित करना।
- अधिक सुरक्षित वाहनों को बढ़ावा देना: उन्नत चालक-सहायता प्रणालियों, पैदल यात्री सुरक्षा तथा अधिक कठोर वाहन सुरक्षा मानकों को प्रोत्साहित करना।
- व्यवहारगत जिम्मेदारी विकसित करना: माता-पिता, विद्यालयों, नियोक्ताओं, परिवहन संचालकों और समुदायों को हेलमेट, सीट-बेल्ट तथा बाल सुरक्षा उपकरणों के उपयोग को दैनिक सुरक्षा व्यवहार के रूप में अपनाना चाहिए।
- संस्थागत समन्वय को सुदृढ़ करना: सड़क सुरक्षा को परिवहन, पुलिस, स्वास्थ्य, शहरी विकास, शिक्षा और अवसंरचना से संबंधित एजेंसियों की साझा जिम्मेदारी बनाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने भारत को एक अधिक सुदृढ़ कानूनी आधार प्रदान किया है, लेकिन वर्ष 2024 में लगभग 1.77 लाख सड़क दुर्घटना मृत्युओं का होना दर्शाता है कि केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं।
- आगमी चरण में कानूनी प्रावधानों को सुरक्षित अवसंरचना, प्रभावी एवं एकसमान प्रवर्तन, सुरक्षित वाहनों, प्रभावी आपातकालीन देखभाल और जिम्मेदार सड़क व्यवहार में परिवर्तित करने की आवश्यकता है।
- विकसित भारत के लिए आवागमन केवल अधिक तीव्र और सुलभ होना पर्याप्त नहीं है; इसे सुरक्षित, समावेशी और जीवन-संरक्षक भी होना चाहिए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत में सड़क सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन में प्रमुख कमियों की चर्चा कीजिए तथा भारतीय सड़कों को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए सुरक्षित प्रणाली आधारित दृष्टिकोण का सुझाव दीजिए। |
स्रोत : TH
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