पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- बाहरी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव और शत्रुतापूर्ण क्षेत्रीय समझौतों से भारत के व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा तथा खाड़ी क्षेत्र में रहने वाले लाखों भारतीय नागरिकों के कल्याण के लिए प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न हो रहा है।
खाड़ी/पश्चिम एशिया के बारे में
- पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, प्रवासी भारतीयों के कल्याण तथा समुद्री संपर्क के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- खाड़ी क्षेत्र भारत का एक प्रमुख आर्थिक साझेदार है, जबकि व्यापक क्षेत्र होर्मुज जलडमरूमध्य, अदन की खाड़ी, बाब-अल-मंदेब और लाल सागर के माध्यम से हिंद महासागर को यूरोप से जोड़ता है।
| पश्चिम एशिया बनाम खाड़ी क्षेत्र | |
| पश्चिम एशिया | खाड़ी क्षेत्र |
| व्यापक भौगोलिक क्षेत्र | पश्चिम एशिया के अंतर्गत एक उप-क्षेत्र |
| ईरान, इज़राइल, तुर्किये, अरब देश आदि। | मुख्यतः छह GCC देश, अर्थात् सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान। |
- पश्चिम एशिया/खाड़ी क्षेत्र में भारत के हित बहुआयामी हैं:
- ऊर्जा: पश्चिम एशिया भारत के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का एक प्रमुख स्रोत बना हुआ है।
- प्रवासी भारतीय: लाखों भारतीय खाड़ी देशों में कार्यरत हैं, जिससे उनकी सुरक्षा और रोजगार रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
- प्रेषण : खाड़ी देशों में रोजगार भारत में विदेशी मुद्रा के प्रवाह का एक प्रमुख स्रोत है।
- व्यापार एवं संपर्क: यह क्षेत्र भारत–यूरोप व्यापार तथा IMEC जैसे उभरते संपर्क गलियारों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश-द्वार है।
- रणनीतिक भूगोल: होर्मुज जलडमरूमध्य, बाब-अल-मंदेब या लाल सागर में उत्पन्न व्यवधान भारतीय समुद्री परिवहन और आपूर्ति शृंखलाओं को तीव्रता से प्रभावित कर सकते हैं।
भारत–पश्चिम एशिया संबंध
- रणनीतिक दूरी एवं संतुलन साधना : दशकों तक भारत ने मुख्यतः आर्थिक और प्रवासी-केंद्रित दृष्टिकोण से पश्चिम एशिया को देखा।
- भारत ने सऊदी अरब, ईरान, इज़राइल और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे परस्पर प्रतिस्पर्धी देशों के साथ संबंध बनाए रखे, लेकिन किसी भी क्षेत्रीय सुरक्षा गुट का हिस्सा बनने से स्वयं को अलग रखा हिया।
- अब बहु-संरेखण के रूप में वर्णित इस दृष्टिकोण ने भारत को पर्याप्त रणनीतिक लचीलापन प्रदान किया।
- भारत एक साथ ऊर्जा संसाधन प्राप्त कर सकता था, खाड़ी देशों की पूंजी तक पहुँच बना सकता था, अपने प्रवासी समुदाय की सुरक्षा कर सकता था तथा ईरान और इज़राइल दोनों के साथ संबंध बनाए रख सकता था।
- आर्थिक संबंधों से रणनीतिक जुड़ाव की ओर: भारत की भागीदारी पहले ही रक्षा सहयोग, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, समुद्री अभ्यासों, आतंकवाद-रोधी सहयोग तथा UAE, सऊदी अरब, इज़राइल, ओमान और अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से गहरी हो चुकी है।
- हालाँकि, क्षेत्रीय परिस्थितियाँ भारत के पारंपरिक कूटनीतिक तंत्र की तुलना में अधिक तीव्रता से बदल रही हैं।
- अमेरिका द्वारा चयनात्मक भागीदारी की ओर संभावित बदलाव की धारणा ने पश्चिम एशियाई देशों को वैकल्पिक और अधिक विश्वसनीय सुरक्षा साझेदारों की खोज के लिए प्रेरित किया है।
- सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान को शामिल करने वाला मक्का संयुक्त रक्षा समझौता सऊदी वित्तीय संसाधनों, तुर्किये की रक्षा क्षमताओं और पाकिस्तानी सैन्य विशेषज्ञता को एक साथ लाता है। यह संकेत देता है कि भारत की भागीदारी के बिना भी नई सुरक्षा व्यवस्थाएँ उभर सकती हैं।
भारत का दृष्टिकोण दबाव में क्यों है?
- अमेरिका की बदलती भूमिका: वाशिंगटन की दीर्घकालिक सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर बढ़ती अनिश्चितता क्षेत्रीय सुरक्षा शून्यता उत्पन्न कर रही है।
- सैन्य शक्ति-आधारित कूटनीति का उदय: खाड़ी देश अब केवल आर्थिक साझेदारी के बजाय रक्षा प्रौद्योगिकी, खुफिया जानकारी, नौसैनिक क्षमताओं और आतंकवाद-रोधी सहयोग की बढ़ती आवश्यकता महसूस कर रहे हैं।
- क्षेत्रीय संघर्ष: ईरान, यमन, सूडान, लाल सागर और व्यापक खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव के परस्पर जुड़े हुए सुरक्षा संबंधी प्रभाव हैं।
- अवसंरचना की संवेदनशीलता: ड्रोन और ग्रे-ज़ोन हमले यह दर्शाते हैं कि भारी निवेश के बावजूद उन्नत बंदरगाह, ऊर्जा प्रतिष्ठान और लॉजिस्टिक्स केंद्र अभी भी असुरक्षित हैं।
- कमजोर व्यापार गलियारे: समुद्री संकरे मार्ग और स्थल-आधारित गलियारे उतने ही सुदृढ़ होते हैं, जितनी उनकी सबसे अस्थिर भौगोलिक शृंखला होती है।
- प्रतिस्पर्धी क्षेत्रीय शक्तियाँ: तुर्किये, पाकिस्तान और अन्य बाहरी शक्तियाँ क्षेत्र में अपने रणनीतिक प्रभाव का विस्तार कर रही हैं।
भारत की संवेदनशीलताएँ
- ऊर्जा सुरक्षा: होर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी के आसपास उत्पन्न व्यवधान भारत की ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।
- समुद्री एवं व्यापार सुरक्षा: लाल सागर, अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंदेब वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- इन संकरे समुद्री मार्गों में उत्पन्न व्यवधान से परिवहन में देरी हो सकती है, बीमा लागत बढ़ सकती है और आपूर्ति शृंखलाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
- प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: लाखों भारतीय खाड़ी देशों में रहते और कार्य करते हैं। इसलिए क्षेत्रीय अस्थिरता का भारतीय नागरिकों, प्रेषण और निकासी अभियानों पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
- संपर्कता: भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी परियोजनाएँ पूरे पश्चिम एशिया में राजनीतिक एवं भौतिक स्थिरता पर निर्भर करती हैं।
- लाल सागर में हालिया समुद्री परिवहन व्यवधान यह दर्शाते हैं कि उन्नत बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स अवसंरचना भी ड्रोन एवं मिसाइल जैसे असममित खतरों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है।
आगे की राह: लाभार्थी से सुरक्षा प्रदाता की ओर
- भारत को रणनीतिक स्वायत्तता का परित्याग किए बिना क्षेत्रीय स्थिरता के निष्क्रिय लाभार्थी से उसके सक्रिय योगदानकर्ता के रूप में विकसित होना चाहिए।
- समुद्री सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण: संयुक्त गश्त, लॉजिस्टिक्स तक पहुँच और परस्पर-संचालनीय निगरानी के माध्यम से होर्मुज जलडमरूमध्य, ओमान की खाड़ी, अदन की खाड़ी, सोमाली तट और बाब-अल-मंदेब में नौसैनिक सहयोग का विस्तार किया जाना चाहिए।
- लघु-बहुपक्षीय सुरक्षा नेटवर्क का निर्माण: कठोर गठबंधन प्रतिबद्धताओं से बचते हुए UAE, सऊदी अरब, इज़राइल और अन्य इच्छुक देशों के साथ परिचालन स्तर की साझेदारियों को बेहतर किया जाना चाहिए।
- रक्षा विनिर्माण का लाभ उठाना: संयुक्त उत्पादन और सैन्य अभ्यासों के साथ-साथ भारत को रक्षा प्लेटफॉर्म, निगरानी प्रणालियों और समुद्री प्रौद्योगिकियों के एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
- खुफिया एवं आतंकवाद-रोधी सहयोग का विस्तार: संस्थागत रूप से सुदृढ़ खुफिया-साझाकरण तंत्र आतंकवाद, ड्रोन, समुद्री डकैती और अन्य ग्रे-ज़ोन खतरों से निपटने में सहायक हो सकता है।
- संपर्कता की सुरक्षा: IMEC और अन्य व्यापार गलियारों को समुद्री सुरक्षा नियोजन के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए, ताकि आर्थिक संपर्कता को रणनीतिक लचीलेपन का समर्थन प्राप्त हो।
निष्कर्ष
- भारत का बहु-संरेखण दृष्टिकोण अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन लगातार अधिक प्रतिस्पर्धी होते पश्चिम एशिया में यह सुरक्षा क्षमताओं का विकल्प नहीं हो सकता।
- उद्देश्य किसी गठबंधन में उलझना नहीं, बल्कि समुद्री शक्ति, रक्षा सहयोग, खुफिया जानकारी और रणनीतिक साझेदारियों पर आधारित निवारण तंत्र का निर्माण होना चाहिए।
- भारत के लिए एक विश्वसनीय सुरक्षा प्रदाता बनना उसकी ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखाओं, व्यापार मार्गों, प्रवासी भारतीयों तथा एक अग्रणी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने की व्यापक आकांक्षा की सुरक्षा के लिए लगातार अधिक आवश्यक होता जा रहा है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] उभरती क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बीच खाड़ी क्षेत्र में भारत के एक निष्क्रिय लाभार्थी से एक विश्वसनीय सुरक्षा प्रदाता के रूप में संक्रमण की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: TH
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