पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण; आपदा प्रबंधन
सन्दर्भ
- हाल ही में, नेपाल की भोटेकोशी नदी प्रणाली में आई एक विनाशकारी आकस्मिक बाढ़(a devastating flash flood) ने रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में व्यापक तबाही मचाई।
- प्रभावित रसुवागढ़ी–भोटेकोशी–त्रिशूली गलियारा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह नेपाल को तिब्बत से जोड़ता है और पर्याप्त मात्रा में सीमा-पार व्यापार तथा तीर्थयात्रा यातायात को वहन करता है।
भोटेकोशी आकस्मिक बाढ़(Bhotekoshi Flash Flood) और हिमालयी बाढ़ की घटना
- उपग्रह अवलोकनों से संकेत मिलता है कि इसमें हिमस्खलन (ice avalanche), पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी भूमि) का खिसकना और चट्टान खिसकना (rockslide) जैसी घटनाओं के बीच एक जटिल अंतःक्रिया हुई।
- वैज्ञानिकों ने इस व्यापक गति को स्टर्ज़स्ट्रॉम (sturzstrom) के रूप में वर्णित किया है, जो एक विनाशकारी चट्टानी हिमस्खलन है और तेज़ी से लंबी दूरी तक यात्रा करने में सक्षम होता है।
- जब चट्टान बर्फ, बर्फबारी, जमी हुई मिट्टी और पानी के साथ मिल जाती है, तो घर्षण और प्रतिरोध कम हो सकता है, जिससे यह द्रव्यमान तेजी से गति पकड़ सकता है और नीचे की ओर जाकर मलबा प्रवाह (debris flow) तथा बाढ़ में परिवर्तित हो सकता है।
- यह पारंपरिक मानसूनी बाढ़ से अलग है और यह दर्शाता है कि हिमालयी आपदाओं में कई परस्पर संबंधित कारण एक साथ सक्रिय हो सकते हैं।

व्यापक हिमालयी संकट से संबंध
- हिमालय में संयुक्त आपदाओं (compound hazards) की घटनाएँ बढ़ रही हैं, जिनमें हिमनद झील के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ (GLOFs), भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, मलबा प्रवाह और अत्यधिक वर्षा शामिल हैं।
- उत्तराखंड में चमोली आपदा (2021) में भी इसी प्रकार बड़े पैमाने पर चट्टान और बर्फ का हिमस्खलन हुआ था, जो बाद में एक विनाशकारी मलबा प्रवाह में परिवर्तित हो गया।
- भोटेकोशी की यह घटना इसी नदी प्रणाली में पहले हुई बाढ़ की घटनाओं के बाद सामने आई है, जो हिमालयी घाटियों की अचानक होने वाली उच्च-ऊंचाई वाली घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है।
हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ के प्रमुख कारण
- हिमनद और पर्माफ्रॉस्ट की अस्थिरता: बढ़ता तापमान हिमनदों के पीछे हटने और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने की प्रक्रिया को तेज करता है, जिससे पर्वतीय ढलान कमजोर हो जाते हैं।
- हिमनद झील के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ (GLOFs): तेजी से फैलती हिमनद झीलें अपने प्राकृतिक बांधों को तोड़ सकती हैं और भारी मात्रा में पानी छोड़ सकती हैं।
- अत्यधिक वर्षण: जलवायु परिवर्तन कम अवधि में होने वाली तीव्र वर्षा और बादल फटने की घटनाओं को अधिक गंभीर बना सकता है।
- खड़ी स्थलाकृति: ऊंचाई में बड़े अंतर ढलानों के विफल होने की घटनाओं को तेज गति वाले मलबा प्रवाह में बदल देते हैं।
- भूकंपीय और भूवैज्ञानिक नाजुकता: युवा और विवर्तनिक रूप से सक्रिय पर्वत स्वाभाविक रूप से भूस्खलन और चट्टान गिरने के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
- अनियोजित बुनियादी ढाँचा: सड़कें, जलविद्युत परियोजनाएँ और बस्तियाँ अस्थिर ढलानों तथा नदी चैनलों को प्रभावित कर सकती हैं।
- सीमापार नदी प्रणालियाँ: एक देश में उत्पन्न होने वाली आपदाएँ तेजी से दूसरे देश में स्थित निचले क्षेत्रों के समुदायों को प्रभावित कर सकती हैं।
हिमालयी बाढ़ के प्रभाव
- मानवीय और आर्थिक लागत: बाढ़ से मृत्यु, विस्थापन, घरों का विनाश, कृषि को नुकसान और आजीविका में व्यवधान होता है।
- दूरदराज के पर्वतीय समुदाय विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं, क्योंकि क्षतिग्रस्त सड़कें और पुल उन्हें राहत सहायता से अलग-थलग कर सकते हैं।
- बुनियादी ढाँचा और संपर्क: जलविद्युत प्रतिष्ठानों, सड़कों, पुलों और सीमा-पार व्यापार के बुनियादी ढाँचे को गंभीर जोखिम का सामना करना पड़ता है।
- रसुवागढ़ी क्रॉसिंग को होने वाला नुकसान नेपाल-चीन व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क को प्रभावित कर सकता है।
- पारिस्थितिक प्रभाव: बाढ़ और भूस्खलन मृदा अपरदन को तेज करते हैं, आवासों को नष्ट करते हैं और नदी पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर करते हैं।
- बार-बार होने वाली घटनाएँ नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों की लचीलापन क्षमता (resilience) को कम कर सकती हैं।
- रणनीतिक और क्षेत्रीय प्रभाव: चूँकि हिमालयी नदियाँ राष्ट्रीय सीमाओं को पार करती हैं, इसलिए आपदा प्रबंधन के लिए भारत-नेपाल-चीन सहयोग आवश्यक है, विशेष रूप से सूचना साझा करने, उपग्रह निगरानी और निचले क्षेत्रों के लिए चेतावनी जारी करने के संबंध में।
प्रयास और पहल: वैश्विक एवं भारतीय
- भारत ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) की बाढ़ पूर्वानुमान प्रणालियों के माध्यम से अपने आपदा-प्रबंधन ढाँचे को लगातार मजबूत किया है।
महत्वपूर्ण उपायों में शामिल हैं:
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ (EWS) और वास्तविक समय में जल-मौसम संबंधी निगरानी।
- GLOF जोखिम का आकलन और हिमनद झीलों की निगरानी।
- InSAR और उपग्रह-आधारित भूस्खलन निगरानी।
- आपदा जोखिम क्षेत्र निर्धारण (Hazard zonation) और जलवायु-लचीला बुनियादी ढाँचा।
- समुदाय-आधारित आपदा तैयारी और निकासी अभ्यास।
- IMD, CWC, ISRO, NDMA और राज्य प्राधिकरणों के बीच बेहतर समन्वय।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क (2015–2030) आपदा जोखिम को समझने, शासन व्यवस्था को मजबूत करने, लचीलेपन में निवेश करने और तैयारी में सुधार करने को बढ़ावा देता है।
- यूएन अर्ली वार्निंग्स फ़ॉर आल (UN Early Warnings for All) पहल प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करने का प्रयास करती है, जबकि विश्व बैंक कमजोर देशों में आपदा-जोखिम वित्तपोषण, लचीले बुनियादी ढाँचे और जलवायु अनुकूलन का समर्थन करता है।
- विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) की रिपोर्टों से पता चलता है कि जलवायु लचीलेपन में निवेश उच्च प्रतिफल प्रदान करता है, जिसमें प्रत्येक $1 के निवेश पर सामान्यतः $4 से लेकर $8.60 तक की संरक्षित संपत्ति या शुद्ध लाभ प्राप्त होता है।
बाढ़-लचीला, सतत हिमालय
- जलवायु परिवर्तन को स्वतः ही प्रत्येक हिमालयी आपदा का एकमात्र कारण नहीं माना जाना चाहिए।
- भोटेकोशी मामले में, वैज्ञानिकों ने कई परस्पर संबंधित भूवैज्ञानिक और जलवायु संबंधी कारकों की पहचान की है।
- भोटेकोशी त्रासदी एक महत्वपूर्ण सीमा को उजागर करती है: प्रारंभिक चेतावनी तभी उपयोगी होती है जब कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध हो।
- स्टर्ज़स्ट्रॉम (sturzstrom) जैसी अत्यंत तीव्र गति से होने वाली घटनाएँ पारंपरिक चेतावनी प्रणालियों को निष्प्रभावी कर सकती हैं।
आगे की राह
इसलिए, एक सतत हिमालयी रणनीति को निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए:
- केवल बाढ़-आधारित प्रणालियों के बजाय बहु-आपदा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ।
- हिमनदों, हिमनद झीलों, पर्माफ्रॉस्ट और अस्थिर ढलानों की निरंतर निगरानी।
- जोखिम-संवेदनशील भूमि उपयोग नियोजन और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध।
- जलवायु-लचीली सड़कें, पुल और जलविद्युत बुनियादी ढाँचा।
- पर्वतीय आर्द्रभूमियों, वनों और प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों का पुनर्स्थापन।
- हिमालयी देशों के बीच सीमापार डेटा साझा करने की व्यवस्था को मजबूत करना।
- प्रशिक्षण और निकासी योजना के माध्यम से स्थानीय समुदायों को प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता (first responders) के रूप में तैयार करना।
- केवल आपदा के बाद राहत पर ध्यान देने के बजाय आपदा की रोकथाम और जोखिम न्यूनीकरण पर अधिक जोर देना।
निष्कर्ष
- भोटेकोशी की आकस्मिक बाढ़ एक याद दिलाती है कि हिमालयी आपदा परिदृश्य पूर्वानुमेय मौसमी बाढ़ से आगे बढ़कर जटिल, संयुक्त और संभावित रूप से अत्यंत तीव्र आपदाओं की ओर विकसित हो रहा है।
- लक्ष्य केवल नष्ट हुई चीजों का पुनर्निर्माण करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह निर्धारित करना भी होना चाहिए कि पुनर्निर्माण कहाँ सुरक्षित और सतत है।
- बाढ़-लचीले हिमालय के लिए भूविज्ञान, हिमनद विज्ञान, जलवायु विज्ञान, प्रौद्योगिकी, पारिस्थितिक संरक्षण और क्षेत्रीय सहयोग का एकीकरण आवश्यक होगा।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] हिमालयी बाढ़ के पीछे भूवैज्ञानिक, जलवायु संबंधी और मानवजनित कारकों की चर्चा कीजिए। भारत और अन्य हिमालयी देशों के लिए इनके निहितार्थों का परीक्षण कीजिए तथा बाढ़-लचीले और सतत हिमालय के निर्माण के लिए उपाय सुझाइए। |
स्रोत: TH
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