पाठ्यक्रम: जीएस-3/ अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- भारत के आर्थिक विकास के अनुमान में नीचे की ओर संशोधन किए जाने तथा परिवारों पर बढ़ते वित्तीय दबाव के बीच यह चिंता उभरकर सामने आई है कि अर्थव्यवस्था के-आकार (K-Shaped) के विकास प्रतिरूप की ओर बढ़ रही है।
के-आकार की अर्थव्यवस्था क्या है?
- के-आकार की अर्थव्यवस्था ऐसी स्थिति है, जिसमें अर्थव्यवस्था के विभिन्न वर्ग एक ही समय में विपरीत दिशाओं में आगे बढ़ते हैं।
- के-आकार के ऊपरी भाग का प्रतिनिधित्व उन लोगों, क्षेत्रों और कंपनियों से होता है, जिनकी आय, लाभ तथा संपत्ति में वृद्धि हो रही होती है।
- के-आकार का निचला भाग उन परिवारों, श्रमिकों और छोटे व्यवसायों का प्रतिनिधित्व करता है, जिनकी आय स्थिर हो जाती है, ऋण बढ़ता है और आर्थिक परिस्थितियाँ बदतर होती जाती हैं।

भारत में के-आकार की विशेषताएँ किस प्रकार दिखाई दे रही हैं?
- भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक रुझान (ऊपरी भाग)
- सेवा क्षेत्र आर्थिक विकास का प्रमुख प्रेरक बना हुआ है तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था की मंदी के प्रभाव के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच का कार्य कर रहा है।
- निर्माण क्षेत्र का विस्तार हो रहा है, जिससे रोजगार सृजन और घरेलू माँग को बढ़ावा मिल रहा है।
- विनिर्माण क्षेत्र के कुछ उप-क्षेत्र, विशेषकर निवेश और आधारभूत संरचना पर होने वाले व्यय से जुड़े क्षेत्र, उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ बने हुए हैं।
- कंपनियों के प्रारंभिक आय-परिणाम स्वस्थ लाभ वृद्धि का संकेत देते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि बड़े औपचारिक उद्यम मजबूत तुलन-पत्र तथा उच्च आय वर्ग की माँग से निरंतर लाभान्वित हो रहे हैं।
- बैंकिंग क्षेत्र स्वस्थ स्थिति में है, जहाँ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPA) ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर हैं, पूँजी पर्याप्तता का स्तर संतोषजनक है तथा परिसंपत्तियों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
- भारतीय अर्थव्यवस्था में उभरती कमजोरियाँ (निचला भाग):
- परिवारों का ऋण सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 48% तक पहुँच गया है, जो परिवारों की उधार पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है।
- खुदरा ऋण में वृद्धि का उपयोग मुख्यतः उपभोग के लिए हो रहा है, न कि आवास, व्यवसाय विस्तार अथवा शिक्षा के लिए, जिससे ऋण की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
- स्वर्ण ऋण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है तथा अनेक परिवार सोने की बढ़ी हुई कीमतों का लाभ उठाकर अधिक ऋण ले रहे हैं और अपने पूर्व ऋण दायित्वों का नवीनीकरण (रोल ओवर) कर रहे हैं।
- निम्न-आय वाले परिवारों का नए खुदरा ऋणों में चूक (डिफॉल्ट) का अनुपात अधिक है, जो कमजोर उधारकर्ताओं के बीच वित्तीय दबाव के केंद्रित होने का संकेत देता है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षणों से पता चलता है कि शहरी उपभोक्ता विश्वास में लगातार तीन दौरों से गिरावट दर्ज की गई है।
भारत में के-आकार की अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक कारण
- औपचारीकरण का आघात (Formalization Shock): वस्तु एवं सेवा कर (GST) तथा डिजिटल अनुपालन ने बड़े उद्यमों की दक्षता में सुधार किया है। किंतु छोटे अनौपचारिक उद्यमों को अधिक अनुपालन और समायोजन लागत का सामना करना पड़ा है।
- प्रौद्योगिकी तक असमान पहुँच: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI),स्वचालन और डिजिटल मंचों का लाभ मुख्यतः कुशल श्रमिकों तथा प्रौद्योगिकी-प्रधान कंपनियों को मिलता है। सीमित डिजिटल कौशल वाले श्रमिकों के लिए रोजगार विस्थापन और आय ठहराव का जोखिम बढ़ जाता है।
- संपत्ति असमानता: शेयर बाज़ार और अचल संपत्ति के मूल्यों में वृद्धि का लाभ मुख्यतः उन परिवारों को मिलता है, जिनके पास पहले से वित्तीय और भौतिक संपत्तियाँ मौजूद हैं।
- रोजगारविहीन विकास (Jobless Growth): सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि पर्याप्त गुणवत्ता वाले रोजगार अवसरों में परिवर्तित नहीं हो पाई है, विशेषकर युवाओं और कम-कौशल वाले श्रमिकों के लिए।
- तेल एक निर्णायक कारक (Oil as the Swing Factor): भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग नौ-दसवाँ हिस्सा आयात करता है, जिससे वैश्विक तेल कीमतें घरेलू मुद्रास्फीति, विकास और बाह्य स्थिरता की महत्वपूर्ण निर्धारक बन जाती हैं।
आर्थिक निहितार्थ
बढ़ती असमानता:
- यदि के-आकार का प्रतिरूप लंबे समय तक बना रहता है, तो आय असमानता, संपत्ति असमानता और क्षेत्रीय विषमताएँ और अधिक बढ़ेंगी।
कमज़ोर समग्र माँग:
- यदि आय वृद्धि शीर्ष वर्ग तक सीमित रहती है, तो समग्र उपभोग माँग दबाव में रह सकती है, क्योंकि उच्च आय वर्ग की उपभोग की सीमांत प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम होती है।
सामाजिक और राजनीतिक जोखिम:
- निरंतर बढ़ता विभाजन उपभोक्ता विश्वास में गिरावट, सामाजिक असंतोष और लोकलुभावन नीतियों की माँग को बढ़ावा दे सकता है।
पाइपलाइन प्रभाव: लागत-प्रेरित मुद्रास्फीति
- ईंधन और बिजली की बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था में उत्पादन और परिवहन लागत को बढ़ा देती हैं।
- ये बढ़ी हुई लागतें धीरे-धीरे उपभोक्ताओं तक उच्च खाद्य और खुदरा कीमतों के रूप में पहुँचती हैं।
- ऊर्जा लागतों के उपभोक्ता मुद्रास्फीति में विलंबित प्रसारण को “पाइपलाइन में प्रतीक्षारत मुद्रास्फीति” कहा जाता है।
आगे की राह
आपूर्ति-पक्ष प्रबंधन:
- मुद्रास्फीति को अर्थव्यवस्था में स्थायी रूप से जड़ें जमाने से पहले आपूर्ति प्रबंधन के माध्यम से नियंत्रित किया जाना चाहिए।
- दालों, खाद्य तेलों और पशु-चारा सामग्री का समय पर आयात, खाद्य भंडार का निर्गमन, बेहतर रसद व्यवस्था तथा ईंधन करों में संतुलित कटौती केवल ब्याज-दर वृद्धि पर निर्भर रहने की अपेक्षा अधिक प्रभावी हो सकती है।
ऋण-समर्थित से आय-समर्थित उपभोग की ओर:
- तेज़ रोजगार सृजन, वास्तविक मजदूरी वृद्धि, स्वास्थ्य और शिक्षा पर परिवारों के व्यय में कमी तथा अचानक आय-आघातों के विरुद्ध मजबूत सुरक्षा उपभोग माँग को टिकाऊ बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
पूँजीगत व्यय की सुरक्षा:
- सरकारों को आधारभूत संरचना, सिंचाई, विद्युत प्रणालियों, विद्यालयों, स्वास्थ्य सेवाओं और रसद पर पूँजीगत व्यय की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि ये निवेश दीर्घकाल में उत्पादकता और ग्रामीण आय बढ़ाते हैं।
वैज्ञानिक क्षमता को आर्थिक रणनीति में बदलना:
- अर्धचालक, उन्नत सामग्री, जैव प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और रक्षा विनिर्माण पर अधिक ध्यान भारत को उच्च-मूल्य वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में आगे बढ़ने में सहायता करेगा।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश [प्रश्न] भारत की हालिया विकास प्रवृत्ति ने के-आकार की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं। भारत में के-आकार की वृद्धि के कारणों का परीक्षण कीजिए तथा परिवारों के उपभोग, असमानता और व्यापक आर्थिक स्थिरता पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिए। |
स्रोत: IE
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