पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- भारत की संसद लोकसभा तथा सभी राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने के उद्देश्य से संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक पर विचार करने जा रही है। इसके अंतर्गत एक नया अनुच्छेद 82A जोड़े जाने तथा अनुच्छेद 83 एवं अनुच्छेद 172 में संशोधन का प्रस्ताव है।
- इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत तथा कम-से-कम आधे राज्यों द्वारा अनुमोदन आवश्यक होगा।
एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) के बारे में
- इसका उद्देश्य लोकसभा तथा सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना है, जिससे 1952–1967 के दौरान प्रचलित समान निर्वाचन चक्र को पुनः स्थापित किया जा सके।
- चूँकि यह प्रस्ताव भारत की संघीय व्यवस्था को प्रभावित करता है, इसलिए इसके लिए संविधान संशोधन, संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत तथा कम-से-कम आधे राज्यों द्वारा अनुमोदन आवश्यक है।
- प्रस्तावित ढाँचे में एक साथ चुनाव कराने हेतु अनुच्छेद 82A को सम्मिलित करने तथा समान निर्वाचन चक्र सुनिश्चित करने के लिए क्रमशः लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं की अवधि में संशोधन करने हेतु अनुच्छेद 83 और अनुच्छेद 172 में संशोधन का प्रावधान किया गया है।
विधेयक के पीछे तर्क
- सरकारों तथा राजनीतिक दलों पर चुनावों के बार-बार होने वाले व्यय को कम करना।
- आदर्श आचार संहिता (MCC) के कारण शासन-प्रशासन में आने वाले व्यवधान को न्यूनतम करना।
- सुरक्षा बलों एवं सरकारी कर्मचारियों की बार-बार तैनाती के भार को कम करना।
- प्रशासन तथा नीतियों के क्रियान्वयन में निरंतरता को सुदृढ़ करना।
- आर्थिक विकास को बढ़ावा देने हेतु नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित करना।
- भारत के पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति (HLC) ने निष्कर्ष निकाला है कि समकालिक चुनावों से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर में लगभग 1.5–1.6 प्रतिशत अंक की वृद्धि हो सकती है।
एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) के पक्ष में तर्क
- प्रशासनिक दक्षता: चुनाव बार-बार आयोजित किए जाते हैं, जिसके कारण सुरक्षा बलों, निर्वाचन अधिकारियों तथा शिक्षकों की बार-बार तैनाती करनी पड़ती है। इससे शासन-प्रशासन एवं सार्वजनिक सेवा वितरण प्रभावित होता है।
- समकालिक चुनाव प्रशासनिक कार्यों में निरंतरता को बढ़ावा दे सकते हैं।
- आदर्श आचार संहिता (MCC) के प्रभाव में कमी: बार-बार आदर्श आचार संहिता (MCC) लागू होने से नई सरकारी योजनाओं एवं नीतिगत घोषणाओं में विलंब होता है।
- एक समकालिक निर्वाचन चक्र बार-बार होने वाले प्रशासनिक व्यवधानों को कम कर सकता है।
- व्यय में बचत: सरकार का मत है कि एक साथ चुनाव कराने से लॉजिस्टिक्स, मतदान अवसंरचना तथा सुरक्षा व्यवस्थाओं पर होने वाला व्यय कम होगा।
- आधिकारिक आकलनों के अनुसार, लगातार निर्वाचन चक्रों में सार्वजनिक संसाधनों की उल्लेखनीय बचत संभव है।
- नीतिगत स्थिरता: कम चुनाव होने का अर्थ है कि सरकारें निरंतर चुनावी गतिविधियों में व्यस्त रहने के बजाय दीर्घकालिक शासन एवं विकासात्मक नीतियों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।
एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) के विरुद्ध तर्क
- संदिग्ध आर्थिक औचित्य: मुख्य आर्थिक तर्क यह है कि एक साथ चुनाव होने और उच्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि के बीच संबंध पाया जाता है। किंतु—
- भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि की अवधि (2003–2011) चरणबद्ध चुनावों के साथ ही रही।
- आर्थिक वृद्धि का मुख्य कारण चुनावों का समय नहीं हो सकता, क्योंकि इसके प्रमुख कारक 1991 के आर्थिक सुधार, वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार तथा पूँजी प्रवाह रहे हैं।
- इससे यह संकेत मिलता है कि वृद्धि का कुछ प्रभाव सरकारी व्यय तथा राजकोषीय घाटे के माध्यम से आता है, जिससे संरचनात्मक आर्थिक लाभों के बजाय राजनीतिक व्यावसायिक चक्रों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- चुनावी व्यय पर सीमित प्रभाव: निर्वाचन आयोग के अभिलेखों के अनुसार, चुनावों पर सरकारी व्यय कुल सार्वजनिक व्यय का अत्यंत छोटा भाग है।
- चुनावी व्यय का एक बड़ा हिस्सा लेखांकन से बाहर रहता है, जिसे सामान्यतः ‘काला धन’ कहा जाता है। स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनावों में यह राशि ₹1 लाख करोड़ से अधिक रही।
- समकालिक चुनावों से व्यय कम होने के बजाय केवल उसका समय परिवर्तित हो सकता है।
- संघीय व्यवस्था संबंधी चिंताएँ: एक साथ चुनाव होने से ‘लहर प्रभाव/वेव इफेक्ट’ उत्पन्न हो सकता है, जिसमें मतदाता संसद तथा राज्य विधानसभाओं दोनों के लिए एक ही राजनीतिक दल को मतदान कर सकते हैं।
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि संसदीय लोकतंत्र तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं।
- इससे राज्य-विशिष्ट मुद्दों का महत्व कम हो सकता है तथा क्षेत्रीय दल कमजोर पड़ सकते हैं, जिससे भारत की सहकारी संघीय व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) का परीक्षण
- राजनीतिक आयाम: अनुच्छेद 75 के अनुसार, संसदीय लोकतंत्र सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर आधारित है।
- यदि सामान्य निर्वाचन चक्र की समाप्ति से पूर्व कोई सरकार अपना बहुमत खो देती है, तो समयपूर्व विघटन अथवा राष्ट्रपति शासन की विस्तारित अवधि से संबंधित संवैधानिक जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- जर्मनी की व्यवस्था के आधार पर प्रस्तावित रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव भारत की स्थापित संसदीय परंपरा से एक महत्वपूर्ण विचलन माना जाता है।
- आर्थिक आयाम: भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, चुनावों पर सरकारी व्यय केंद्रीय बजट का 0.1 प्रतिशत से भी कम है।
- अतः सरकारी चुनावी व्यय में होने वाली संभावित बचत अपेक्षाकृत सीमित प्रतीत होती है।
- आदर्श आचार संहिता (MCC) से उत्पन्न प्रशासनिक व्यवधान समाप्त होने के बजाय एक ही राष्ट्रीय चुनाव अवधि में केंद्रित हो सकते हैं, जिससे अस्थायी व्यवधान और अधिक व्यापक हो सकते हैं।
- एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) के आर्थिक लाभों के समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य अभी भी सहसंबंधात्मक हैं, न कि निर्णायक।
- सामाजिक एवं संवैधानिक आयाम: चुनावों के अनुरूप विधानसभाओं की अवधि निर्धारित करने से जनादेश तथा निर्वाचन उत्तरदायित्व से संबंधित प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
- इस प्रस्ताव में पंचायतों तथा शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों को सम्मिलित नहीं किया गया है। 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों के अनुसार इनका संचालन राज्य निर्वाचन आयोगों द्वारा किया जाता रहेगा। परिणामस्वरूप शासन-प्रशासन तथा सार्वजनिक व्यय से संबंधित अनेक समस्याएँ यथावत बनी रहेंगी।
आगे की राह : भारत में चुनावी व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण
- सुधारों का उद्देश्य केवल निर्वाचन समकालिकीकरण के माध्यम से ही नहीं, बल्कि चुनावों की गुणवत्ता एवं अखंडता को सुदृढ़ बनाना होना चाहिए।
- राजनीतिक चंदे के अनिवार्य प्रकटीकरण तथा राजनीतिक वित्तपोषण को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
- प्रत्याशियों के निर्वाचन व्यय की निर्धारित सीमा का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगाने तथा विधि के अनुसार दोषसिद्ध प्रत्याशियों की अयोग्यता की प्रक्रिया में तीव्रता लाई जानी चाहिए।
- भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की स्वायत्तता एवं संस्थागत क्षमता को अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- भारत की संघीय तथा संसदीय संवैधानिक संरचना की रक्षा करते हुए चुनावी वित्तपोषण के विनियमन, प्रौद्योगिकी के उपयोग तथा मतदाता जागरूकता को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) का उद्देश्य समकालिक चुनावों तथा बेहतर प्रशासनिक दक्षता के माध्यम से शासन-व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है। तथापि, इसके आर्थिक लाभ अभी भी परिचर्चा का विषय हैं तथा इससे जुड़े संवैधानिक, संघीय एवं लोकतांत्रिक प्रश्नों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया जाना आवश्यक है।
- किसी भी प्रकार के चुनावी सुधार में उसके दूरगामी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए प्रशासनिक दक्षता और संसदीय लोकतंत्र, संघवाद तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों जैसे उन सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए, जो भारतीय संविधान की मूल संरचना का अभिन्न अंग हैं।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE)’ का प्रस्ताव लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनावों को समकालिक बनाकर शासन-व्यवस्था में सुधार लाने का प्रयास करता है। इसके संवैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा संघीय निहितार्थों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: IE