भारत की नीली अर्थव्यवस्था(Blue Economy)

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था 

चर्चा में क्यों?

  • भारत में मत्स्य क्षेत्र नीली अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो लगभग तीन करोड़ लोगों की आजीविका प्रदान करता है तथा उत्पादन, निर्यात और तटीय विकास को बढ़ावा देता है।

पृष्ठभूमि

  • नीली अर्थव्यवस्था का आर्थिक दर्शन पहली बार वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU) में प्रोफेसर गुंटर पाउली द्वारा एक सतत विकास दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिसका उद्देश्य अपशिष्ट, उत्सर्जन और पर्यावरणीय क्षति को कम करते हुए आर्थिक विकास उत्पन्न करना है।
  • रियो+20 शिखर सम्मेलन (2012) और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 14 को अपनाए जाने के बाद इसे वैश्विक महत्व प्राप्त हुआ। यह लक्ष्य महासागरों और समुद्री संसाधनों के संरक्षण तथा सतत उपयोग को बढ़ावा देता है।

नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy)

  • यह आर्थिक विकास, बेहतर आजीविका और रोजगार के लिए महासागरीय और तटीय संसाधनों के सतत उपयोग को संदर्भित करती है, साथ ही महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
  • भारत में इसमें समुद्री संसाधन और बुनियादी ढाँचा शामिल हैं, जिनमें आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया जाता है। इनमें सतत मत्स्य पालन और जलीय कृषि, अपतटीय पवन ऊर्जा तथा अन्य नवीकरणीय समुद्री ऊर्जा स्रोत 

शामिल हैं।

भारत में नीली अर्थव्यवस्था का महत्व

  • आर्थिक विकास और व्यापार: नीली अर्थव्यवस्था भारत के सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
  • भारत के लगभग 95% व्यापार की मात्रा और लगभग 70% व्यापार के मूल्य का संचालन बंदरगाहों के माध्यम से होता है।
  • बेहतर बंदरगाह, नौवहन और समुद्री उद्योग निर्यात और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देंगे।
  • रोजगार: मत्स्य पालन और इससे संबंधित गतिविधियाँ लगभग 3 करोड़ लोगों को आजीविका प्रदान करती हैं।
  • मछली पकड़ने, पर्यटन, प्रसंस्करण और कौशल विकास उद्योगों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और गरीबी में कमी लाई जा सकती है।
  • खाद्य सुरक्षा: मछली प्रोटीन और पोषक तत्वों की महत्वपूर्ण मात्रा प्रदान करती है।
  • नीला कार्बन एवं जलवायु लचीलापन: मैंग्रोव और समुद्री घास तटीय पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जो कार्बन का भंडारण करते हैं और तटरेखाओं को तूफानों, कटाव तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाते हैं।
  • सुरक्षा और संप्रभुता: एक मजबूत नीली अर्थव्यवस्था भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और अपतटीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा करती है और इस प्रकार भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करती है।
  • यह हिंद महासागर में बेहतर क्षेत्रीय सहयोग को भी बढ़ावा देती है तथा बंदरगाहों, गहरे समुद्र की प्रौद्योगिकी और समुद्री बुनियादी ढाँचे में निवेश के माध्यम से भारत की रणनीतिक पहुँच को बढ़ाती है।

चुनौतियाँ

  • पर्यावरणीय क्षरण: अत्यधिक मत्स्यन, औद्योगिक अपवाह, तटीय कटाव और बढ़ते समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण के कारण समुद्री जैव विविधता और मछली भंडार खतरे में हैं।
  • जलवायु संवेदनशीलता: समुद्र के बढ़ते जल स्तर, गर्म होते महासागर और अधिक लगातार आने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का तटीय समुदायों, बंदरगाह के बुनियादी ढाँचे और पारंपरिक मत्स्य पालन गतिविधियों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
  • बुनियादी ढाँचे की कमियाँ: खंडित शीत श्रृंखला, पुराने मछली पकड़ने वाले बेड़े तथा सीमित जहाज निर्माण और मरम्मत क्षमता उच्च-मूल्य वाले निर्यात और गहरे समुद्र के दोहन में बाधा डाल रहे हैं।
  • शासन और वित्तपोषण: समुद्री क्षेत्र का प्रबंधन कई मंत्रालयों द्वारा किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर नियामक अतिव्यापन होता है।
  • इसके अतिरिक्त, निजी क्षेत्र के निवेश और ब्लू बॉन्ड जैसे नवीन वित्तपोषण साधनों का अभी भी पर्याप्त रूप से उपयोग किया जाना बाकी है।

विभिन्न कदम 

  • प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के माध्यम से भारत के मत्स्य क्षेत्र को बढ़ावा दिया गया है।
  • सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में PMMSY के तहत रिकॉर्ड ₹2,500 करोड़ आवंटित करके क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
  • मछली उत्पादन 2019-20 में 141.64 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में रिकॉर्ड 197.75 लाख टन हो गया।
  • इस क्षेत्र ने अच्छी वृद्धि दर्ज की है। मत्स्य निर्यात 2019-20 में ₹46,663 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹73,890 करोड़ हो गया।
  • इस योजना ने मत्स्य पालन और जलीय कृषि से संबंधित गतिविधियों में 58 लाख व्यक्तियों के लिए रोजगार सृजित किया है।
  • इसने शीत श्रृंखला और विपणन बुनियादी ढाँचे के लिए ₹2,797 करोड़ की मंजूरी भी दी, जिससे कटाई के बाद प्रबंधन और बाजारों तक संपर्क में सुधार हुआ।
  • डीप ओशन मिशन: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) द्वारा 2021 में गहरे समुद्र की जीवित और निर्जीव संपदा की खोज तथा उसके सतत उपयोग के लिए प्रौद्योगिकियाँ विकसित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
  • भारत ने समुद्रयान परियोजना शुरू की है—जो डीप ओशन मिशन के अंतर्गत आती है—जिसका उद्देश्य मानवयुक्त पनडुब्बी के माध्यम से गहरे समुद्र की खोज के इसके पहले घटक पर कार्य करना है।
  • मत्स्य 6000, एक स्व-चालित मानवयुक्त पनडुब्बी है, जो तीन व्यक्तियों को समुद्र की सतह के नीचे 6,000 मीटर तक की गहराई तक ले जाने में सक्षम है। इसे इस परियोजना के तहत विकसित किया जा रहा है।
  • सागरमाला कार्यक्रम: वर्ष 2015 में शुरू किया गया सागरमाला कार्यक्रम भारत की लंबी तटरेखा और अंतर्देशीय जलमार्गों का उपयोग करके देश के समुद्री क्षेत्र को आधुनिक बनाने की एक प्रमुख पहल है।
  • इसका उद्देश्य लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना, बंदरगाह के बुनियादी ढाँचे को उन्नत करना, व्यापार बढ़ाना, रोजगार सृजित करना और बंदरगाह-आधारित विकास के माध्यम से सतत तटीय विकास को बढ़ावा देना है।
  • यह समुद्री अमृत काल विजन 2047 के प्रमुख स्तंभों में से एक है, जिसका उद्देश्य भारत की विश्व-स्तरीय बंदरगाहों, नौवहन और जलमार्गों के विकास की महत्वाकांक्षा को समर्थन देना तथा 2047 तक एक अग्रणी वैश्विक समुद्री शक्ति के रूप में उभरना है।
  • नीली क्रांति: 2015 में शुरू की गई नीली क्रांति का उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाकर, बुनियादी ढाँचे का विस्तार करके और आधुनिक प्रथाओं को बढ़ावा देकर अंतर्देशीय और समुद्री दोनों क्षेत्रों में मछली उत्पादन बढ़ाना तथा मत्स्य क्षेत्र की मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है।

निष्कर्ष

  • भारत की नीली अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास, रोजगार, स्वच्छ ऊर्जा और तटीय लचीलेपन की अपार संभावनाएँ हैं। हालांकि, इस क्षेत्र के सतत विकास के लिए सरकार, उद्योगों और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग के साथ-साथ समुद्री संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता है।
  • इस प्रकार, नीली अर्थव्यवस्था भारत के सतत विकास और भविष्य के आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकती है।

स्रोत: PIB

 

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