भारत के ‘विकसित भारत’ विज़न के लिए नीतिगत स्थिरता

पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन; जीएस-3/अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ 

  • हाल के समय में भारत की विकास रणनीति पर हुई चर्चाओं में इस बात पर बल दिया गया है कि विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दीर्घकालिक घरेलू एवं विदेशी निवेश आकर्षित करने हेतु पूर्वानुमेय कर व्यवस्था, पारदर्शी विनियम तथा कुशल व्यापार सुगमता अत्यंत आवश्यक हैं।

नीतिगत पूर्वानुमेयता (Policy Predictability): यह क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

  • नीतिगत पूर्वानुमेयता ऐसी शासन व्यवस्था है, जिसमें कानून, कर, विनियम तथा प्रशासनिक निर्णय स्पष्ट, सुसंगत, पारदर्शी और स्थिर होते हैं।
  • यह कंपनियों को जोखिमों का सही आकलन करने, दीर्घकालिक निवेश संबंधी निर्णय लेने तथा वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) में एकीकृत होने में सहायता प्रदान करती है।
  • भारत वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनना चाहता है और इसके लिए प्रतिवर्ष 8–9 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि बनाए रखना आवश्यक है।
  • इसका अर्थ होगा कि निवेश दर को GDP के लगभग 30 प्रतिशत से बढ़ाकर लगभग 40 प्रतिशत करना होगा।
  • इसके लिए केवल घरेलू बचत पर्याप्त नहीं होगी। देश को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) आकर्षित करने तथा निर्यात का विस्तार करने की आवश्यकता है।
  • लेकिन निवेशक केवल बाज़ार की संभावनाएँ ही नहीं, बल्कि नीतिगत निश्चितता भी चाहते हैं। अनिश्चितता व्यापार करने की लागत बढ़ाती है और प्रभावी रूप से दीर्घकालिक निवेश को हतोत्साहित करती है।

प्रमुख मुद्दे एवं चुनौतियाँ

1.कर संबंधी अनिश्चितता

  • कर कानूनों की बार-बार होने वाली व्याख्यात्मक भिन्नताएँ तथा विवाद निवेशकों के विश्वास को कमजोर करते हैं।
  • लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे अनिश्चितता बढ़ाते हैं, जैसा कि वोडाफोन के पूर्वव्यापी कर (Retrospective Tax) तथा टाइगर ग्लोबल के पूंजीगत लाभ कर विवादों में देखा गया।
  • विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए भारत में कर दरें (15–24 प्रतिशत) कई प्रतिस्पर्धी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक हैं, जिससे भारत वैश्विक पूंजी के लिए कम आकर्षक बनता है।
  • विवादों के समाधान में लंबा समय लगता है, जिससे पूंजी फँस जाती है, अनुपालन लागत बढ़ती है तथा व्यापार करने की सुगमता प्रभावित होती है।

2. सीमा शुल्क एवं विनियामक अनिश्चितता

  • सीमा शुल्क वर्गीकरण में असंगतियों के कारण विभिन्न प्रकार के विनियामक परिणाम सामने आते हैं।
  • उदाहरण के लिए: वोल्वो (Volvo) तथा विनफास्ट (VinFast) को विद्युत वाहन (EV) घटकों के आयात पर दिए गए असंगत अग्रिम निर्णय यह दर्शाते हैं कि पूर्णतः विखंडित इकाई (CKD), अर्द्ध-विखंडित इकाई (SKD) तथा पूर्ण निर्मित इकाई (CBU) के वर्गीकरण के मानदंडों में एकरूपता का अभाव है।
  • सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथा सुसंगत अग्रिम निर्णयों के अभाव में विनियामक पारदर्शिता प्रभावित होती है।

3. व्यापार सुगमता एवं डिजिटल एकीकरण

  • कुशल व्यापार के लिए अनेक सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय आवश्यक है।
  • वर्तमान में आयातकों को सीमा शुल्क विभाग, विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT), वस्तु एवं सेवा कर (GST), बैंकों तथा सीमा विनियामक एजेंसियों से अलग-अलग कार्य करना पड़ता है।
  • इससे दोहरे दस्तावेज़ीकरण, बार-बार पंजीकरण तथा सीमा शुल्क निकासी में विलंब होता है। कच्चे माल एवं मशीनरी के आयात में देरी से कार्यशील पूंजी (Working Capital) की आवश्यकता बढ़ती है और निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता घटती है। भारत की सीमा शुल्क प्रणाली अभी भी बड़े पैमाने पर भौतिक निरीक्षण पर निर्भर है।

4. जोखिम-आधारित सीमा शुल्क प्रशासन

  • प्रमुख चुनौतियों में माल निकासी में देरी, उच्च लेन-देन लागत, स्कैनिंग एवं परीक्षण अवसंरचना का अभाव तथा जोखिम मूल्यांकन के लिए आँकड़ा विश्लेषण (Data Analytics) का सीमित उपयोग शामिल है।
  • विश्वभर में जोखिम-आधारित निरीक्षण प्रणाली अनुपालन करने वाले व्यापारियों को लाभ पहुँचाती है तथा प्रवर्तन एजेंसियाँ उच्च जोखिम वाले माल पर ध्यान केंद्रित करती हैं।

हाल के प्रयास एवं पहल

सरकार ने नीतिगत पूर्वानुमेयता तथा व्यापार सुगमता के क्षेत्र में अनेक सुधार किए हैं:

  • व्यापार स्वीकृतियों को डिजिटल रूप से सरल बनाने हेतु राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS)।
  • पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सीमा शुल्क में फेसलेस असेसमेंट।
  • विश्वसनीय व्यापारियों के लिए अधिकृत आर्थिक संचालक (AEO) कार्यक्रम का विस्तार।
  • लॉजिस्टिक्स दक्षता बढ़ाने हेतु पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान।
  • बजट में परस्पर जुड़ी डिजिटल स्वीकृति प्रणालियों, एकीकृत सीमा शुल्क प्रणाली, बिना हस्तक्षेप वाली माल स्कैनिंग (Non-Intrusive Cargo Scanning) के अधिक उपयोग तथा अग्रिम निर्णयों की वैधता अवधि बढ़ाने जैसी घोषणाएँ।
  • मेक इन इंडिया, राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति जैसी पहलों के माध्यम से व्यापार करने की सुगमता, डिजिटलीकरण तथा निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता पर बल।
  • ये सभी कदम सरकार के पारदर्शी एवं प्रौद्योगिकी-सक्षम विनियामक पारितंत्र के निर्माण के व्यापक उद्देश्य के अनुरूप हैं।

आगे की राह: नीतिगत स्थिरता का संस्थानीकरण

  • उच्च आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने तथा दीर्घकालिक निवेश आकर्षित करने के लिए भारत को अस्थायी सुधारों से आगे बढ़कर नीतिगत निश्चितता का संस्थानीकरण करना होगा।

प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं:

  • स्थिर एवं पूर्वानुमेय कर नीतियाँ, तथा पूर्वव्यापी अथवा अस्पष्ट व्याख्याओं से बचाव।
  • कर विवादों का शीघ्र समाधान, अपीलीय निकायों में रिक्तियों को भरना तथा प्रशासनिक क्षमता बढ़ाकर कर मुकदमों में कमी लाना।
  • ‘एक बार प्रस्तुत करें (Submit Once)’ सिद्धांत पर आधारित वास्तविक राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली लागू करना, जिससे सीमा शुल्क, DGFT, जीएसटी, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय तथा बैंकों के बीच निर्बाध आँकड़ा साझाकरण संभव हो।
  • CKD, SKD तथा CBU वर्गीकरण पर स्पष्ट मानदंडों सहित बहु-बंदरगाह (Multi-Port) एवं विभाजित खेप (Split Consignments) के लिए विनियामक दिशानिर्देश प्रकाशित करना।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित जोखिम इंजन, आधुनिक स्कैनर तथा बिना हस्तक्षेप वाली निरीक्षण प्रणालियों का उपयोग कर जोखिम-आधारित सीमा शुल्क प्रशासन का विस्तार करना।
  • समय-सीमित अग्रिम निर्णयों को अनिवार्य बनाना तथा निर्णयों के साथ विचलन के कारण भी प्रकाशित करना, ताकि पारदर्शिता बढ़े।
  • विनियामक स्वीकृतियों, आकलनों तथा अपीलों के लिए सेवा मानक एवं सेवा प्रदाय संकेतक (Service Delivery Metrics) प्रकाशित कर जवाबदेही बढ़ाना।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] निवेश आकर्षित करने तथा सतत उच्च आर्थिक वृद्धि प्राप्त करने में नीतिगत पूर्वानुमेयता आर्थिक क्षमता जितनी ही महत्वपूर्ण है। चर्चा कीजिए तथा कर संबंधी अनिश्चितता एवं विनियामक अस्पष्टता से उत्पन्न चुनौतियों का परीक्षण कीजिए।

स्रोत: BS

 

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