पाठ्यक्रम: जीएस-3/कृषि
सन्दर्भ
- हाल ही में, केंद्रीय कृषि मंत्री भारत की बीज आपूर्ति श्रृंखला में नकली बीजों पर रोक लगाने, पता लगाने की क्षमता में सुधार करने और जवाबदेही को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रस्तावित नए बीज अधिनियम पर किसान संगठनों के साथ परामर्श कर रहे हैं।
प्रस्तावित नए बीज अधिनियम का परिचय
- प्रस्तावित कानून का उद्देश्य बीज अधिनियम, 1966 का स्थान लेना तथा बीजों और रोपण सामग्री के लिए एक अधिक सुदृढ़, एकसमान और प्रौद्योगिकी-सक्षम नियामक ढाँचा तैयार करना है।
- वर्तमान कानून लगभग छह दशक पुराना है, जबकि बीज नियंत्रण आदेश 1983 में लागू हुआ था।
- सरकार ने वर्ष 2025 के अंत में मसौदे पर जनता से सुझाव मांगे थे और किसानों तथा किसान संगठनों से लगभग 18,000 सुझाव प्राप्त हुए।
- हाल के परामर्शों के दौरान लगभग 20 किसान संगठनों, जो लगभग सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, ने अपने सुझाव प्रस्तुत किए हैं।
नए अधिनियम की आवश्यकता क्यों थी?
- पुराना नियामक ढाँचा: 1966 के बाद से भारतीय कृषि में बड़े बदलाव हुए हैं, जिनमें तकनीकी प्रगति, निजी बीज बाजारों का विस्तार और नई किस्मों का उद्भव शामिल हैं।
- वर्तमान ढाँचा इन विकासों के लिए अपर्याप्त माना जाता है।
- बड़ा नियामक अंतर: कृषि मंत्री के अनुसार, वर्तमान में लगभग 70% बीज मौजूदा बीज अधिनियम के दायरे से बाहर हैं, जिससे प्रभावी गुणवत्ता नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
- नकली एवं निम्न-गुणवत्ता वाले बीज: नकली और निम्न-गुणवत्ता वाले बीजों की बिक्री से फसल खराब हो सकती है, किसानों की आय का नुकसान हो सकता है और वे कर्ज के बोझ में आ सकते हैं।
- मौजूदा दंड और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्थाओं को अपर्याप्त माना गया है।
- एकरूपता का अभाव: बीज से संबंधित प्रक्रियाएँ विभिन्न राज्यों में अलग-अलग हैं, जिससे नियामक असंगतियाँ पैदा होती हैं और एकसमान मानकों को सुनिश्चित करने में कठिनाई होती है।
प्रस्तावित बीज अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ
- राष्ट्रीय पंजीकरण एवं क्यूआर-आधारित पता लगाने की क्षमता: सभी बीजों और रोपण सामग्री का राष्ट्रीय रजिस्टर में पंजीकरण आवश्यक होगा।
- अपंजीकृत बीजों की बिक्री प्रतिबंधित होगी।
- प्रत्येक बीज पैकेट पर एक क्यूआर कोड होगा, जिससे किसान उसके स्रोत, निर्माता, प्रयोगशाला से मिली स्वीकृति और आपूर्ति श्रृंखला में उसकी आवाजाही का पता लगा सकेंगे।
- किसानों के पारंपरिक बीज अधिकारों का संरक्षण: किसानों को पारंपरिक और किसान किस्मों का उपयोग, आदान-प्रदान और बिक्री करने का अधिकार जारी रहेगा।
- पारंपरिक बीजों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं होगा, हालांकि किसान स्वेच्छा से अपनी किस्मों का पंजीकरण करा सकेंगे।
- व्यक्तिगत उपयोग, ग्राम-स्तरीय वितरण या किसी कंपनी के लिए बीज का उत्पादन करने वाले किसानों को प्रस्तावित प्रावधानों के तहत डिजिटल पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होगी।
- कठोर दंड: उल्लंघनों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा:
- मामूली उल्लंघन: पहली बार अपराध पर चेतावनी; दूसरी बार अपराध पर ₹50,000 तक का दंड;
- जानबूझकर किए गए उल्लंघन: जैसे क्यूआर कोड लगाने में विफलता, गलत ब्रांडिंग या आवश्यक जानकारी का खुलासा न करना; पहली बार ₹1 लाख; दूसरी बार अपराध पर ₹2 लाख का दंड;
- गंभीर अपराध: जिसमें नकली बीज, बिना पंजीकरण के संचालन और जानबूझकर की गई धोखाधड़ी शामिल हैं; ₹30 लाख तक का दंड और कारावास।
- राज्यों की अधिक महत्वपूर्ण भूमिका: राज्य सरकारों को राज्य-स्तरीय समितियों की सिफारिशों के आधार पर नई किस्मों को जारी करने का अधिकार दिया जाएगा, जबकि राष्ट्रीय मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा।
- सभी किस्मों का रखरखाव एकल राष्ट्रीय ऑनलाइन रजिस्टर में किया जाएगा, जो केंद्र और राज्यों दोनों के लिए सुलभ होगा।
- बीज सुरक्षा कोष एवं मुआवजा: प्रत्येक राज्य एक बीज सुरक्षा कोष स्थापित करेगा, जिसमें अधिनियम के तहत लगाए गए दंड और वसूल की गई राशि जमा की जाएगी।
- सत्यापित बीज विफलता और उसके परिणामस्वरूप किसानों को हुए नुकसान के मामले में, एक सत्यापन समिति 15 दिनों के भीतर मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया को सुगम बनाएगी।
- किसानों को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग करने का अधिकार भी बना रहेगा।
संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ
- अत्यधिक विनियमन: अनिवार्य पंजीकरण और डिजिटल रूप से पता लगाने की व्यवस्था से अनुपालन लागत बढ़ सकती है, विशेष रूप से छोटे बीज उत्पादकों के लिए।
- डिजिटल विभाजन: क्यूआर-आधारित प्रणालियों को सीमित डिजिटल साक्षरता और कनेक्टिविटी वाले किसानों के लिए भी सुलभ बनाए रखना आवश्यक है।
- केंद्र–राज्य समन्वय: एकसमान राष्ट्रीय मानकों का संतुलन राज्य-विशिष्ट कृषि-जलवायु संबंधी आवश्यकताओं के साथ बनाए रखना होगा।
- किसानों के अधिकार: विनियमन से पारंपरिक बीज संरक्षण, आदान-प्रदान और सामुदायिक बीज प्रणालियाँ अनजाने में प्रतिबंधित नहीं होनी चाहिए।
- कार्यान्वयन क्षमता: कानून को व्यवहार में प्रभावी बनाने के लिए प्रभावी बीज परीक्षण, प्रयोगशालाएँ, निरीक्षण और शिकायत निवारण आवश्यक हैं।
आगे की राह
- प्रस्तावित अधिनियम में किसान-केंद्रित, जोखिम-आधारित नियामक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। व्यापक हितधारक परामर्श, पारदर्शी परीक्षण मानक, पर्याप्त प्रयोगशाला क्षमता और सरल डिजिटल प्रणालियाँ आवश्यक हैं।
- मुआवजा तंत्र वास्तव में समयबद्ध होना चाहिए, जबकि पारंपरिक बीज प्रणालियों और किसानों के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
स्रोत: DD News
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संक्षिप्त समाचार 10-09-2026