भारत के अदृश्य शहरीकरण से संबंधित अंतराल का समापन

पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • हाल की पहलों, जैसे ‘नगर आर्थिक क्षेत्र’ (केंद्रीय बजट 2025–26 में घोषित) तथा 16वें वित्त आयोग द्वारा ग्रामीण से शहरी संक्रमण को सुगम बनाने के लिए शहरीकरण प्रीमियम अनुदान की शुरुआत ने भारत में वास्तविकता की तुलना में कम आंके गए शहरीकरण तथा बेहतर शहरी शासन व्यवस्था की आवश्यकता पर पुनः विमर्श को गति प्रदान की है।

भारत में शहरीकरण

  • जनगणना (2011) के अनुसार, भारत की 31.16% जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में निवास करती थी, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग दो-तिहाई का योगदान देती थी।
  • नीति आयोग की रिपोर्टों तथा सरकार के अनुमानों के अनुसार, आगामी दशकों में शहरीकरण की गति और अधिक तीव्र होने की संभावना है तथा शहर आर्थिक विकास, नवाचार एवं रोजगार के प्रमुख प्रेरक के रूप में उभरेंगे।
  • भारत में शहरीकरण निम्नलिखित प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है—
    • शहरों की प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि।
    • ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर जनसंख्या का प्रवासन।
    • विद्यमान शहरों का आसपास के गाँवों तक विस्तार।
    • ग्रामीण अधिवासों का पुनर्वर्गीकरण कर उन्हें शहरी क्षेत्र घोषित करना।
  • हालाँकि, आधिकारिक आँकड़े प्रायः अंतिम दो प्रक्रियाओं को समुचित रूप से प्रतिबिंबित नहीं कर पाते हैं।

भारत का अदृश्य शहरीकरण

  • भारत के आधिकारिक शहरी आँकड़े मुख्यतः प्रशासनिक परिभाषाओं पर आधारित हैं। कोई अधिवास तभी शहरी मानी जाती है, जब—
    • राज्य सरकार द्वारा उसे वैधानिक नगर के रूप में अधिसूचित किया गया हो, या
    • जनसंख्या, जनसंख्या घनत्व तथा गैर-कृषि रोजगार के आधार पर उसे जनगणना नगर के रूप में वर्गीकृत किया गया हो।
    • यह प्रक्रिया सामान्यतः धीमी होती है, जबकि अर्थव्यवस्था कहीं अधिक तीव्र गति से विकसित होती है।
    • प्रशासनिक नगर और आर्थिक नगर के बीच विद्यमान व्यापक अंतर के कारण भारत की वास्तविक शहरी जनसंख्या का कम आकलन होता है।

भारत में वैधानिक नगर एवं जनगणना नगर

  • वैधानिक नगर : वैधानिक नगर वह अधिवास है जिसे राज्य सरकार किसी विधि के अंतर्गत शहरी क्षेत्र के रूप में घोषित करती है।
    • इसके प्रशासन का दायित्व किसी नगर निगम, नगरपालिका, छावनी परिषद अथवा अधिसूचित क्षेत्र समिति जैसे शहरी स्थानीय निकाय के पास होता है।
    • इसका शहरी दर्जा जनसंख्या अथवा अन्य जनसांख्यिकीय मानदंडों के बजाय विधिक अथवा प्रशासनिक अधिसूचना के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
  • जनगणना नगर: जनगणना नगर वह अधिवास है जिसे केवल सांख्यिकीय उद्देश्यों के लिए भारत की जनगणना द्वारा नगर के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, किंतु जब तक राज्य सरकार उसे वैधानिक नगर घोषित नहीं करती, तब तक उसका प्रशासन ग्राम पंचायत के अधीन ही रहता है।
    • यद्यपि ऐसे क्षेत्र वास्तविक रूप से शहरी स्वरूप धारण कर चुके होते हैं, फिर भी उनका प्रशासन ग्रामीण क्षेत्रों की भाँति किया जाता है, जिससे शासन तथा आधारभूत संरचना के विकास से संबंधित अनेक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
    • किसी अधिवास को जनगणना नगर तभी माना जाता है, जब वह निम्नलिखित तीनों शर्तों को पूरा करती हो—
      • जनसंख्या : 5,000 से अधिक।
      • जनसंख्या घनत्व : न्यूनतम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर।
      • आर्थिक गतिविधि : पुरुष मुख्य कार्यशील जनसंख्या का कम-से-कम 75 प्रतिशत गैर-कृषि गतिविधियों में संलग्न हो।

अदृश्य शहरीकरण के प्रमुख कारण

  • विस्तारित हो रही अधिवासों के प्रशासनिक पुनर्वर्गीकरण में विलंब।
  • 2021 की जनगणना में विलंब, जिसके कारण शहरों के आँकड़े पुराने बने हुए हैं।
  • परि-शहरी क्षेत्रों का तीव्र विस्तार, जहाँ गाँव धीरे-धीरे शहरी अर्थव्यवस्था का स्वरूप ग्रहण कर रहे हैं।
  • प्रशासनिक परिवर्तन, जो कृषि से विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र आधारित अर्थव्यवस्था में हो रहे वास्तविक आर्थिक परिवर्तन के अनुरूप नहीं हैं।
  • जनगणना की पारंपरिक परिभाषाओं पर अत्यधिक निर्भरता, जो कार्यात्मक शहरी क्षेत्रों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं।

भारत के शहरीकरण से संबंधित प्रमुख समस्याएँ एवं चिंताएँ

  • आँकड़ों का अंतराल: वास्तविक शहरी जनसंख्या आधिकारिक आँकड़ों में परिलक्षित नहीं होती, जिससे साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण प्रभावित होता है।
  • खंडित शहरी शासन: शहरी श्रम बाजार, उद्योग, आवास तथा परिवहन नेटवर्क अनेक स्थानीय निकायों तक विस्तृत होते हैं, किंतु शासन व्यवस्था अभी भी खंडित बनी हुई है। आर्थिक नगरों का विस्तार प्रायः नगरपालिकाओं की प्रशासनिक सीमाओं से परे तक होता है।
    • उपग्रह चित्रों से स्पष्ट होता है कि केरल का कोझिकोड नगर अपनी नगरपालिका सीमा से आगे तक विस्तारित हो चुका है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश का इंदौर–पीथमपुर–डॉ. अंबेडकर नगर क्षेत्र अनेक नगरों एवं गाँवों को समाहित करते हुए एक एकीकृत आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित हो चुका है।
  • कमज़ोर शहरी शासन व्यवस्था: अनेक जनगणना नगर शहरी विशेषताओं से युक्त होने के बावजूद अभी भी ग्राम पंचायतों द्वारा प्रशासित हैं। इसके परिणामस्वरूप नगरपालिकीय सेवाओं का प्रभावी एवं गुणवत्तापूर्ण वितरण नहीं हो पाता।
  • आधारभूत संरचना का अभाव: परि-शहरी क्षेत्रों में प्रायः पेयजल आपूर्ति, सीवरेज व्यवस्था, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन तथा सड़क प्रकाश जैसी मूलभूत नागरिक सुविधाओं का अभाव रहता है।
  • वित्तीय असंतुलन: शहरी स्थानीय निकायों की बढ़ती जिम्मेदारियों के अनुरूप उन्हें पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाते। परिणामस्वरूप, बढ़ती शहरी जनसंख्या का प्रभावी प्रबंधन करने की उनकी क्षमता सीमित बनी रहती है।

उभरती हुई शहरी वास्तविकता की नीतिगत मान्यता

  • केंद्रीय बजट 2025–26: केंद्रीय बजट 2025–26 में नगर आर्थिक क्षेत्रों पर विशेष बल दिया गया तथा समूहित शहरी अर्थव्यवस्थाओं को आर्थिक विकास के प्रमुख प्रेरक के रूप में मान्यता प्रदान की गई।
  • 16वाँ वित्त आयोग: 16वें वित्त आयोग ने बढ़ते शहरीकरण को ध्यान में रखते हुए शहरी स्थानीय निकायों के लिए स्थानीय सरकारों को दिए जाने वाले अनुदानों की हिस्सेदारी 15वें वित्त आयोग के 36 प्रतिशत से बढ़ाकर 45 प्रतिशत करने की अनुशंसा की है। उल्लेखनीय है कि 10वें वित्त आयोग के समय यह हिस्सेदारी केवल 19 प्रतिशत थी।
  • 10,000 करोड़ रुपये का शहरीकरण प्रीमियम अनुदान: इस अनुदान का उद्देश्य—
    • परि-शहरी गाँवों को शहरी स्थानीय निकायों में सम्मिलित करने को प्रोत्साहित करना।
    • ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित संक्रमण के लिए नीति विकसित करना।
    • बेहतर वित्तीय सहायता तथा नगरपालिका सुधारों के माध्यम से सुगम शहरी संक्रमण की दिशा में यह प्रयास ओडिशा जैसे राज्यों की पहलों तथा महाराष्ट्र राज्य वित्त आयोग की अनुशंसाओं में भी परिलक्षित होता है।

आगे की राह : बेहतर शहरी शासन के लिए

  • जनगणना नगरों को वैधानिक नगरों में परिवर्तन: प्रत्येक जनगणना के बाद पात्र जनगणना नगरों को स्वतः वैधानिक नगरपालिकाओं में परिवर्तित करने हेतु समयबद्ध प्रशासनिक तंत्र स्थापित किया जाए।
    • राज्यों के नगरपालिका संबंधी कानूनों में ऐसे प्रावधान किए जाएँ, जिससे प्रशासनिक विवेकाधिकार के कारण होने वाले अनावश्यक विलंब पर अंकुश लगाया जा सके।
  • ग्रामीण से शहरी संक्रमण हेतु वित्तीय सहायता: अमृत (AMRUT) योजना की तर्ज पर परि-शहरी क्षेत्रों के लिए एक समर्पित केंद्रीय अथवा राज्य स्तरीय कोष की स्थापना की जाए।
    • आधारभूत संरचना के विकास तथा शहरी शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए वित्तीय सहायता को शहरी स्थानीय निकायों की स्थापना से जोड़ा जाए।
  • नगर-क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का आकलन विकसित करना: नगरों की प्रशासनिक सीमाओं से परे स्थित कार्यात्मक शहरी क्षेत्रों के आर्थिक उत्पादन का भी आकलन किया जाए।
    • वस्तु एवं सेवा कर (GST) के आँकड़ों, वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण (ASI), आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS), असंगठित क्षेत्र उद्यमों के वार्षिक सर्वेक्षण (ASUSE) तथा उपग्रह चित्रों का समन्वित उपयोग करते हुए कार्यात्मक नगर-क्षेत्रों के सकल घरेलू उत्पाद का अनुमान लगाया जाए।
    • कार्यप्रणाली के मानकीकरण के लिए प्रमुख महानगरीय क्षेत्रों में प्रायोगिक परियोजनाएँ (पायलट परियोजनाएँ) संचालित की जाएँ।

निष्कर्ष

  • भारत में शहरी परिवर्तन की प्रक्रिया आधिकारिक आँकड़ों से कहीं अधिक तीव्र गति से आगे बढ़ रही है।
  • प्रशासनिक सीमाओं और कार्यात्मक आर्थिक क्षेत्रों के बीच बढ़ता असंतुलन नियोजन, आधारभूत संरचना, वित्तीय अंतरण तथा शहरी शासन के लिए गंभीर नीतिगत चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहा है।
  • जनगणना नगरों को समयबद्ध रूप से वैधानिक नगरों में परिवर्तित करना, परि-शहरी क्षेत्रों के संक्रमण हेतु लक्षित सहायता प्रदान करना तथा नगर-क्षेत्र आधारित सकल घरेलू उत्पाद का सुदृढ़ आकलन विकसित करना इस अंतर को कम करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
  • सतत, समावेशी तथा साक्ष्य-आधारित शहरी विकास सुनिश्चित करने के लिए भारत के वास्तविक शहरीकरण का समुचित मापन तथा औपचारिक मान्यता अत्यंत आवश्यक है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत का शहरीकरण प्रशासनिक परिभाषाओं के कारण, वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों की अपेक्षा, अत्यंत सीमा तक कम आंका गया है। इस कथन की विवेचना कीजिए तथा शहरी शासन एवं नियोजन में सुधार के लिए आवश्यक संस्थागत सुधारों का सुझाव दीजिए।

स्रोत: LM

 

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