पाठ्यक्रम: जीएस-3/ अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- भारत ने वर्ष 2024 में 20 लाख से अधिक विद्युत वाहनों (EV) की बिक्री की, जो पिछले वर्ष की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि मुख्यतः फेम (FAME)-I/II, पीएम ई-ड्राइव(PM E-DRIVE) तथा ऑटोमोबाइल उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना से प्रेरित है।
- साथ ही, भारत ने वर्ष 2030 तक 30 प्रतिशत ईवी प्रवेश (EV Penetration) का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिससे ₹25.05 लाख करोड़ (300 अरब अमेरिकी डॉलर) मूल्य का बैटरी बाज़ार विकसित होने की संभावना है।
- हालाँकि, यह परिवर्तन लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और ग्रेफाइट जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों पर आधारित है, जिनके लिए भारत लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर है, विशेषकर चीन पर।
- इससे भारत की स्वच्छ गतिशीलता संबंधी महत्वाकांक्षाएँ भू-राजनीतिक तथा आपूर्ति श्रृंखला संबंधी जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं।
खनिज माँग का परिमाण(Scale)
- बढ़ती बैटरी माँग: भारत का लिथियम-आयन बैटरी बाज़ार वर्ष 2022 के 10.8 गीगावाट-घंटे (GWh) से बढ़कर वर्ष 2030 तक 160.3 गीगावाट-घंटे (GWh) होने का अनुमान है।
- नीति आयोग के अनुसार, प्रतिवर्ष 100 GWh बैटरियों के उत्पादन के लिए भारत को लगभग 1,93,000 टन कैथोड सक्रिय पदार्थ (Cathode Active Material) तथा 98,000 टन एनोड सक्रिय पदार्थ (Anode Active Material) की आवश्यकता होगी, साथ ही ताँबा, लिथियम और एल्युमिनियम की भी आवश्यकता होगी।
- संरचनात्मक निर्भरता: फरवरी 2026 में नीति आयोग के आकलन के अनुसार, नेट-ज़ीरो परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण खनिजों की माँग वर्तमान नीतिगत परिदृश्य की तुलना में 51 प्रतिशत अधिक होगी। इससे स्पष्ट है कि जैसे-जैसे भारत विस्तार करेगा, निर्भरता कम होने के बजाय और बढ़ेगी।
- महत्त्वपूर्ण खनिज आयात बिल: भारत का महत्त्वपूर्ण खनिज आयात बिल वर्ष 2020-21 के 3.03 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 8.01 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया है, जिससे व्यापार असंतुलन और बढ़ेगा।
चीन कारक
- आयात निर्भरता: लिथियम, कोबाल्ट और निकेल के लिए भारत 100 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त, भारत अपनी ताँबे की आवश्यकता का 90 प्रतिशत से अधिक तथा प्राकृतिक ग्रेफाइट का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है।
- भारत के लिथियम आयात का 80 प्रतिशत से अधिक चीन से आता है, तथा कोबाल्ट, निकेल और ग्रेफाइट के प्रसंस्करण में भी चीन का प्रभुत्व है।
- वैश्विक प्रसंस्करण पर नियंत्रण: वर्तमान में चीन वैश्विक दुर्लभ मृदा (Rare Earth) प्रसंस्करण का लगभग 90 प्रतिशत, निकेल परिशोधन का 68 प्रतिशत, लिथियम रासायनिक प्रसंस्करण का 65 प्रतिशत तथा कोबाल्ट परिशोधन का 74 प्रतिशत नियंत्रित करता है। अन्य देशों में खनन किए गए खनिजों का भी प्रसंस्करण प्रायः चीन में ही करना पड़ता है, अर्थात केवल विदेशों में खनन पर्याप्त नहीं है, जब तक परिशोधन सुविधाओं तक समानांतर पहुँच न हो।
- आपूर्ति श्रृंखला के हथियार बनने का जोखिम: भू-राजनीतिक दबाव के लिए आपूर्ति श्रृंखला का उपयोग कोई नई बात नहीं है, जैसा कि वर्ष 2010 में जापान पर दुर्लभ मृदा निर्यात प्रतिबंध से स्पष्ट हुआ था।
- ऊर्ध्वाधर एकीकरण का लाभ: चीन ने केवल खनन ही नहीं, बल्कि खनिज निष्कर्षण से लेकर बैटरी सेल निर्माण और पुनर्चक्रण तक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया है। साथ ही, उसने कांगो, इंडोनेशिया, अर्जेंटीना और पेरू जैसे खनिज-समृद्ध देशों में बड़े निवेश करके आपूर्ति श्रृंखला के प्रारम्भिक चरणों पर भी अपना नियंत्रण स्थापित किया है।
घरेलू बाधाएँ
- भूवैज्ञानिक सीमाएँ: यद्यपि भारत के पास मैंगनीज़, लौह, एल्युमिनियम तथा ताँबे के प्रचुर संसाधन और स्थापित खनन अवसंरचना है, किन्तु लिथियम के केवल अनुमानित संसाधन (जम्मू-कश्मीर में 59 लाख टन) उपलब्ध हैं तथा कोबाल्ट, निकेल और बैटरी-ग्रेड ग्रेफाइट के भंडार नगण्य हैं।
- प्रसंस्करण अंतराल: भारत में लिथियम परिशोधन की पर्याप्त क्षमता नहीं है, यद्यपि 1,000 टन प्रतिवर्ष क्षमता वाली एक बैटरी-ग्रेड लिथियम रिफाइनरी ने कार्य प्रारम्भ कर दिया है। कैथोड और एनोड सामग्री का उत्पादन अभी भी प्रायोगिक (Pilot) स्तर पर है।
- नियामकीय बाधाएँ: ऐतिहासिक रूप से अन्वेषण पर सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसियों का प्रभुत्व रहा है तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित रही है।
- अनेक परस्पर आच्छादित स्वीकृतियाँ, पर्यावरणीय एवं तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) संबंधी प्रतिबंध, दुर्लभ मृदा युक्त मोनाज़ाइट रेत पर नियंत्रण तथा रणनीतिक खनिजों में निजी क्षेत्र के सीमित प्रवेश के कारण परियोजनाओं का विकास धीमा रहता है।
- वित्तपोषण की कठिनाई: मध्यवर्ती प्रसंस्करण (Midstream Refining) तथा पुनर्चक्रण के लिए प्रारम्भिक स्तर पर भारी पूँजी निवेश, लंबी परियोजना अवधि तथा वस्तु कीमतों में अस्थिरता के कारण निजी निवेशक तब तक निवेश करने से हिचकते हैं, जब तक व्यावसायिक व्यवहार्यता सिद्ध न हो जाए।
सरकारी पहलें
- माँग एवं अवसंरचना: फेम (FAME) नीतियों तथा हाल ही में ₹10,900 करोड़ के परिव्यय वाली पीएम-ई-ड्राइव (PM E-DRIVE) पहल के माध्यम से विद्युत बसों, दोपहिया वाहनों तथा चार्जिंग अवसंरचना का तीव्र विस्तार किया जा रहा है।
- राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM): यह ₹34,300 करोड़ (4.1 अरब अमेरिकी डॉलर) की पहल है, जिसका उद्देश्य 30 महत्त्वपूर्ण खनिजों (जिनमें लिथियम, कोबाल्ट तथा दुर्लभ मृदा तत्व शामिल हैं) में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना है।
- वित्तीय वर्ष 2024-25 से 2030-31 तक संचालित यह मिशन घरेलू अन्वेषण, विदेशों में खनिज परिसंपत्तियों का अधिग्रहण, खनिज पुनर्चक्रण तथा स्वच्छ ऊर्जा एवं रक्षा हेतु प्रौद्योगिकी विकास पर केंद्रित है।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI): ऑटोमोबाइल एवं ऑटो कंपोनेंट उद्योग के लिए ₹25,938 करोड़ की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना उन्नत ऑटोमोटिव प्रौद्योगिकी (AAT) की दिशा में भारत के परिवर्तन की प्रमुख सरकारी पहल है।
- यह शून्य-उत्सर्जन वाहनों (ईवी, हाइड्रोजन ईंधन सेल) तथा उनके महत्त्वपूर्ण घटकों का निर्माण करने वाली कंपनियों को बिक्री मूल्य का 8 प्रतिशत से 18 प्रतिशत तक वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है।
- अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियाँ: भारत ने अर्जेंटीना के साथ लिथियम अन्वेषण समझौते तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ महत्त्वपूर्ण खनिज सहयोग समझौते किए हैं। साथ ही, भारत मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप, क्वाड क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज़ वर्किंग ग्रुप और इंडिया-ईयू ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल में भी भागीदारी कर रहा है।
आगे की राह
- चार-स्तंभीय रणनीतिक ढाँचा: अपनी कमजोरियों को कम करने के लिए भारत को चीन पर निर्भरता घटाते हुए आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने हेतु बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी।

माल तक पहुँच सुनिश्चित करना:
घरेलू अन्वेषण:
- पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रियाओं को सरल एवं सुव्यवस्थित बनाया जाए तथा घरेलू खनिज अन्वेषण में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए जोखिम-साझाकरण (Risk-sharing) आधारित प्रोत्साहन प्रदान किए जाएँ।
वैश्विक अधिग्रहण:
- अर्जेंटीना के साथ हालिया लिथियम साझेदारियों तथा ऑस्ट्रेलिया में निवेश के आधार पर राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM) के दायरे का विस्तार करते हुए विदेशों में खनिज ब्लॉकों का अधिग्रहण किया जाए।
घरेलू औद्योगिक एवं प्रौद्योगिकीय क्षमता का निर्माण:
मध्यवर्ती प्रसंस्करण केंद्र :
- गैर-चीनी प्रौद्योगिकी प्रदाताओं (जैसे जापान, दक्षिण कोरिया तथा यूरोपीय संघ) के साथ साझेदारी कर देश में उन्नत धातु गलन (Smelting) एवं परिशोधन (Refining) केंद्र स्थापित किए जाएँ।
वैकल्पिक बैटरी रसायन:
- अनुदान तथा कर प्रोत्साहनों के माध्यम से घरेलू अनुसंधान एवं विकास (R&D) को तेज़ किया जाए, ताकि सोडियम-आयन तथा ठोस-अवस्था जैसी वैकल्पिक बैटरियाँ विकसित की जा सकें, जो आसानी से उपलब्ध कच्चे माल पर आधारित हों।
शहरी खनन :
- अनिवार्य विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के माध्यम से एक सुदृढ़ पुनर्चक्रण तंत्र विकसित किया जाए, जिससे उपयोग से बाहर हो चुकी ईवी बैटरियों से द्वितीयक लिथियम, कोबाल्ट तथा निकेल का पुनः निष्कर्षण किया जा सके।
सहायक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण:
मिश्रित वित्त :
- दीर्घकालिक निजी निवेश के जोखिम को कम करने हेतु नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स फंड की स्थापना की जाए, जिसके माध्यम से मिश्रित वित्त, व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) तथा राजनीतिक जोखिम बीमा उपलब्ध कराया जाए।
सार्वजनिक खरीद :
- सार्वजनिक क्षेत्र के वाहन बेड़ों में स्थानीय स्रोतों से खरीद की न्यूनतम सीमा अनिवार्य की जाए, ताकि स्थानीय मूल्य श्रृंखलाओं के विकास के लिए मज़बूत माँग उत्पन्न हो।
पर्यावरण, सामाजिक एवं सुशासन (ESG) तथा अनुरेखण (Traceability):
- वैश्विक गैर-चीनी आपूर्तिकर्ताओं के साथ विश्वास निर्माण हेतु डिजिटल अनुरेखण (जैसे ब्लॉकचेन) तथा कठोर पर्यावरण, सामाजिक एवं सुशासन (ESG) प्रमाणन मानकों को लागू किया जाए।
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का लाभ उठाना:
बहुपक्षीय गठबंधन:
- अमेरिका के नेतृत्व वाली मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप(MSP), क्वाड क्रिटिकल एण्ड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज़ वर्किंग ग्रुप्स तथा इंडिया-ईयू ट्रेड एण्ड टेक्नोलॉजी काउंसिल के साथ सहयोग को और गहरा किया जाए।
क्षेत्रीय ढाँचे :
- ऑस्ट्रेलिया, जापान तथा दक्षिण कोरिया के साथ मिलकर हिन्द-प्रशांत क्रिटिकल मिनरल साझेदारी का गठन किया जाए, ताकि खनिज अन्वेषण तथा प्रौद्योगिकी साझाकरण में समन्वय स्थापित किया जा सके।
निष्कर्ष
- भारत का परिवहन क्षेत्र का ऊर्जा संक्रमण केवल एक तकनीकी उन्नयन नहीं है, बल्कि यह भू-राजनीतिक रणनीति (Geopolitical Statecraft) का भी एक महत्त्वपूर्ण अभ्यास है।
- इस दशक में खनन विनियमों, चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) संबंधी नीतियों तथा खनिज कूटनीति के संबंध में लिए गए निर्णय यह निर्धारित करेंगे कि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की आर्थिक सुदृढ़ता (Resilience) तथा रणनीतिक स्वायत्तता कितनी मज़बूत होगी।
स्रोत: ORF
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