भारत में किशोर कुपोषण से निपटना

पाठ्यक्रम: जीएस-2/ स्वास्थ्य से संबंधित विषय; भूख से संबंधित विषय

सन्दर्भ 

  • हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 NFHS-6 (2023–24) के निष्कर्षों ने भारत में बढ़ते मोटापे और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को रेखांकित किया है तथा विद्यालय-आधारित हस्तक्षेपों के माध्यम से किशोर पोषण पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता का संकेत दिया है।

भारत में किशोरों में कुपोषण

  • भारत वर्तमान में कुपोषण के दोहरे बोझ की स्थिति का सामना कर रहा है, जहाँ एक ओर दीर्घकालिक अल्पपोषण है, वहीं दूसरी ओर अधिक वजन और मोटापे की तीव्र बढ़ती व्यापकता भी साथ-साथ मौजूद है।
  • किशोरावस्था की अवधि 10 से 19 वर्ष की आयु तक होती है।

प्रमुख तथ्य एवं प्रमाण

NFHS-6 (2023-24) के अनुसार:

  • महिलाओं (15–49 वर्ष आयु वर्ग) में मोटापे का प्रतिशत 24% से बढ़कर 30.7% हो गया है।
  • पुरुषों में मोटापे का प्रतिशत 22.9% से बढ़कर 27.3% हो गया है।
  • उच्च रक्त शर्करा की समस्या पुरुषों में 15.6% से बढ़कर 20.9% तथा महिलाओं में 13.5% से बढ़कर 17.8% हो गई है।

समग्र राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (2019) के अनुसार:

  • भारत के लगभग 27.4% किशोर अवरुद्ध वृद्धि (स्टंटिंग) से प्रभावित हैं।
  • किशोरियों में रक्ताल्पता अब भी बड़ी संख्या में बनी हुई है।
  • भारत में ‘दुबले-किन्तु-वसायुक्त’ (थिन-फैट) परिघटना में वृद्धि देखी जा रही है, अर्थात् बच्चे देखने में दुबले होते हैं, किन्तु उनके शरीर में अतिरिक्त वसा होती है, जिससे वे मधुमेह तथा हृदय एवं रक्तवाहिका संबंधी विकारों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
  •  द लैंसेट (2025) के अनुसार, 2050 तक भारत में लगभग 21.8 करोड़ पुरुष और 23.1 करोड़ महिलाएँ अधिक वजन की श्रेणी में हो सकती हैं, जिनमें 15–24 वर्ष आयु वर्ग में सर्वाधिक वृद्धि होने का अनुमान है।

भारत में किशोर कुपोषण के प्रमुख कारण

पोषण संबंधी संक्रमण एवं असंतुलित आहार

  • पारंपरिक आहारों के स्थान पर अधिक ऊर्जा वाले, किन्तु पोषण की दृष्टि से अपर्याप्त आहार अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
  • अनाजों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्त्वों तथा सुरक्षात्मक खाद्य पदार्थों की कमी हो जाती है।
  • भारतीयों के लिए आहार संबंधी दिशानिर्देश, 2024 के अनुसार भोजन की थाली का आधा भाग फल एवं सब्जियों से भरा होना चाहिए, किन्तु इनका सेवन अभी भी अनुशंसित स्तर से काफी कम है।
  • उदाहरण: विद्यालयों में किए गए अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि किशोरों द्वारा दुग्ध उत्पादों एवं फलों का सेवन बहुत कम किया जाता है।

शर्करा एवं अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत

  • अधिक वसा, अधिक शर्करा एवं अधिक नमक वाले खाद्य पदार्थों की उपलब्धता तथा उनका आक्रामक विपणन बच्चों की खान-पान संबंधी पसंद को बदल रहा है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार भारत में अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की खपत प्रति वर्ष 13% से अधिक की दर से बढ़ रही है।
  • शर्करा युक्त पेय, पैकेटबंद अल्पाहार तथा तुरंत तैयार होने वाले खाद्य पदार्थ पारंपरिक आहारों का स्थान ले रहे हैं।
  • उदाहरण: विद्यालयी छात्रों द्वारा शीतल पेयों के नियमित सेवन से मोटापा एवं उपापचयी विकारों में वृद्धि हुई है।

शारीरिक निष्क्रियता एवं गतिहीन जीवनशैली

  • शारीरिक निष्क्रियता असंचारी रोगों के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक बन गई है।
  • पर्दे के सामने बिताए जाने वाले समय तथा ऑनलाइन मनोरंजन में वृद्धि के कारण ऊर्जा व्यय बहुत कम हो गया है।
  • शहरी जीवनशैली की आदतें अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैल रही हैं।
  • उदाहरण: अनुसंधानों में पाया गया है कि पर्दे के अधिक उपयोग का फल एवं सब्जियों के सेवन से विपरीत संबंध है, जिससे जोखिम बढ़ जाता है।

पोषण संबंधी साक्षरता का अभाव

  • अनेक किशोर खाद्य लेबल पढ़ने, भोजन की मात्रा का आकलन करने तथा भ्रामक विज्ञापनों की पहचान करने जैसे कौशल नहीं रखते।
  • विद्यालयों में संचालित पोषण शिक्षा कार्यक्रम व्यवहारिक होने के बजाय अधिकतर सैद्धांतिक बने हुए हैं।
  • खाद्य पदार्थों का आक्रामक विपणन भी अस्वास्थ्यकर खान-पान की आदतों को बढ़ावा देता है।

सामाजिक-आर्थिक एवं लैंगिक मुद्दे

  • गरीबी, खाद्य असुरक्षा तथा लैंगिक असमानता किशोरों की पोषण स्थिति को प्रभावित करती है।
  • किशोरियों द्वारा अपर्याप्त आहार ग्रहण करने से रक्ताल्पता तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुपोषण की समस्या उत्पन्न होती है।
  • अल्पायु विवाह तथा शीघ्र गर्भधारण कुपोषण की समस्या को और बढ़ा देते हैं।

भारत में संबंधित पहलें

  • प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना (मध्याह्न भोजन योजना): इसके अंतर्गत विद्यालयी बच्चों को पौष्टिक पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इसका उद्देश्य बेहतर नामांकन, उपस्थिति तथा पोषण संबंधी परिणाम सुनिश्चित करना है।
  • पोषण अभियान (2018): विभिन्न मंत्रालयों के समन्वय के माध्यम से अवरुद्ध वृद्धि, अल्पपोषण, रक्ताल्पता तथा कम जन्म भार की व्यापकता को कम करना इसका उद्देश्य है।
  • रक्ताल्पता मुक्त भारत: इसका उद्देश्य लौह-फोलिक अम्ल अनुपूरण तथा व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से बच्चों, किशोरों एवं महिलाओं में रक्ताल्पता को कम करना है।
  • विद्यालय स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रम: यह आयुष्मान भारत का एक भाग है। इसका उद्देश्य विद्यालय जाने वाले विद्यार्थियों में स्वास्थ्य जागरूकता, पोषण शिक्षा तथा स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना है।
  • सही भोजन भारत अभियान: यह सुरक्षित, स्वस्थ एवं सतत आहार को बढ़ावा देने की पहल है। इसमें सही भोजन विद्यालय जैसे कार्यक्रम तथा अस्वास्थ्यकर खाद्य वातावरण का विनियमन शामिल है।
  • भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषदराष्ट्रीय पोषण संस्थान की ‘आइए अपने भोजन को बेहतर बनाएँ’ (LFOF) पहल: यह किशोरों के लिए खाद्य वातावरण में सुधार हेतु बहु-हितधारक पहल है। इसमें अधिक वसा, अधिक शर्करा एवं अधिक नमक वाले खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों के विनियमन, अस्वास्थ्यकर पेयों पर कराधान, खाद्य लेबल संबंधी साक्षरता तथा विद्यालयों के लिए आदर्श पोषण पाठ्यक्रम की अनुशंसा की गई है।

आगे की राह

  • विद्यालयों को स्वास्थ्य संवर्धन संस्थानों में परिवर्तित करना: पोषण, स्वास्थ्य एवं शारीरिक गतिविधि को शिक्षा का पूरक न मानकर विद्यालयी जीवन का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।
  • अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से मुक्त विद्यालय क्षेत्र का निर्माण: अधिक वसा, अधिक शर्करा एवं अधिक नमक वाले खाद्य पदार्थों तथा शर्करा युक्त पेयों का कठोर विनियमन किया जाना चाहिए।
  • पोषण संबंधी कौशल का शिक्षण: किशोरों को खाद्य लेबल पढ़ना, भोजन की मात्रा का निर्धारण, पाक-कला की मूल बातें तथा खाद्य विपणन की कार्यप्रणाली सिखाई जानी चाहिए।
  • विद्यालयी भोजन कार्यक्रमों को सुदृढ़ बनाना: वर्तमान प्रधानमंत्री पोषण योजना में प्रोटीन, फल, सब्जियाँ तथा मोटे अनाजों को सम्मिलित करते हुए आहार में विविधता लाई जानी चाहिए।
  • प्रतिदिन शारीरिक गतिविधि सुनिश्चित करना: खेल एवं शारीरिक शिक्षा को विद्यालयी शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाया जाना चाहिए।
  • व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देना: विद्यालयी उद्यान, फल अवकाश, पोषण क्लब तथा सहपाठी अभियानों के माध्यम से स्वस्थ आदतों को संस्थागत रूप दिया जा सकता है।

निष्कर्ष

  • किशोर कुपोषण अब केवल अल्पपोषण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बढ़ते मोटापे, उपापचयी विकारों तथा अस्वास्थ्यकर व्यवहारों के रूप में भी सामने आ रहा है।
  • चूँकि अधिकांश असंचारी रोगों की शुरुआत किशोरावस्था में ही होती है, इसलिए विद्यालयों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की अग्रिम पंक्ति के संस्थानों में परिवर्तित करने की आवश्यकता है। आज स्वस्थ किशोरों में किया गया निवेश भविष्य में देश में रोगों के बोझ तथा स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाले व्यय को कम करने में सहायक होगा।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत में किशोर कुपोषण के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों की चर्चा कीजिए। पोषण को बढ़ावा देने तथा असंचारी रोगों की रोकथाम में विद्यालयों की भूमिका का परीक्षण कीजिए।

स्रोत: TH

 

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