भारत में जनसंख्या परिवर्तन: जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रबंधन

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत में घटती प्रजनन दर, वृद्ध होती जनसंख्या तथा क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असंतुलनों को लेकर बढ़ती चिंताओं ने जनसंख्या परिवर्तन के प्रति एक सावधानीपूर्ण, संतुलित एवं साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। साथ ही, पारंपरिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की मांग भी समय-समय पर उठाई जा रही है।

भारत में जनसंख्या परिवर्तन

  • भारत वर्तमान में जनसांख्यिकीय संक्रमण के उन्नत चरण में है, जहाँ प्रजनन दर तथा मृत्यु दर दोनों में निरंतर कमी दर्ज की जा रही है।
  • नमूना पंजीकरण प्रणाली , 2021 तथा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 2.0 रह गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम है।
  • यद्यपि जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी हो रही है, फिर भी भारत के लगभग 66 प्रतिशत नागरिक कार्यशील आयु वर्ग (15-59 वर्ष) में हैं, जिससे देश को अभी भी जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्त हो रहा है।
    • तथापि, जनसंख्या वृद्धि में मंदी, वृद्धावस्था, क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय विषमताएँ तथा धार्मिक संरचना में परिवर्तन ने व्यापक सार्वजनिक विमर्श एवं चिंताओं को उत्पन्न किया है।
  • अतः अनावश्यक भय या अतिरंजना से बचते हुए संतुलित एवं साक्ष्य-आधारित नीति दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

क्या भारत जनसंख्या ह्रास (Depopulation) वाला देश बन जाएगा?

  • भारत की स्थिति जनसंख्या पतन की नहीं, बल्कि जनसंख्या स्थिरीकरण की है।
  • संयुक्त राष्ट्र विश्व जनसंख्या संभावनाएँ, 2022 के अनुसार, इस शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत की जनसंख्या लगभग 1.7 अरब के उच्चतम स्तर पर पहुँचेगी, जिसके बाद धीरे-धीरे घटते हुए वर्ष 2100 तक वर्तमान स्तर के आसपास स्थिर हो जाएगी।
  • इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्युएशन (IHME) के अनुमान अपेक्षाकृत तीव्र जनसंख्या गिरावट का संकेत देते हैं, किंतु ये इस धारणा पर आधारित हैं कि उच्च शिक्षा का स्तर भविष्य में भी वर्तमान गति से प्रजनन दर को कम करता रहेगा।
  • इसके विपरीत, NFHS-5 के आँकड़े दर्शाते हैं कि उच्च शिक्षित महिलाओं में प्रजनन दर अब स्थिर हो चुकी है, जबकि अपेक्षाकृत कम शिक्षित महिलाओं में इसमें उल्लेखनीय कमी आई है। परिणामस्वरूप, शिक्षा-आधारित प्रजनन अंतर संकुचित हुआ है।
  • इससे स्पष्ट होता है कि अत्यधिक जनसंख्या ह्रास की आशंकाएँ भविष्य की वास्तविक स्थिति का अतिरंजित अनुमान प्रस्तुत कर सकती हैं।

जनसांख्यिकीय क्षेत्रीय अंतर

  • तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में प्रजनन दर में गिरावट उत्तरी राज्यों की तुलना में बहुत पहले प्रारम्भ हो गई थी।
  • परिणामस्वरूप, समय के साथ भारत की कुल जनसंख्या में दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी में कमी आई है। उदाहरणस्वरूप, तमिलनाडु की जनसंख्या हिस्सेदारी 1971 के 7.5 प्रतिशत से घटकर 2011 की जनगणना में लगभग 6 प्रतिशत रह गई।
  • इससे परिसीमन को लेकर नई आशंकाएँ उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि यदि भविष्य में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
  • दूसरी ओर, निम्न प्रजनन दर ने इन राज्यों को स्वास्थ्य, शिक्षा तथा मानव पूंजी में अधिक निवेश करने का अवसर प्रदान किया है।
  • आर्थिक आकलनों के अनुसार, यद्यपि तमिलनाडु की जनसंख्या हिस्सेदारी घटी है, फिर भी भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में उसकी हिस्सेदारी बढ़ी है, जो उत्पादकता-आधारित आर्थिक विकास का संकेत है।

 प्रमुख जनसंख्या सिद्धांत

माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत (थॉमस रॉबर्ट माल्थस, 1798)

  • मुख्य विचार : खाद्य उत्पादन ज्यामितीय प्रगति में बढ़ता है, जबकि जनसंख्या अंकगणितीय प्रगति में बढ़ती है।
    • अंततः खाद्य आपूर्ति जनसंख्या वृद्धि के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती, जिससे संकट उत्पन्न होते हैं।
  • जनसंख्या नियंत्रण के उपाय 
    • निवारक नियंत्रण :
      • विलंबित विवाह
      • नैतिक संयम
      • ब्रह्मचर्य
    • सकारात्मक नियंत्रण:
      • अकाल
      • महामारी
      • युद्ध
      • प्राकृतिक आपदाएँ
  • आलोचना : हरित क्रांति, यंत्रीकरण तथा जैव-प्रौद्योगिकी जैसी तकनीकी प्रगति के कारण खाद्य उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई।
    • इस सिद्धांत में स्वास्थ्य सेवाओं, अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा उत्पादकता में होने वाली प्रगति का पूर्वानुमान नहीं लगाया गया।
    • भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि नवाचार एवं तकनीकी विकास के माध्यम से जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ खाद्य उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत (DTT)

  • विकासकर्ता: वॉरेन थॉम्पसन (1929); फ्रैंक नोटेस्टीन द्वारा परिष्कृत।
  • चरण-I : उच्च स्थिर अवस्था
    • उच्च जन्म दर
    • उच्च मृत्यु दर
    • जनसंख्या वृद्धि अत्यंत धीमी
    • औद्योगीकरण-पूर्व समाज
  • चरण-II : प्रारम्भिक विस्तार अवस्था
    • स्वास्थ्य एवं स्वच्छता में सुधार से मृत्यु दर घटती है।
    • जन्म दर उच्च बनी रहती है।
    • परिणामस्वरूप जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ती है।
  • चरण-III : उत्तरवर्ती विस्तार अवस्था
    • जन्म दर में गिरावट प्रारम्भ होती है।
    • जनसंख्या वृद्धि जारी रहती है, किंतु उसकी गति धीमी हो जाती है।
    • उदाहरण: बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध का भारत।
  • चरण-IV : निम्न स्थिर अवस्था
    • जन्म दर एवं मृत्यु दर दोनों निम्न स्तर पर होती हैं।
    • जनसंख्या लगभग स्थिर रहती है।
    • उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम तथा फ्रांस।
  • चरण-V : संभावित अवस्था
    • जन्म दर मृत्यु दर से भी कम हो जाती है।
    • जनसंख्या वृद्धावस्था की ओर अग्रसर होती है तथा जनसंख्या में कमी की संभावना रहती है।
    • उदाहरण: दक्षिण कोरिया, जापान एवं इटली।
  • भारत की स्थिति
    • भारत वर्तमान में चरण-III के उत्तरार्ध से चरण-IV के प्रारम्भिक स्तर में है।
    • NFHS-5 के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम है।

 इष्टतम जनसंख्या सिद्धांत(एडविन कैनन)

  • मुख्य विचार:  किसी निश्चित संसाधन एवं प्रौद्योगिकी स्तर पर जनसंख्या का एक ऐसा इष्टतम आकार होता है, जो प्रति व्यक्ति आय को अधिकतम करता है।
  • निहितार्थ:
    • अल्प जनसंख्या: उपलब्ध संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता।
    • अधिक जनसंख्या: संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
    • जीवन स्तर में गिरावट आती है।
    • इष्टतम जनसंख्या : अधिकतम उत्पादकता एवं आर्थिक कल्याण सुनिश्चित होता है।
  • सीमाएँ:
    • इष्टतम जनसंख्या का निर्धारण करना अत्यंत कठिन है।
    • यह सिद्धांत पर्यावरणीय स्थिरता तथा सामाजिक आयामों की उपेक्षा करता है।
    • तकनीकी परिवर्तन के साथ इष्टतम स्तर निरंतर परिवर्तित होता रहता है।

 जनसांख्यिकीय लाभांश सिद्धांत

  • मूल अवधारणा: जब कार्यशील आयु वर्ग (15–64 वर्ष) की जनसंख्या आश्रित जनसंख्या की तुलना में अधिक होती है, तब अर्थव्यवस्था तीव्र गति से विकास कर सकती है।
  • सफलता की प्रमुख शर्तें:
    • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
    • कौशल विकास
    • रोजगार सृजन
    • कार्यबल में महिलाओं की अधिक भागीदारी
    • सुशासन एवं सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवाएँ
  • भारत की स्थिति: भारत वर्तमान में जनसांख्यिकीय लाभांश के चरण में है, जिसके 2040–2055 तक बने रहने का अनुमान संयुक्त राष्ट्र द्वारा व्यक्त किया गया है।
  • चुनौती: यदि पर्याप्त रोजगार एवं कौशल उपलब्ध नहीं कराए गए, तो यही जनसांख्यिकीय लाभांश जनसांख्यिकीय दायित्व में परिवर्तित हो सकता है।

 मानव पूंजी सिद्धांत

  • मूल अवधारणा: आर्थिक विकास जनसंख्या की संख्या की अपेक्षा उसकी गुणवत्ता पर अधिक निर्भर करता है।
  • मुख्य फोकस क्षेत्र:
    • शिक्षा
    • स्वास्थ्य सेवाएँ
    • कौशल विकास
    • नवाचार

वृद्ध होती जनसंख्या : चुनौती या अवसर? 

  • पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अनुसार, 60 वर्ष एवं उससे अधिक आयु के लोगों की जनसंख्या हिस्सेदारी 2021 के 11 प्रतिशत से बढ़कर 2051 तक लगभग 28 प्रतिशत हो जाएगी।
  • चुनौतियाँ:
    • स्वास्थ्य सेवाओं पर व्यय में वृद्धि।
    • पेंशन संबंधी दायित्वों में विस्तार।
    • वृद्धजन सेवाओं की बढ़ती मांग।
    • वृद्ध आश्रितता अनुपात में वृद्धि।

यह गंभीर संकट क्यों नहीं बन सकता?

  • बाल जनसंख्या में होने वाली कमी, वृद्ध जनसंख्या में होने वाली वृद्धि की पर्याप्त सीमा तक क्षतिपूर्ति कर देगी। 
  • वर्ष 2051 तक भारत की कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या लगभग 64 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वचालन तथा डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ श्रम उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती हैं।
  • भारत में महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP) अभी भी अपेक्षाकृत निम्न है, जिससे महिलाओं की अधिक भागीदारी के माध्यम से कार्यबल का विस्तार करने की व्यापक संभावनाएँ उपलब्ध हैं।
  • अतः जनसंख्या वृद्धावस्था को आर्थिक आपदा के रूप में नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित ढंग से प्रबंधित किए जा सकने वाले जनसांख्यिकीय संक्रमण के रूप में देखा जाना चाहिए।

संबंधित प्रयास : जनसंख्या संतुलन

  • भारत सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की अवधारणा से आगे बढ़ते हुए जनसंख्या स्थिरीकरण तथा प्रजनन अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण को अपनाया है।
  • राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000: स्वैच्छिक परिवार नियोजन को प्रोत्साहन।
    • प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण।
    • जनसंख्या स्थिरीकरण को दीर्घकालिक नीति-लक्ष्य के रूप में स्थापित करना।
  • मिशन परिवार विकास: उच्च प्रजनन दर वाले जिलों में आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता एवं पहुँच को बढ़ाना।
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण एवं विस्तार।
  • पोषण अभियान : माताओं एवं बच्चों के लिए बेहतर पोषण सुनिश्चित करना।
  • कुपोषण में कमी लाकर स्वस्थ मानव संसाधन के विकास को प्रोत्साहित करना।
  • स्किल इंडिया मिशन एवं डिजिटल इंडिया : उत्पादकता में वृद्धि को प्रोत्साहित करना।
    • बदलती प्रौद्योगिकी एवं श्रम बाज़ार की आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यबल को कौशलयुक्त बनाना।
  • राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (NPHCE): भारत की वृद्ध होती जनसंख्या की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु समर्पित कार्यक्रम।
    • वरिष्ठ नागरिकों के लिए समग्र एवं सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना।
    • इन सभी पहलों से यह स्पष्ट होता है कि सतत जनसांख्यिकीय प्रबंधन का आधार स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, लैंगिक समानता तथा रोजगार सृजन है, न कि बलपूर्वक अथवा दमनात्मक जनसंख्या नियंत्रण नीतियाँ।

नीति-प्राथमिकताएँ : आगे की राह

  • जनसंख्या विस्फोट अथवा जनसंख्या ह्रास संबंधी आशंकाओं पर आधारित भावनात्मक विमर्श के स्थान पर साक्ष्य-आधारित जनसंख्या नीतियाँ अपनाई जाएँ।
  • महिलाओं की श्रम बल भागीदारी (FLFP) बढ़ाने के लिए बाल देखभाल सुविधाओं, लचीले रोजगार तथा सुरक्षित कार्यस्थलों को प्रोत्साहित किया जाए।
  • जनसांख्यिकीय लाभांश का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने हेतु शिक्षा एवं कौशल विकास में निवेश बढ़ाया जाए।
  • सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता में सुधार किया जाए तथा परिवारों के शिक्षा संबंधी व्यय को कम किया जाए, जिससे बच्चों के पालन-पोषण एवं शिक्षा का आर्थिक भार घट सके।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं , सामाजिक सुरक्षा तथा वृद्धजन देखभाल हेतु आवश्यक आधारभूत संरचना का विकास किया जाए, जिससे स्वस्थ वृद्धावस्था सुनिश्चित की जा सके।
  • परिसीमन से संबंधित सुधारों में ऐसा संतुलन स्थापित किया जाए, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व तथा संघीय समानता दोनों सुरक्षित रहें।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं अन्य तकनीकी नवाचारों का उपयोग कर उत्पादकता बढ़ाई जाए तथा श्रमबल वृद्धि की धीमी गति की भरपाई की जाए।
  • प्रजनन अधिकारों को सुदृढ़ बनाने हेतु गर्भनिरोधक साधनों , मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तथा स्वैच्छिक एवं सूचित परिवार नियोजन की सार्वभौमिक उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत का जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition) अवसरों एवं चुनौतियों—दोनों को प्रस्तुत करता है। घटती प्रजनन दर, वृद्ध होती जनसंख्या तथा क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असमानताओं के भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास पर पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना कीजिए।

स्रोत: IE

 

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