पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था; उद्योग
संदर्भ
- भारत का वस्त्र उद्योग रोजगार, निर्यात और ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तथापि, यह जलवायु-जनित ऊष्मा तनाव जैसी संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो इसकी दीर्घकालिक स्थिरता को खतरे में डालता है।
भारत के वस्त्र उद्योग का अवलोकन
- भारतीय वस्त्र उद्योग विविध और ऊर्ध्वाधर रूप से एकीकृत है, जिसमें कपास की खेती, कताई, बुनाई, प्रसंस्करण, परिधान निर्माण एवं निर्यात शामिल हैं।
- यह औद्योगिक उत्पादन और GDP में उल्लेखनीय योगदान देता है तथा विनिर्माण रोजगार में बड़ा हिस्सा रखता है, विशेषकर अनौपचारिक श्रम में।
- यह ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्थाओं पर प्रभुत्व रखता है, कृषि को उद्योग से जोड़ता है।
आर्थिक महत्व
- वस्त्र और परिधान उद्योग GDP में लगभग 2% योगदान, विनिर्माण GVA में 11%, और निर्यात में 8.63% योगदान देता है; इसका अनुमानित आकार 179 अरब अमेरिकी डॉलर है।
- निर्यात टोकरी: भारत विश्व का 6वाँ सबसे बड़ा निर्यातक है, जिसका वैश्विक निर्यात में लगभग 4% हिस्सा है।
- 2025 में भारत के वस्त्र क्षेत्र ने 118 देशों और निर्यात गंतव्यों में वृद्धि दर्ज की।
- अमेरिका, यूरोपीय संघ और मध्य पूर्व जैसे वैश्विक बाज़ारों में मजबूत उपस्थिति।
- रोजगार: कृषि के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है, जिसमें 4.5 करोड़ से अधिक लोग सीधे कार्यरत हैं।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2026-27 के अनुसार, वस्त्र उद्योग का 8 प्रमुख उद्योग समूहों में रोजगार में 9% हिस्सा है।
- भविष्य की संभावनाएँ: भारतीय वस्त्र बाज़ार वर्तमान में विश्व में पाँचवें स्थान पर है; सरकार आगामी पाँच वर्षों में इसकी वृद्धि दर को 15-20% तक बढ़ाने हेतु सक्रिय रूप से कार्य कर रही है।
उद्योग की संरचना
- संगठित क्षेत्र: बड़े मिल, निर्यात-उन्मुख इकाइयाँ; पूंजी-प्रधान और प्रौद्योगिकी-आधारित।
- असंगठित क्षेत्र: हथकरघा, पावरलूम, छोटे परिधान इकाइयाँ; श्रम-प्रधान, कम उत्पादकता।
- यह द्वैध संरचना दक्षता अंतर और नीतिगत चुनौतियाँ उत्पन्न करती है।
वैश्विक वस्त्र मूल्य श्रृंखला में भारत
- भारत आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण (चीन+1 रणनीति) और प्रतिस्पर्धी देशों में अस्थिरता के कारण आदेशों के स्थानांतरण से लाभान्वित हो रहा है।
- तथापि, वैश्विक व्यापार कठोर समयसीमा और बहुराष्ट्रीय ब्रांडों से मूल्य दबाव द्वारा चिह्नित है।
- इससे सीमित सौदेबाजी शक्ति वाले भारतीय निर्माताओं के लिए असुरक्षा उत्पन्न होती है।
भारत के वस्त्र क्षेत्र में उभरती चुनौती
- ऊष्मागतिकीय बाधा:
- श्रमिक-स्तर प्रभाव: 40°C पर उत्पादकता लगभग 50% तक घट सकती है; शीतलन अवकाश के अभाव में श्रमिकों की मजदूरी कम होती है।
- मैक्रो-स्तर प्रभाव: 2001–2020 के दौरान भारत ने प्रतिवर्ष लगभग 259 अरब श्रम घंटे खोए; प्रत्येक 1°C वृद्धि पर उत्पादन लगभग 2% घटा।
- केवल 2024 में ही ~247 अरब घंटे की हानि हुई।
- कारखाना-स्तर प्रभाव: अत्यधिक गर्मी में उत्पादन क्षमता 50% तक घट जाती है; स्वास्थ्य जोखिम (हीटस्ट्रोक, निर्जलीकरण) बढ़ते हैं।
- भविष्य अनुमान: 2030 तक भारत में प्रतिदिन कार्य घंटों का 5.8% समाप्त हो सकता है, जो 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर है।
- आर्थिक चुनौतियाँ: वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम मूल्य संवर्धन, खंडित आपूर्ति श्रृंखला और कपास पर निर्भरता।
- श्रम संबंधी समस्याएँ जैसे अनौपचारिक रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा का अभाव।
- आपूर्ति श्रृंखला जाल:
- वैश्विक दबाव: कठोर समयसीमा, विलंब पर भारी दंड, और अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से मूल्य दबाव।
- स्थानीय बाधाएँ: श्रमिक शारीरिक सीमाओं से अधिक कार्य नहीं कर सकते; MSMEs की सीमित सौदेबाजी शक्ति; जलवायु-लचीला अवसंरचना का अभाव।
सरकारी पहल
- नीति एवं संस्थागत समर्थन: वस्त्र नीतियाँ, निर्यात प्रोत्साहन योजनाएँ।
- अवसंरचना विकास: वस्त्र पार्क और क्लस्टर विकास, MSMEs को समर्थन।
- कौशल विकास: कौशल मिशनों के अंतर्गत प्रशिक्षण कार्यक्रम, श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर ध्यान।
- ऊर्जा दक्षता: वस्त्र इकाइयों हेतु ऊर्जा दक्षता ब्यूरो की पहल।
आगे की राह: जलवायु-स्मार्ट औद्योगिकीकरण
- नीतिगत उपाय: ऊष्मा तनाव को आपूर्ति श्रृंखला जोखिम के रूप में मान्यता देना; व्यापार और औद्योगिक नीति में जलवायु पूर्वानुमान को सम्मिलित करना।
- कार्यस्थल सुधार: अनिवार्य हीट-एक्शन योजनाएँ, लागू तापमान सीमा, शीतलन अवकाश और स्वास्थ्य निगरानी।
- वित्तीय हस्तक्षेप: बैंकों द्वारा जलवायु-लिंक्ड ऋण, शीतलन तकनीकों हेतु सब्सिडी युक्त ऋण।
- श्रमिक संरक्षण: ऊष्मा तनाव सुरक्षा हेतु कानूनी प्रावधान; जल, छाया और विश्राम स्थलों तक पहुँच।
- नवाचार: पहनने योग्य शीतलन तकनीक, ऊष्मा-प्रतिरोधी कपास, ऊर्जा-दक्ष विनिर्माण में अनुसंधान एवं विकास।
- वैश्विक जिम्मेदारी: अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों द्वारा न्यायसंगत मूल्य निर्धारण और जलवायु वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए लंबी समयसीमा।
निष्कर्ष
- वैश्विक वस्त्र उद्योग ने लंबे समय तक उत्पादन लागत को स्थिर माना, किंतु उसने एक महत्वपूर्ण चर — मानव ऊष्मा-नियमन — की उपेक्षा की।
- भारत के पास सुदृढ़ घरेलू संसाधनों और बढ़ती वैश्विक मांग के आधार पर वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की क्षमता है। तथापि, जलवायु परिवर्तन, विशेषकर ऊष्मा तनाव, एक संरचनात्मक खतरा है।
- क्षेत्र का भविष्य इस पर निर्भर करता है कि भारत कम लागत वाले श्रम मॉडल से जलवायु-लचीले, श्रमिक-केंद्रित और सतत औद्योगिक प्रणाली की ओर संक्रमण कर पाता है या नहीं।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत के वस्त्र क्षेत्र में श्रम उत्पादकता और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए ऊष्मा तनाव किस प्रकार एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रहा है, इस पर चर्चा कीजिए। जलवायु-लचीला एवं श्रमिक-केंद्रित वस्त्र उद्योग बनाने हेतु नीतिगत उपाय सुझाइए। |
स्रोत: TH
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