पाठ्यक्रम: GS2/ स्वास्थ्य
संदर्भ
- विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री ने दुर्लभ आनुवंशिक विकारों के लिए UMMID (वंशानुगत विकारों के प्रबंधन की विशिष्ट पद्धतियाँ ) कार्यक्रम राष्ट्र को समर्पित किया।
UMMID कार्यक्रम के बारे में
- यह जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) की एक पहल है, जिसका उद्देश्य भारत में दुर्लभ आनुवंशिक विकारों के निदान और प्रबंधन में सुधार करना है।
- कार्यक्रम का लक्ष्य वंशानुगत विकारों के लिए निदान, स्क्रीनिंग और परामर्श को अधिक किफायती, सुलभ एवं व्यापक रूप से उपलब्ध कराना है।
- यह पहल चिकित्सकों के प्रशिक्षण और आनुवंशिक स्वास्थ्य देखभाल में संस्थागत क्षमता निर्माण को भी समर्थन देती है।
- सरकार ने UMMID डैशबोर्ड और UMMID संकलन जारी किया है ताकि देशव्यापी निगरानी, निदान और जनसंपर्क सेवाओं को सुदृढ़ किया जा सके।
दुर्लभ आनुवंशिक विकार क्या हैं?
- दुर्लभ आनुवंशिक विकार वे रोग हैं जो जीन या गुणसूत्रों में असामान्यताओं या उत्परिवर्तन के कारण उत्पन्न होते हैं।
- ये सामान्यतः माता-पिता से विरासत में मिलते हैं और शारीरिक, तंत्रिका संबंधी, चयापचय या विकासात्मक कार्यों को प्रभावित कर सकते हैं।
- यद्यपि प्रत्येक विकार से प्रभावित लोगों की संख्या कम होती है, सामूहिक रूप से दुर्लभ रोग वैश्विक स्तर पर एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
- दुर्लभ आनुवंशिक विकारों के कारण:
- जीन में विरासत में मिले उत्परिवर्तन प्रमुख कारणों में से एक हैं।
- गुणसूत्रीय असामान्यताएँ विकासात्मक और वंशानुगत विकारों का कारण बन सकती हैं।
- उदाहरण:
- सिकल सेल रोग: एक वंशानुगत रक्त विकार जो लाल रक्त कोशिकाओं के आकार और कार्य को प्रभावित करता है।
- थैलेसीमिया: एक वंशानुगत रक्त विकार जो शरीर की स्वस्थ हीमोग्लोबिन बनाने की क्षमता को कम करता है।
- हीमोफीलिया: एक आनुवंशिक विकार जो रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया को बाधित करता है।
- ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी: एक आनुवंशिक रोग जो मांसपेशियों के क्रमिक क्षय और कमजोरी का कारण बनता है।
- स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA): एक दुर्लभ वंशानुगत रोग जो मांसपेशियों की गति को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका कोशिकाओं को क्षति पहुँचाता है।
दुर्लभ आनुवंशिक विकारों से जुड़ी चुनौतियाँ
- विलंबित निदान: जागरूकता की कमी और अपर्याप्त आनुवंशिक परीक्षण सुविधाओं के कारण दुर्लभ रोगों का निदान विलंबित होता है।
- अनेक रोगी सही निदान प्राप्त करने से पहले कई वर्षों तक विभिन्न चिकित्सकों से परामर्श लेते रहते हैं।
- उच्च उपचार लागत: दुर्लभ रोगों के उपचार और जीन-थेरेपी अत्यधिक महंगे होते हैं और अधिकांश परिवारों के लिए वहन योग्य नहीं होते।
- आयातित दवाओं पर निर्भरता स्वास्थ्य व्यय को और बढ़ा देती है।
- सीमित स्वास्थ्य अवसंरचना: भारत में आनुवंशिक निदान और परामर्श के लिए विशेषीकृत केंद्रों की संख्या सीमित है।
- दुर्लभ रोगों के लिए उन्नत स्वास्थ्य सुविधाएँ मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हैं।
- कुशल पेशेवरों की कमी: भारत प्रशिक्षित आनुवंशिक परामर्शदाताओं, चिकित्सकों और जीनोमिक शोधकर्ताओं की कमी का सामना कर रहा है।
- सामाजिक भार: दुर्लभ रोगों से प्रभावित परिवारों को भावनात्मक तनाव, सामाजिक कलंक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- सीमित अनुसंधान और डेटा: व्यापक डेटा और रोग रजिस्ट्रियों की कमी प्रभावी नीतिनिर्माण और अनुसंधान को प्रभावित करती है। दुर्लभ रोगों में वैज्ञानिक अनुसंधान और औषधि विकास हेतु अपेक्षाकृत कम निवेश किया जाता है।
सरकारी पहलें
- राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति (NPRD), 2021: दुर्लभ रोगों की रोकथाम और प्रबंधन के लिए एक रूपरेखा प्रदान करती है। यह नीति चयनित दुर्लभ रोगों के उपचार हेतु वित्तीय सहायता का समर्थन करती है।
- राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK): जन्मजात दोषों और विकासात्मक विकारों वाले बच्चों के लिए प्रारंभिक स्क्रीनिंग एवं हस्तक्षेप सेवाएँ प्रदान करता है।
- सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन: भारत सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक सिकल सेल एनीमिया को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त किया जाए।
आगे की राह
- भारत को नवजात और प्रसवपूर्व स्क्रीनिंग कार्यक्रमों का विस्तार सभी राज्यों एवं जिलों में करना चाहिए।
- सरकार को आनुवंशिक निदान और परामर्श के लिए अधिक विशेषीकृत केंद्र स्थापित करने चाहिए।
- जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान, जीनोम अनुक्रमण और स्वदेशी उपचारों में अधिक निवेश की आवश्यकता है।
Source: AIR
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संक्षिप्त समाचार 21-05-2026