पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यदि अभियुक्त को कोई आपत्ति न हो, तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के अंतर्गत राजद्रोह से संबंधित मामलों में लंबित विचारण (ट्रायल) तथा अपीलों की कार्यवाही आगे बढ़ाई जा सकती है।
परिचय
- वर्ष 2022 में उच्चतम न्यायालय ने राजद्रोह से संबंधित उन सभी मामलों की सुनवाई पर रोक लगा दी थी, जो विभिन्न न्यायालयों में लंबित थे। यह रोक तब तक के लिए लगाई गई थी, जब तक केंद्र सरकार औपनिवेशिक कालीन इस प्रावधान की “पुनः समीक्षा और पुनर्विचार” की प्रक्रिया पूर्ण नहीं कर लेती।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि पुनर्विचार की प्रक्रिया के दौरान केंद्र एवं राज्य सरकारें धारा 124A के अंतर्गत नई एफआईआर दर्ज करने, जांच जारी रखने अथवा किसी प्रकार की दंडात्मक अथवा बलपूर्वक कार्रवाई करने से परहेज करें।
भारत में राजद्रोह कानून की पृष्ठभूमि
- राजद्रोह संबंधी कानून मूलतः 1860 में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले द्वारा तैयार भारतीय दंड संहिता (IPC) का हिस्सा नहीं था। इसे बाद में वर्ष 1870 में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा जोड़ा गया।
- ब्रिटिश शासन ने राजद्रोह कानून मुख्यतः निम्न उद्देश्यों से लागू किया था—
- उभरती राष्ट्रवादी भावना को दबाने के लिए,
- स्थानीय भाषाई प्रेस पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए,
- औपनिवेशिक शासन की आलोचना को रोकने के लिए,
- स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेताओं को दंडित करने के लिए।
- बाल गंगाधर तिलक उन प्रारंभिक राष्ट्रवादी नेताओं में शामिल थे, जिन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।
भारतीय दंड संहिता की धारा 124A
- धारा 124A के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति शब्दों—चाहे वे बोले गए हों या लिखित—संकेतों, दृश्य निरूपण अथवा अन्य किसी माध्यम से विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा, अवमानना या असंतोष उत्पन्न करता है अथवा उत्पन्न करने का प्रयास करता है, तो वह दंड का भागी होगा।
- इस अपराध के लिए निर्धारित दंड में शामिल थे—
- जुर्माने सहित आजीवन कारावास, या
- जुर्माने सहित तीन वर्ष तक का कारावास, या
- केवल जुर्माना।
- यह अपराध संज्ञेय (Cognizable), गैर-जमानती (Non-bailable) तथा गैर-समझौतायोग्य (Non-compoundable) था।
- इसके कारण पुलिस एवं प्रशासन को व्यापक शक्तियाँ प्राप्त थीं।
- हालाँकि, इस प्रावधान में यह भी स्पष्ट किया गया था कि यदि सरकार की नीतियों की वैधानिक आलोचना घृणा, हिंसा अथवा लोक व्यवस्था भंग करने के उद्देश्य से न की गई हो, तो उसे राजद्रोह नहीं माना जाएगा।
राजद्रोह पर संवैधानिक विमर्श
- अनुच्छेद 19(1)(a) : वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इसमें शामिल हैं—
- सरकार की आलोचना करने की स्वतंत्रता,
- प्रेस की स्वतंत्रता,
- राजनीतिक विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता,
- शांतिपूर्ण असहमति व्यक्त करने का अधिकार।
- अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तिसंगत प्रतिबंध: राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा तथा भारत की संप्रभुता एवं अखंडता के हित में इस स्वतंत्रता पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकता है।
- राजद्रोह से संबंधित संवैधानिक परिचर्चा का मुख्य प्रश्न यह था कि क्या धारा 124A अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुचित प्रतिबंध लगाती है।
राजद्रोह पर उच्चतम न्यायालय के महत्त्वपूर्ण निर्णय
- केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य: उच्चतम न्यायालय ने धारा 124A की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, किंतु इसके प्रयोग की सीमा निर्धारित कर दी।
- न्यायालय ने कहा कि—
- केवल सरकार की आलोचना करना राजद्रोह नहीं है,
- सरकार के विरुद्ध तीखी टिप्पणी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत संरक्षित है,
- राजद्रोह तभी माना जाएगा जब हिंसा भड़काने अथवा लोक व्यवस्था भंग करने का स्पष्ट प्रयास या उद्देश्य हो।
- यह निर्णय राजद्रोह कानून की व्याख्या का मार्गदर्शक सिद्धांत बन गया।
- बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य: न्यायालय ने कहा कि ऐसे पृथक कथन, जिनसे हिंसात्मक परिणाम उत्पन्न न हों, उन्हें राजद्रोह के रूप में दंडित नहीं किया जा सकता।
- विनोद दुआ बनाम भारत संघ: न्यायालय ने निर्णय दिया कि सरकार की नीतियों अथवा पदाधिकारियों की तीव्र आलोचना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है। जब तक हिंसा भड़काने अथवा लोक शांति भंग करने का स्पष्ट और सिद्ध उद्देश्य न हो, तब तक उसे राजद्रोह नहीं माना जा सकता।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के अंतर्गत राजद्रोह
- सरकार ने आधिकारिक रूप से भारतीय दंड संहिता की धारा 124A को समाप्त कर दिया तथा कहा कि औपनिवेशिक कालीन राजद्रोह कानून को निरस्त कर दिया गया है।
- हालाँकि, धारा 124A हटाए जाने के बावजूद भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 152 में भारत की संप्रभुता, एकता एवं अखंडता को संकट में डालने वाले कृत्यों से संबंधित एक नया अपराध जोड़ा गया है।
- इस प्रावधान के अंतर्गत निम्न गतिविधियों को अपराध घोषित किया गया है—
- पृथकतावादी गतिविधियाँ,
- सशस्त्र विद्रोह,
- विध्वंसकारी गतिविधियाँ,
- अलगाववादी भावनाओं को प्रोत्साहन देना,
- राष्ट्रीय एकता को खतरे में डालने वाली गतिविधियाँ।
- इसके लिए दंड—
- आजीवन कारावास, अथवा
- सात वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना
हो सकता है।
नए प्रावधान की आलोचना
- व्यापक एवं अस्पष्ट शब्दावली: “विध्वंसकारी गतिविधियाँ” तथा “अलगाववादी भावनाएँ” जैसे शब्द अत्यधिक व्यापक एवं अस्पष्ट माने जा रहे हैं। आलोचकों का मत है कि इनकी व्यापक व्याख्या के माध्यम से शांतिपूर्ण असहमति को भी निशाना बनाया जा सकता है।
- राजद्रोह कानून की निरंतरता: कुछ विधि विशेषज्ञों का तर्क है कि यद्यपि धारा 124A को समाप्त कर दिया गया है, तथापि नया प्रावधान भिन्न शब्दावली के माध्यम से राज्य को लगभग समान शक्तियाँ प्रदान करता है।
निष्कर्ष
- राजद्रोह कानून मूलतः ब्रिटिश शासन द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। स्वतंत्रता के पश्चात भी यह प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संभावित टकराव के कारण निरंतर विवाद का विषय बना रहा।
- उच्चतम न्यायालय ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया कि केवल वही भाषण दंडनीय होगा, जिसमें हिंसा भड़काने अथवा लोक व्यवस्था भंग करने का प्रत्यक्ष तत्व विद्यमान हो।
- भारतीय दंड संहिता के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 लागू होने के साथ राजद्रोह का औपचारिक प्रावधान समाप्त कर दिया गया है, किंतु धारा 152 के दायरे एवं उसकी संभावित व्याख्या को लेकर बहस अभी भी जारी है।
Source: TH
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