16वाँ वित्त आयोग (2026 – 31) एवं स्थानीय निकायों पर प्रभाव

पाठ्यक्रम: राजव्यवस्था एवं शासन; स्थानीय स्वशासन; GS3/भारतीय अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • 16वाँ वित्त आयोग वित्तीय विकेंद्रीकरण में एक परिवर्तनकारी बदलाव का संकेत देता है, जिसमें पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) पर अभूतपूर्व ध्यान केंद्रित किया गया है। तथापि, जवाबदेही, राज्यों की स्वायत्तता एवं संस्थागत क्षमता को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।

संवैधानिक एवं संस्थागत पृष्ठभूमि

  • वित्त आयोग:
    • अनुच्छेद 280(1) आयोग को यह अनुशंसा करने का अधिकार देता है कि केंद्र और राज्यों के बीच करों की शुद्ध आय का वितरण कैसे हो; राज्यों को समेकित निधि से अनुदान कैसे दिया जाए; तथा पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के लिए राज्य वित्त को सुदृढ़ करने हेतु उपाय क्या हों।
    • भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष में गठित किया जाता है; 16वाँ वित्त आयोग 31 दिसंबर 2023 को गठित हुआ।
    • वित्त आयोग यह तय करता है कि करों के विभाज्य कोष से वित्तीय संसाधनों का वितरण ऊर्ध्वाधर (केंद्र और राज्यों के बीच) तथा क्षैतिज (राज्यों के बीच) किस प्रकार किया जाए।
  • स्थानीय निकाय:
  • 73वाँ संविधान संशोधन (1992): पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) — ग्राम पंचायत, ब्लॉक पंचायत, जिला पंचायत — की स्थापना, भाग IX के अंतर्गत।
  • 74वाँ संविधान संशोधन (1992): शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) — नगर पंचायत, नगरपालिका परिषद, नगर निगम — की स्थापना, भाग IX-A के अंतर्गत।
  • अनुच्छेद 243-I एवं 243-Y: राज्यों में प्रत्येक पाँच वर्ष पर राज्य वित्त आयोग (SFCs) गठित करने का प्रावधान, जो स्थानीय निकायों को वित्तीय विकेंद्रीकरण की अनुशंसा करते हैं।
  • संविधान इन संस्थाओं को “स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ” कहता है; “स्थानीय निकाय” शब्द भाग IX या IX-A में कहीं प्रयुक्त नहीं है।

16वें वित्त आयोग की प्रमुख अनुशंसाएँ

  • राज्यों की हिस्सेदारी का संरक्षण किंतु ह्रास: विभाज्य कोष में नाममात्र हिस्सेदारी 41% रखी गई।
    • प्रभावी हिस्सेदारी ~36% से घटकर ~32% हो गई, कारण: विभाज्य कोष का संकुचन (उपकर/अधिभार का बहिष्कार) एवं विवेकाधीन हस्तांतरणों में वृद्धि।
  • क्षैतिज विकेंद्रीकरण में परिवर्तन : संशोधित सूत्र से 14 राज्यों की हिस्सेदारी कम हुई।
    • राज्यों के आर्थिक प्रदर्शन को पुरस्कृत करने हेतु GDP योगदान का 10% भारांक जोड़ा गया।
    • पूर्वोत्तर राज्यों की हिस्सेदारी लगभग 15.5% घट गई, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन और समानता के क्षरण की आशंका।
  • अनुच्छेद 275 के अनुदानों का समाप्तिकरण: राजस्व घाटा अनुदान समाप्त; क्षेत्र-विशिष्ट एवं राज्य-विशिष्ट अनुदान भी बंद।
    • परंपरागत रूप से ये अनुदान कमजोर राज्यों को सहारा देते थे।
  • अनुच्छेद 282 के अनुदानों का विस्तार (विवेकाधीन): ₹7.91 लाख करोड़ आवंटित, जिसमें ₹4.4 लाख करोड़ ग्रामीण निकायों और ₹3.6 लाख करोड़ शहरी निकायों को।
    • यह अब तक का सबसे बड़ा आवंटन है, जो गहन विकेंद्रीकरण का संकेत देता है।
  • अनुदानों की संरचना:
    • मूल अनुदान (लगभग 80%): असंलग्न, आवश्यक सेवाओं हेतु।
    • प्रदर्शन-आधारित अनुदान (लगभग 20%): राजस्व एकत्रण, लेखा-परीक्षण एवं पारदर्शिता से जुड़ा।
    • अतिरिक्त शहरीकरण प्रोत्साहन एवं क्षेत्र-विशिष्ट सहयोग।
    • यह पूर्ववर्ती वित्त आयोगों की प्रवृत्ति को आगे बढ़ाता है, जो प्रदर्शन-आधारित शासन को प्रोत्साहित करते हैं।

सकारात्मक प्रभाव

  • जनतांत्रिक आधार का सुदृढ़ीकरण: पंचायतों एवं ULBs की वित्तीय क्षमता बढ़ती है; जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं स्थानीय अवसंरचना की सेवा-प्रदाय क्षमता में सुधार।
  • वित्तीय विकेंद्रीकरण की गहराई: सहायकता के सिद्धांत के अनुरूप; राज्यों पर निर्भरता घटती है।
  • शासन सुधार हेतु प्रोत्साहन: प्रदर्शन-आधारित अनुदान बेहतर लेखांकन, स्थानीय राजस्व एकत्रण और पारदर्शिता को बढ़ावा देते हैं।
  • शहरी रूपांतरण को बढ़ावा: ULBs पर ध्यान केंद्रित कर शहरी अवसंरचना, स्मार्ट सिटी एवं सतत शहरीकरण को समर्थन।

चुनौतियाँ एवं चिंताएँ

  • राज्य स्वायत्तता का ह्रास: केंद्र से सीधे स्थानीय निकायों को हस्तांतरण राज्यों की भूमिका को कमजोर करता है।
  • संरचनात्मक राजस्व अंतराल: संपत्ति कर संग्रहण कम; पंचायतों की राजस्व निर्भरता 90% से अधिक अनुदानों पर; नगरपालिकाओं का उधार GDP का मात्र 0.05%।
  • शर्तें एवं केंद्रीकरण: प्रदर्शन-आधारित अनुदान शर्तें लगाते हैं, जिससे स्वायत्तता घटती है और ‘केंद्रीकृत विकेंद्रीकरण’ का जोखिम।
  • उपकर एवं अधिभार विभाज्य कोष से बाहर: राज्यों की वास्तविक हिस्सेदारी घटती है; 41% ऊर्ध्वाधर विकेंद्रीकरण वास्तविकता में कम प्रभावी।
  • राज्य वित्त आयोगों की कमजोर भूमिका: अनुशंसाएँ प्रायः विलंबित या उपेक्षित; विकेंद्रीकरण की प्रभावशीलता सीमित।
  • जिला कलेक्टर का प्रभुत्व: वर्तमान में जिला कलेक्टर को सर्वोच्च प्राधिकारी माना जाता है; ग्राम, ब्लॉक या जिला पंचायत सब उसी पर निर्भर, जिससे वास्तविक स्वशासन बाधित।
  • संरचनात्मक मुद्दे:
    • संघीय पदानुक्रम का धुंधलापन: स्थानीय निकायों को राज्यों के बराबर हितधारक मानना, संघ–राज्य वित्तीय संबंध को विकृत करता है।
    • समानता से दक्षता की ओर झुकाव: आवश्यकता की बजाय प्रदर्शन पर ध्यान, जिससे गरीब एवं पिछड़े क्षेत्रों को हानि।

आगे की राह

  • स्थानीय निकायों को संवैधानिक सरकारों के रूप में पुनर्परिभाषित करना: इन्हें अधीनस्थ प्रशासनिक इकाइयों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, ताकि नीति और दृष्टिकोण 73वें एवं 74वें संशोधनों की भावना के अनुरूप हों।
  • राज्य वित्त आयोगों (SFCs) को सुदृढ़ करना: कठोर समयसीमा लागू करना, रिपोर्टों को कार्रवाई प्रतिवेदन (ATR) सहित प्रस्तुत करना अनिवार्य करना, तथा राज्य-स्तरीय वित्त आयोगों को तकनीकी सहयोग प्रदान करना।
  • असंलग्न अनुदानों का क्रमिक विस्तार: ग्राम पंचायत विकास योजनाओं (GPDPs) के अनुरूप वास्तविक स्थानीय प्राथमिकताओं को निर्धारित करने की अनुमति देना।
  • DPDP एवं GIS ढाँचों का एकीकरण: संपत्ति कर का वास्तविक समय डिजिटलीकरण कर, स्व-राजस्व सृजन में सुधार।
  • संस्थागत क्षमता का निर्माण: जनजातीय, दूरस्थ एवं आकांक्षी जिलों की पंचायतों में प्रदर्शन-आधारित अनुदान की शर्तें लागू करने से पूर्व संस्थागत क्षमता विकसित करना।
  • उपकर एवं अधिभार को विभाज्य कोष में शामिल करना: एक सीमा से अधिक होने पर इन्हें सम्मिलित करना चाहिए — यह राज्यों की लंबे समय से लंबित माँग है, जिसका संरचित समाधान आवश्यक है।
  • नगरपालिका बॉन्ड बाज़ार को गहराना: वर्तमान में GDP का मात्र 0.05% है; इसे सुदृढ़ कर ULBs की केंद्रीय अनुदानों पर निर्भरता घटाना।
  • विकेंद्रीकृत, निचले स्तर से ऊपर की योजना में सतत निवेश: GPDPs, सामुदायिक सहभागिता और स्थानीय राजस्व तर्कसंगतीकरण के माध्यम से वित्तीय हस्तांतरण को वास्तविक स्थानीय स्वशासन में रूपांतरित करना।

निष्कर्ष

  • 16वाँ वित्त आयोग सहयोगात्मक संघवाद से नियंत्रित संघवाद की ओर एक प्रतिमान बदलाव का संकेत देता है, जिसमें केंद्रीय विवेकाधिकार बढ़ रहा है, वैधानिक सुरक्षा घट रही है, और समानता की बजाय दक्षता पर बल दिया जा रहा है।
  • स्थानीय शासन को सुदृढ़ करना वांछनीय है, किंतु यह राज्यों को कमजोर करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए, क्योंकि राज्य भारत की संघीय संरचना की आधारशिला हैं।
  • संविधान की संतुलित वित्तीय संघवाद की दृष्टि को बनाए रखने हेतु पुनर्संतुलन आवश्यक है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]  भारत में स्थानीय शासन की वित्तीय संरचना को सोलहवें वित्त आयोग (2026–31) की अनुशंसाओं ने परिवर्तित कर दिया है। प्रदर्शन-आधारित शर्तों और स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता के बीच उत्पन्न तनाव का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

स्रोत: IE

 

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