पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- संघीय बजट 2025–26 में उल्लिखित अनुसार भारत वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट (GW) तक विस्तारित करने के लिए तैयार है। इसके लिए शांति अधिनियम, 2025 की रूपांतरणकारी भावना के अनुरूप सहायक नियमों और विनियमों की आवश्यकता है।
भारत के लिए परमाणु ऊर्जा का महत्व
- बढ़ती ऊर्जा माँग: भारत की प्रति व्यक्ति विद्युत खपत लगभग 1,418 kWh है।
- चीन में यह लगभग 7,097 kWh और अमेरिका में 12,701 kWh है, जो विशाल वृद्धि क्षमता को दर्शाता है।
- ऊर्जा संक्रमण चुनौती: 2025 में स्थापित क्षमता लगभग 476 GW है, जिसमें लगभग 50% गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित है।
- लेकिन उत्पादन हिस्सेदारी: थर्मल (~75%), नवीकरणीय (~22%), और परमाणु (~3%)।
भारत का परमाणु ऊर्जा परिदृश्य
- वर्तमान स्थिति:
- स्थापित क्षमता: लगभग 8.7–8.8 GW; कुल बिजली उत्पादन में हिस्सेदारी लगभग 3%।
- संचालन: न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) द्वारा।
- विनियमन: एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (AERB) द्वारा।
- संस्थागत ढाँचा:
- परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE): नीति और सामरिक नियंत्रण।
- NPCIL: परमाणु संयंत्रों का निर्माण और संचालन।
- AERB: सुरक्षा विनियमन (अब सुधारों के अंतर्गत वैधानिक स्वायत्तता की ओर)।
- भारत में रिएक्टर प्रकार:
- स्वदेशी प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR)
- बॉयलिंग वाटर रिएक्टर (BWR) — सबसे पुराने, तारापुर में।
- VVER (रूसी PWR) — कुडनकुलम में।
- भारत के परमाणु कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएँ
- तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम पर आधारित:
- PHWRs (प्राकृतिक यूरेनियम)
- फास्ट ब्रीडर रिएक्टर
- थोरियम-आधारित रिएक्टर (दीर्घकालिक लक्ष्य)
- तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम पर आधारित:
- लागत लाभ: भारतीय PHWR वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी (~2 मिलियन डॉलर/MW)।
प्रमुख नीतिगत समर्थन
- शांति अधिनियम, 2025: यह दो राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप है — विकसित भारत 2047 तक और नेट-ज़ीरो उत्सर्जन 2070 तक।
- संरचनात्मक सुधार: परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) का एकाधिकार समाप्त; निजी और विदेशी भागीदारी की अनुमति; “बिल्ड-ओन-ऑपरेट” (BOO) मॉडल को मान्यता।
- विनियामक सुदृढ़ीकरण: AERB को वैधानिक दर्जा; स्वतंत्र नियामक ढाँचे की ओर अग्रसर।
- कानूनी परिवर्तन: एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962 और सिविल लाइबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010 को निरस्त कर संशोधित दायित्व व्यवस्था लागू, जिससे निवेश आकर्षित हो सके।
100 GW तक विस्तार की चुनौतियाँ
- उच्च पूंजी लागत एवं वित्तीय बाधाएँ: परमाणु संयंत्रों हेतु भारी प्रारंभिक निवेश (~200 अरब डॉलर से अधिक); लंबी परियोजना अवधि से विलंबित प्रतिफल; विदेशी रिएक्टर परियोजनाएँ वर्षों से लंबित।
- निजी निवेशकों के लिए जोखिम: वित्तीय जोखिम और अनिश्चितता अधिक।
- नवीकरणीय ऊर्जा की सीमाएँ: सौर और पवन ऊर्जा सस्ती होती जा रही; नीति का ध्यान नवीकरणीय पर; परमाणु ऊर्जा पूंजी-गहन एवं धीमी मानी जाती है।
- लंबी निर्माण अवधि: सामान्य परमाणु परियोजनाएँ 8–10 वर्ष लेती हैं; विलंब से लागत बढ़ती है और निवेशक जोखिम बढ़ता है।
- SMRs की चुनौतियाँ: छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर अभी व्यावसायीकरण के प्रारंभिक चरण में; नियामक और वित्तीय अनिश्चितताएँ।
- विनियामक एवं संस्थागत बाधाएँ: जटिल अनुमोदन प्रक्रियाएँ परियोजना विलंब का कारण।
- नीतिगत अंतराल: दायित्व, टैरिफ, अपशिष्ट प्रबंधन और ईंधन स्वामित्व पर स्पष्टता की आवश्यकता।
- पूर्व दायित्व कानून (CLNDA, 2010) ने विदेशी भागीदारी को हतोत्साहित किया; सुधारों के बाद भी दुर्घटना दायित्व और बीमा लागत पर चिंताएँ बनी हुई हैं।
सामरिक मार्ग (तीन-आयामी रणनीति)
- बड़े रिएक्टरों का स्वदेशीकरण: महंगे विदेशी डिज़ाइनों पर निर्भरता कम करना; चीन के लागत-घटाव मॉडल से सीखना।
- SMRs का विकास: औद्योगिक कैप्टिव पावर और दूरस्थ क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।
- PHWR बेड़े का विस्तार: सिद्ध स्वदेशी तकनीक (220–700 MW); मॉड्यूलराइजेशन और तेज़ निर्माण की संभावना।
निष्कर्ष एवं आगे की राह
- शांति अधिनियम की सफलता हेतु भारत को नागरिक और सामरिक परमाणु गतिविधियों का स्पष्ट पृथक्करण, टैरिफ–बीमा–दायित्व, अपशिष्ट निपटान एवं विवाद समाधान हेतु पारदर्शी ढाँचा सुनिश्चित करना होगा।
- छोटे रिएक्टरों के लिए एक्सक्लूज़न ज़ोन मानकों में सुधार की आवश्यकता है।
- इसके लिए सुदृढ़ विनियामक स्पष्टता, निजी क्षेत्र का विश्वास, तकनीकी नवाचार और कुशल परियोजना क्रियान्वयन आवश्यक है।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत के ‘विकसित भारत 2047’ और ‘नेट ज़ीरो 2070’ के दोहरे लक्ष्यों की प्राप्ति में परमाणु ऊर्जा की भूमिका पर चर्चा कीजिए। मूल्यांकन कीजिए कि हालिया सुधार किस प्रकार इस क्षेत्र में संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने का प्रयास करते हैं। |
स्रोत: TH
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