पाठ्यक्रम: GS2/शिक्षा से जुड़े मुद्दे
संदर्भ
- भारत में प्रतिभाओं की प्रचुरता के बावजूद देश के विश्वविद्यालय प्रमुख वैश्विक रैंकिंग में अभी भी पीछे हैं, जबकि चीन, सिंगापुर और हांगकांग के संस्थानों ने अनुसंधान, स्वायत्तता तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के क्षेत्र में तीव्रता से अपनी स्थिति सुदृढ़ की है।
भारत में उच्च शिक्षा के बारे में
- भारत में विश्व की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणालियों में से एक है, जिसमें विश्वविद्यालय, महाविद्यालय तथा स्वतंत्र उच्च शिक्षण संस्थान शामिल हैं।
- इसके विस्तार से उच्च शिक्षा तक पहुँच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन गुणवत्ता, अनुसंधान उत्पादकता, रोजगारपरकता तथा संस्थागत शासन की स्थिति अभी भी असमान बनी हुई है।
वर्तमान आँकड़े (AISHE, 2023-24)
- सकल नामांकन अनुपात (GER): अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE), 2023-24 के अनुसार, वर्ष 2023-24 में GER 30 रहा, जो वर्ष 2014-15 में 23.7 था।
- महिला GER वर्ष 2014-15 के 22.9 से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 31.2 हो गया है।
- अनुसूचित जाति (SC) का GER वर्ष 2014-15 के 18.9 से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 27.8 हो गया है।
- अनुसूचित जनजाति (ST) का GER वर्ष 2014-15 के 13.5 से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 22.8 हो गया है।
- लैंगिक समानता सूचकांक (GPI): यह पुरुषों और महिलाओं की शिक्षा तक सापेक्ष पहुँच को मापता है। वर्ष 2023-24 में यह 1.08 रहा।
- यह लगातार सात वर्षों से 1.0 से अधिक बना हुआ है, जो उच्च शिक्षा में महिलाओं की निरंतर अधिक भागीदारी को दर्शाता है।
- उच्च शिक्षा में नामांकन: उच्च शिक्षा में कुल नामांकन वर्ष 2014-15 के 3.42 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 4.46 करोड़ और वर्ष 2023-24 में 4.50 करोड़ हो गया है। अर्थात वर्ष 2014-15 की तुलना में 31.5% की वृद्धि हुई है।
- उच्च शिक्षा में महिला नामांकन वर्ष 2014-15 के 1.57 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 2.18 करोड़ और वर्ष 2023-24 में 2.24 करोड़ हो गया है, जो वर्ष 2014-15 की तुलना में 42.2% की वृद्धि है।
- SC विद्यार्थियों का नामांकन वर्ष 2014-15 के 46.07 लाख से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 69.72 लाख हो गया है, जो 51.4% की वृद्धि है।
- ST विद्यार्थियों का नामांकन वर्ष 2014-15 के 16.41 लाख से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 28.83 लाख हो गया है, जो 75.7% की वृद्धि है।
- इसी प्रकार, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के विद्यार्थियों का नामांकन वर्ष 2014-15 के 1.13 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 1.80 करोड़ हो गया है, जो 60.2% की वृद्धि है।
- STEM में नामांकन: STEM विषयों में नामांकन वर्ष 2014-15 के 91.5 लाख से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 1.02 करोड़ हो गया है।
- STEM में महिला विद्यार्थियों की हिस्सेदारी वर्ष 2014-15 के 38.4% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 44% हो गई है।
- वर्ष 2023-24 में कुल शिक्षक/संकाय सदस्यों की संख्या 17.32 लाख रही, जिनमें 55.1% पुरुष और 44.9% महिलाएँ हैं।
- महिला संकाय सदस्यों की संख्या वर्ष 2014-15 के 5.69 लाख से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 7.78 लाख हो गई है।

प्रमुख मुद्दे एवं चिंताएँ
- योग्यता एवं सत्यनिष्ठा: नियुक्तियों, पदोन्नतियों और प्रवेश प्रक्रियाओं में निरंतर योग्यता, निष्पक्षता तथा संस्थागत हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- पक्षपात की धारणा अथवा अपारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया संस्थानों की विश्वसनीयता को हानि पहुँचाती है और विद्यार्थियों के बीच यह संदेश देती है कि नियम सभी पर समान रूप से लागू होना आवश्यक नहीं है।
- विश्वविद्यालयों की प्रकृति को समझना: विश्वविद्यालय न तो पारंपरिक सरकारी विभाग हैं और न ही निगम। वे अधिगम एवं ज्ञान-सृजन पर आधारित समुदाय हैं, जिन्हें अकादमिक स्वतंत्रता, पेशेवर स्वायत्तता तथा जवाबदेही की आवश्यकता होती है।
- इसलिए एकसमान नीतियाँ प्रतिकूल परिणाम दे सकती हैं।
- संकाय के मूल्यांकन में विभिन्न विषयों, शिक्षण एवं अनुसंधान-उन्मुख संस्थानों, संस्थागत आकार तथा स्थानीय परिस्थितियों के बीच अंतर को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- अत्यधिक नौकरशाही नियंत्रण भी पहल एवं नवाचार की भावना को कमजोर कर सकता है।
- नेतृत्व का अभाव: अच्छी नीतियाँ प्रायः इसलिए प्रभावी नहीं हो पातीं क्योंकि संस्थानों में सक्षम अकादमिक नेतृत्व तथा सुदृढ़ कार्यान्वयन तंत्र का अभाव होता है।
- ऐसी संस्कृति, जिसमें प्रत्येक विफलता के लिए दंड दिया जाता है, प्रयोग एवं नवाचार को हतोत्साहित करती है। इसके बजाय संस्थानों को जिम्मेदार जोखिम लेने, निरंतर सीखने, मार्गदर्शन तथा नेतृत्व विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
- अनुसंधान एवं रोजगारपरकता में अंतर: भारत का अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी सीमित संख्या में संस्थानों में केंद्रित है।
- उद्योग और शिक्षा जगत के बीच कमजोर संबंध, अपर्याप्त अनुसंधान सहायता, सीमित अंतरराष्ट्रीयकरण तथा संकाय की असमान गुणवत्ता, कम रोजगारपरकता और वैश्विक स्तर पर अपेक्षाकृत कम अनुसंधान दृश्यता के प्रमुख कारण हैं।
- प्रणालीगत असमानता: कुछ उत्कृष्ट संस्थानों की उपलब्धियाँ पूरे उच्च शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को परिवर्तित नहीं कर सकतीं।
- सबसे कमजोर संस्थानों को ध्यान में रखकर बनाई गई नीतियाँ यदि विभिन्न प्रकार के विश्वविद्यालयों पर समान रूप से लागू की जाती हैं, तो वे बेहतर प्रदर्शन करने वाले संस्थानों की क्षमता को सीमित कर सकती हैं और साथ ही कमजोर संस्थानों को पर्याप्त रूप से सुदृढ़ करने में भी विफल रह सकती हैं।
संबंधित प्रयास एवं पहल
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020: यह बहुविषयक शिक्षा, संस्थागत स्वायत्तता, अंतरराष्ट्रीयकरण तथा अनुसंधान पर अधिक जोर जैसी उच्च शिक्षा की समग्र दिशा निर्धारित करती है।
- NEP 2020 ने वर्तमान विखंडित व्यवस्था को एकल निकाय भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (HECI) से प्रतिस्थापित करने का प्रस्ताव रखा था।
- HECI से संबंधित कानून अभी लंबित है। इसलिए सुधार एकीकृत नियामक के माध्यम से होने के बजाय विभिन्न निकायों के स्तर पर अलग-अलग किए जा रहे हैं।
- अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF): ANRF की स्थापना ANRF अधिनियम, 2023 के अंतर्गत की गई है। इसने पूर्ववर्ती विज्ञान एवं इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (SERB) का स्थान लिया है।
- यह भारत का शीर्ष अनुसंधान-वित्तपोषण निकाय है, जिसकी परिकल्पना NEP 2020 में की गई थी।
- NIRF: यह देश के अंदर संस्थानों के प्रदर्शन के मानकीकरण एवं तुलनात्मक मूल्यांकन का माध्यम है।
- उत्कृष्टता के संस्थान (IoE): IoE योजना वर्ष 2017-18 में शुरू की गई थी। इसका लक्ष्य 20 संस्थानों—10 सार्वजनिक और 10 निजी—को अधिक स्वायत्तता प्रदान करना था।
- PM-USHA: इसका उद्देश्य राज्य स्तरीय उच्च शिक्षा संस्थानों के सुधार के लिए सहायता प्रदान करना है।
- अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स तथा बहु-प्रवेश/निकास व्यवस्था: ये उच्च शिक्षा में अधिक पाठ्यक्रमीय लचीलापन प्रदान करते हैं।
- SWAYAM एवं DIKSHA: इनके माध्यम से डिजिटल शिक्षा और उच्च शिक्षा तक पहुँच का विस्तार किया जा रहा है।
आगे की राह: भारत में उच्च शिक्षा को सुदृढ़ करना
- जवाबदेह स्वायत्तता सुनिश्चित करना: विश्वविद्यालयों को स्पष्ट रूप से परिभाषित जवाबदेही तंत्र के साथ अधिक शैक्षणिक, प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए।
- अत्यधिक नौकरशाही हस्तक्षेप को कम करते हुए पारदर्शी लेखा-परीक्षण तथा परिणाम-आधारित मूल्यांकन को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- योग्यता-आधारित शासन को बढ़ावा देना: नियुक्तियों और पदोन्नतियों में पारदर्शिता तथा योग्यता को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- अकादमिक प्रशासकों के व्यावसायिक चयन, मार्गदर्शन तथा नियमित क्षमता-विकास के माध्यम से संस्थागत नेतृत्व को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- विभेदित शासन व्यवस्था अपनाना: सभी संस्थानों के लिए एक समान दृष्टिकोण अपनाने से बचना चाहिए। अनुसंधान-प्रधान, शिक्षण-उन्मुख, बहुविषयक तथा विशिष्ट संस्थानों के लिए अलग-अलग मूल्यांकन एवं पदोन्नति ढाँचे विकसित किए जाने चाहिए।
- अनुसंधान एवं नवाचार का सुदृढ़ीकरण: प्रतिस्पर्धात्मक एवं पूर्वानुमेय अनुसंधान वित्तपोषण में वृद्धि की जानी चाहिए।
- उद्योग–शिक्षा जगत सहयोग, अंतर्विषयक अनुसंधान, अंतरराष्ट्रीय साझेदारी तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- अनुसंधान को प्रोत्साहित करने वाले प्रमुख माध्यम के रूप में अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) को और सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- संकाय की गुणवत्ता में सुधार: योग्यता एवं विषय-विशेषज्ञता के आधार पर संकाय सदस्यों की नियुक्ति को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- निरंतर व्यावसायिक विकास, शिक्षण-पद्धति में नवाचार तथा अंतरराष्ट्रीय अकादमिक अनुभव को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- रोजगारपरकता पर ध्यान: पाठ्यक्रमों को उभरती हुई औद्योगिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
- इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, व्यावसायिक अनुभव, उद्यमिता कार्यक्रम तथा सॉफ्ट स्किल विकास के अवसरों का विस्तार किया जाना चाहिए।
- अधिगम की संस्कृति का निर्माण: विफलता के भय पर आधारित संस्कृति के स्थान पर जिम्मेदार प्रयोग एवं संस्थागत अधिगम को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- शैक्षणिक प्रक्रियाओं में सुधार के लिए समय-समय पर समीक्षा, सहकर्मी-अधिगम तथा साक्ष्य-आधारित नीतिनिर्माण का उपयोग किया जाना चाहिए।
- क्षेत्रीय एवं संस्थागत असमानताओं को कम करना: कमजोर संस्थानों को लक्षित सहायता प्रदान की जानी चाहिए, जबकि बेहतर प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों को अधिक लचीलापन दिया जाना चाहिए।
- संस्थानों के बीच सहयोग एवं संसाधनों के साझाकरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि उत्कृष्ट संस्थानों के अलग-अलग ‘द्वीप’ बनने की स्थिति को रोका जा सके।
- अंतरराष्ट्रीयकरण का सुदृढ़ीकरण: प्रतिष्ठित विदेशी संकाय सदस्यों एवं विद्यार्थियों को आकर्षित किया जाना चाहिए, वैश्विक अनुसंधान सहयोग का विस्तार किया जाना चाहिए तथा संयुक्त डिग्री कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित की जानी चाहिए, जो भारतीय विश्वविद्यालयों को वैश्विक रैंकिंग में अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाएँ।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियों की चर्चा कीजिए तथा भारतीय विश्वविद्यालयों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए उपाय सुझाइए। |
स्रोत: IE
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