पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- हाल ही में मक्का में हस्ताक्षरित सऊदी अरब–तुर्किये–पाकिस्तान पारस्परिक रक्षा समझौता (मक्का संयुक्त रक्षा समझौता) क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग में बढ़ती निकटता तथा अमेरिका-प्रधान सुरक्षा व्यवस्थाओं से हटकर रणनीतिक संतुलन स्थापित करने की संभावित दिशा का संकेत देता है।
सऊदी अरब–तुर्किये–पाकिस्तान रक्षा समझौते के बारे में
- इस समझौते के अनुसार, तीनों में से किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी तीनों सदस्यों पर हमला माना जाएगा।
- इसकी भाषा नाटो के अनुच्छेद 5 में निहित सामूहिक रक्षा के सिद्धांत से मिलती-जुलती है।
- यह समझौता सऊदी अरब और पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे सैन्य संबंधों पर आधारित है तथा इसमें तुर्किये की महत्वपूर्ण पारंपरिक सैन्य क्षमताएँ भी जुड़ गई हैं।
- हालाँकि, यह समझौता किसी औपचारिक अमेरिका-विरोधी या इजरायल-विरोधी सैन्य गुट के गठन का संकेत नहीं देता।
- तीनों देशों के पश्चिमी शक्तियों के साथ अभी भी महत्वपूर्ण संबंध हैं। सऊदी अरब अमेरिकी रक्षा प्रौद्योगिकी पर काफी निर्भर है, तुर्किये अभी भी नाटो का सदस्य है और पाकिस्तान के वाशिंगटन के साथ महत्वपूर्ण संबंध बने हुए हैं।
- इसलिए इस समझौते को रणनीतिक संतुलन स्थापित करने के रूप में समझना अधिक उचित है। अर्थात क्षेत्रीय शक्तियाँ बाहरी सुरक्षा गारंटियों को तत्काल समाप्त करने के बजाय उनके पूरक के रूप में वैकल्पिक सुरक्षा साझेदारियाँ विकसित करने का प्रयास कर रही हैं।
तीनों साझेदारों की पूरक क्षमताएँ
- सऊदी अरब: वित्तीय संसाधन, ऊर्जा शक्ति, सामरिक भौगोलिक स्थिति तथा अरब और इस्लामी जगत में व्यापक प्रभाव।
- तुर्किये: क्षेत्र की सबसे सुदृढ़ पारंपरिक सैन्य शक्तियों में से एक तथा तेजी से विकसित होता स्वदेशी रक्षा उद्योग, विशेषकर ड्रोन और मानव रहित प्रणालियों के क्षेत्र में।
- पाकिस्तान: एक बड़ी पेशेवर सेना, सऊदी अरब के साथ व्यापक सैन्य सहयोग का अनुभव और सबसे महत्वपूर्ण रूप से परमाणु हथियार क्षमता।
- यद्यपि यह समझौता औपचारिक रूप से पाकिस्तान की परमाणु सुरक्षा आश्वासन का गठन नहीं करता, फिर भी इसकी उपस्थिति संभावित प्रतिद्वंद्वी की रणनीतिक गणनाओं में पाकिस्तान की सामरिक क्षमताओं को अनिवार्य रूप से शामिल करती है।
तीनों देशों ने यह समझौता क्यों किया?
- सऊदी अरब: सऊदी अरब अपनी तेल अवसंरचना पर हुए हमलों और बार-बार उत्पन्न क्षेत्रीय संकटों के बाद रणनीतिक सुरक्षा-आश्वासन चाहता है। इन घटनाओं ने किसी एक सुरक्षा प्रदाता पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को उजागर किया है।
- सऊदी अरब की व्यापक विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता और साझेदारियों के विविधीकरण पर लगातार अधिक जोर दिया जा रहा है।
- तुर्किये: राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन के नेतृत्व में तुर्किये ने नाटो में बने रहते हुए अधिक रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाई है।
- यह समझौता खाड़ी और दक्षिण एशिया की ओर अंकारा के प्रभाव का विस्तार करता है तथा उसके रक्षा उद्योग के लिए नए अवसर सृजित कर सकता है।
- पाकिस्तान: पाकिस्तान को सऊदी अरब के साथ अपने पारंपरिक रूप से घनिष्ठ सैन्य संबंधों के लिए एक संस्थागत ढाँचा प्राप्त होता है। साथ ही, इससे भारत-केंद्रित सुरक्षा चिंताओं से आगे बढ़कर उसके कूटनीतिक प्रभाव के विस्तार की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के निहितार्थ
- अमेरिका और पश्चिम एशिया के लिए: यह समझौता अमेरिकी प्रभाव के समाप्त होने के बजाय अमेरिका की विशिष्ट सुरक्षा-प्रभुता के अपेक्षाकृत कमजोर होने को दर्शाता है।
- क्षेत्रीय देश तुर्किये, पाकिस्तान, चीन और अन्य शक्तियों के साथ अनेक समानांतर साझेदारियाँ विकसित कर रहे हैं।
- इसलिए यह समझौता मुख्यतः अमेरिका-केंद्रित सुरक्षा संरचना से अधिक बहुध्रुवीय पश्चिम एशियाई सुरक्षा व्यवस्था की ओर संक्रमण को तीव्र कर सकता है।
- ईरान और इजरायल के लिए: इस समझौते को ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव के विरुद्ध उभरते हुए संतुलनकारी तत्व के रूप में देखा जा सकता है, विशेषकर सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा को देखते हुए।
- तुर्किये और पाकिस्तान की सीमाएँ ईरान से लगती हैं तथा दोनों देशों के अपने-अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में अस्थिरता को रोकने में महत्वपूर्ण हित हैं।
- सऊदी वित्तीय शक्ति, तुर्किये की पारंपरिक सैन्य क्षमताओं तथा पाकिस्तान की सैन्य एवं परमाणु क्षमताओं का संयोजन क्षेत्रीय निवारण की गणनाओं को प्रभावित कर सकता है।
भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?
- भारत को इस समझौते को केवल पाकिस्तान के दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए।
- सऊदी अरब ने भारत के साथ आर्थिक, ऊर्जा, निवेश और प्रवासी भारतीयों से संबंधित महत्वपूर्ण संबंध विकसित किए हैं।
- इसलिए रियाद के पास नई दिल्ली के साथ अपने संबंधों को बनाए रखने के सुदृढ़ प्रोत्साहन हैं और भारत-पाकिस्तान के प्रत्येक विवाद में उसके स्वतः पाकिस्तान का समर्थन करने की संभावना नहीं है।
- हालाँकि, कश्मीर पर तुर्किये के दृष्टिकोण तथा पाकिस्तान के साथ उसके राजनीतिक और रक्षा संबंध भारत के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।
- अतः भारत को सऊदी अरब से यह स्पष्टता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए कि पारस्परिक रक्षा संबंधी प्रावधान को भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में लागू नहीं किया जाएगा।
- पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा संरचना का भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, प्रवासी भारतीयों के कल्याण, संपर्क एवं कनेक्टिविटी तथा समुद्री हितों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
- अरब साझेदारों के साथ संबंधों में किसी भी प्रकार की गिरावट भारत के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक लागत उत्पन्न कर सकती है।
भारत के लिए आगे की राह: बहु-संरेखण
- ऊर्जा, निवेश, रक्षा और महत्वपूर्ण अवसंरचना के क्षेत्र में सहयोग के माध्यम से भारत–सऊदी अरब रणनीतिक संबंधों को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- राजनीतिक मतभेदों के बावजूद तुर्किये के साथ कार्यात्मक एवं व्यावहारिक संवाद बनाए रखना चाहिए तथा कश्मीर और पाकिस्तान से संबंधित भारत की चिंताओं को स्पष्ट रूप से उसके समक्ष रखना चाहिए।
- खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को सुदृढ़ किया जाना चाहिए, जिसमें समुद्री सुरक्षा और कनेक्टिविटी पहलों पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं में उलझने के बजाय ईरान, इजरायल और अरब देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए।
- सीमा-पार आतंकवाद और कट्टरपंथ से निपटने के लिए खाड़ी देशों के साथ आतंकवाद-रोधी एवं खुफिया सहयोग को बढ़ाया जाना चाहिए।
- I2U2, भारत–मध्य पूर्व–यूरोप कनेक्टिविटी पहल तथा द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारियों जैसे मंचों का उपयोग करते हुए भारत को उभरती क्षेत्रीय व्यवस्था में एक सक्रिय भागीदार बने रहना चाहिए।
निष्कर्ष
- मक्का समझौते को न तो केवल प्रतीकात्मक मानकर खारिज किया जाना चाहिए और न ही इसे नए ‘पश्चिम एशियाई नाटो’ के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
- इसकी वास्तविक महत्ता क्षेत्रीय रणनीतिक स्वायत्तता के उभरते स्वरूप में निहित है।
- भारत के लिए उचित प्रतिक्रिया चिंता या आशंका नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में शक्ति के सभी प्रमुख केंद्रों के साथ सक्रिय, लचीला और राष्ट्रीय हितों पर आधारित कूटनीतिक जुड़ाव बनाए रखना है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: सऊदी अरब–तुर्किये–पाकिस्तान रक्षा समझौते के भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, ईरान और इजरायल पर पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना कीजिए। इस उभरते हुए भू-राजनीतिक परिदृश्य के प्रति भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? |
स्रोत: BS
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