खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026

पाठ्यक्रम: GS3/खनिज स्रोत

संदर्भ

  • हाल ही में लोकसभा ने खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया। इसका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के निर्णय के बाद खनिज अधिकारों से संबंधित कराधान को अधिक केंद्रीकृत करना है।

भारत में खनन परिदृश्य

  • भारत में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, मैंगनीज, चूना पत्थर तथा कई महत्वपूर्ण खनिजों के पर्याप्त भंडार हैं।
    • खनन क्षेत्र अवसंरचना, विनिर्माण, ऊर्जा सुरक्षा तथा इलेक्ट्रिक वाहनों एवं नवीकरणीय ऊर्जा जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुँच वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की लचीलापन एवं सुरक्षा से तीव्रता से जुड़ती जा रही है। इसलिए खनन क्षेत्र का रणनीतिक महत्व बढ़ गया है।
  • हालाँकि, खनन गतिविधियाँ मुख्यतः ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ तथा पूर्वी-मध्य भारत जैसे खनिज-संपन्न क्षेत्रों में भौगोलिक रूप से केंद्रित हैं।

MMDR अधिनियम, 1957 एवं प्रमुख संशोधन

  • खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR अधिनियम) खानों एवं खनिजों के विकास तथा विनियमन से संबंधित प्रमुख कानून है।
    • समय-समय पर किए गए संशोधनों का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, खनिज रियायतों की नीलामी को बढ़ावा देना, अन्वेषण में वृद्धि करना तथा निवेश आकर्षित करना रहा है।
  • 2015 का संशोधन: खनिज रियायतों को नीलामी-आधारित व्यवस्था की ओर स्थानांतरित किया गया तथा जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास (NMET) जैसे तंत्रों की शुरुआत की गई।
  • 2021 का संशोधन: खनिज उत्पादन को उदार बनाने, खनन पट्टों के बेहतर उपयोग तथा निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी को सुगम बनाने पर बल दिया गया।
  • 2023 का संशोधन: इसमें महत्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिजों पर विशेष ध्यान दिया गया, जो स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा तथा रणनीतिक आपूर्ति शृंखलाओं के लिए इनके बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
  • ये सुधार प्रशासनिक आवंटन से बाजारोन्मुख, पारदर्शी एवं रणनीतिक खनिज शासन व्यवस्था की ओर व्यापक संक्रमण को दर्शाते हैं।

खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 की प्रमुख विशेषताएँ

  • 2026 के विधेयक का मुख्य उद्देश्य 2024 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के वित्तीय प्रभावों में परिवर्तन करना तथा खनिज अधिकारों से संबंधित कराधान के लिए अधिक केंद्रीकृत व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना है।
  • संभावित लाभ:
    • कर संबंधी पूर्वानुमेयता: एक समान कर व्यवस्था से खनन कंपनियों के लिए अनिश्चितता कम हो सकती है।
    • निवेश का वातावरण: पूर्वानुमेय कर व्यवस्था दीर्घकालिक एवं पूंजी-गहन निवेश को प्रोत्साहित कर सकती है।
    • रणनीतिक खनिज: केंद्रीय समन्वय से स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा एवं उन्नत विनिर्माण के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करने में सहायता मिल सकती है।
    • दोहराए गए शुल्कों से बचाव: अधिक मानकीकृत व्यवस्था से विभिन्न राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले अनेक या असंगत वित्तीय भार की संभावना कम हो सकती है।

विधेयक का प्रभाव

  • पूर्व:
    • खनिज-युक्त भूमि संघ के नियामक दायरे से बाहर थी।
    • प्रत्येक राज्य में खनन पर अलग-अलग कर व्यवस्था लागू थी।
    • खनन गतिविधियाँ शुरू होने के बाद भी नए शुल्क लगाए जा सकते थे।
    • किसी भी समय पूर्वव्यापी कर मांगें उठाई जा सकती थीं।
    • इसका अधिकतम भार छोटे एवं मध्यम खननकर्ताओं पर पड़ता था।
  • पश्चात:
    • खनिज-युक्त भूमि को संघ के विनियामक दायरे में लाया गया है।
    • नई धारा 9D के अंतर्गत केंद्र-निर्देशित एकल कर व्यवस्था लागू होगी।
    • केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों के अतिरिक्त राज्य नए शुल्क नहीं लगा सकेंगे।
    • सभी लंबित पूर्वव्यापी देयताओं को अमान्य घोषित किया गया है।
    • प्रत्येक खननकर्ता के लिए न्यायसंगत एवं समान कर व्यवस्था सुनिश्चित होगी।

भारत के खनन क्षेत्र से संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ

  • पर्यावरणीय एवं सामाजिक असमानता: खनन के कारण वनों की कटाई, आवासों का विखंडन, जल प्रदूषण, विस्थापन तथा आजीविका की हानि जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
    • आदिवासी एवं वन-निर्भर समुदायों को अक्सर इन लागतों का बड़ा हिस्सा वहन करना पड़ता है, जबकि उन्हें खनन से प्राप्त आर्थिक लाभ का केवल सीमित हिस्सा मिलता है।
  • राजकोषीय अधिकारों का केंद्रीकरण: यदि राजस्व-साझाकरण एवं स्थानीय लाभ की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ नहीं किया गया, तो वित्तीय अधिकारों का केंद्रीकरण खनिज-संपन्न राज्यों की सौदेबाजी की स्थिति को कमजोर कर सकता है।
  • राजकोषीय संघवाद: यह निर्णय राज्यों की घटती राजकोषीय स्वायत्तता की पृष्ठभूमि में आया है, विशेषकर तब जब GST ने राज्यों की कई कराधान शक्तियों को अपने अंतर्गत समाहित कर लिया है।
    • राज्य पहले से ही करों के हस्तांतरण तथा अनुदानों पर अत्यंत सीमा तक निर्भर हैं।
    • इसलिए किसी महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय के वित्तीय प्रभावों को बदलने के लिए कानून का प्रयोग संघीय प्राधिकार एवं राज्य की स्वायत्तता के बीच संतुलन से संबंधित प्रश्न उठाता है।
  • विकास बनाम सततता: केवल ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ पर अत्यधिक ध्यान देने से पर्यावरणीय एवं सामाजिक बाह्य प्रभावों का पर्याप्त मूल्यांकन किए बिना प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को बढ़ावा मिल सकता है।
    • सतत खनन के लिए आवश्यक है कि आर्थिक दक्षता के साथ पर्यावरणीय न्याय एवं अंतर-पीढ़ीगत समानता को भी सुनिश्चित किया जाए।
भारत के खनन क्षेत्र से संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ

संबंधित संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान

  • अनुच्छेद 246 एवं सातवीं अनुसूची: विधायी शक्तियों का विभाजन संघ एवं राज्यों के बीच किया गया है।
  • संघ सूची की प्रविष्टि 54: संसद को लोकहित में खानों एवं खनिज विकास के विनियमन की शक्ति प्राप्त है।
  • राज्य सूची की प्रविष्टि 50: राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति प्राप्त है, किंतु यह शक्ति संसद द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
    • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (2024) मामले में निर्णय दिया कि रॉयल्टी कर नहीं है तथा राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की संवैधानिक शक्ति है, जो संघ सूची की प्रविष्टि 50 के अंतर्गत संसद की शक्ति के अधीन है।
  • अनुच्छेद 243G: यह पंचायतों को शक्तियों एवं उत्तरदायित्वों के हस्तांतरण का प्रावधान करता है तथा सहभागी स्थानीय शासन के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
  • पाँचवीं अनुसूची: यह अनुसूचित क्षेत्रों एवं जनजातीय समुदायों के लिए विशेष शासन व्यवस्था का प्रावधान करती है।
  • पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA): यह अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की भागीदारी को सुदृढ़ करता है, जिसमें सामुदायिक संसाधनों को प्रभावित करने वाले विषय भी शामिल हैं।

आगे की राह: सुदृढ़ीकरण के उपाय

  • उद्देश्य निवेश और संघवाद में से किसी एक का चयन करना नहीं, बल्कि दोनों के बीच उचित समन्वय स्थापित करना होना चाहिए।
  • खनिज-संपन्न राज्यों के वैध हितों की रक्षा करते हुए पूर्वानुमेय एवं पारदर्शी राष्ट्रीय राजकोषीय ढाँचा स्थापित किया जाना चाहिए।
  • जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) तथा प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) के प्रभावी क्रियान्वयन को सुदृढ़ किया जाना चाहिए, जिसमें समुदाय की अधिक भागीदारी तथा परिणाम-आधारित निगरानी सुनिश्चित हो।
  • पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA), वन अधिकार अधिनियम तथा पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • खनिज-उत्पादक राज्यों एवं प्रभावित समुदायों के साथ खनिज राजस्व के न्यायसंगत एवं समान वितरण के लिए उपयुक्त तंत्र विकसित किए जाने चाहिए।
  • पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, खदानों का समापन तथा पुनर्वास को खनन की आर्थिक व्यवस्था का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।
  • खनिज राजस्व को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत परिवर्तनों पर केंद्र एवं राज्यों के बीच संस्थागत परामर्श तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

  • खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 एक व्यापक संवैधानिक दुविधा को रेखांकित करता है कि आर्थिक दक्षता लोकतांत्रिक जवाबदेही एवं राजकोषीय संघवाद की कीमत पर हासिल नहीं की जा सकती।
  • भारत की रणनीतिक एवं आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पूर्वानुमेय खनन व्यवस्था आवश्यक है। हालांकि, इसकी वैधता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि खनिज-संपन्न राज्यों एवं प्रभावित समुदायों को खनिज संसाधनों से प्राप्त लाभों में न्यायसंगत हिस्सा मिलता है या नहीं।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत में खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के केंद्र–राज्य संबंधों, खनन से प्रभावित समुदायों तथा सतत खनिज विकास पर पड़ने वाले प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

स्रोत: HT

 

Other News

पाठ्यक्रम: GS2/शिक्षा से जुड़े मुद्दे संदर्भ भारत में प्रतिभाओं की प्रचुरता के बावजूद देश के विश्वविद्यालय प्रमुख वैश्विक रैंकिंग में अभी भी पीछे हैं, जबकि चीन, सिंगापुर और हांगकांग के संस्थानों ने अनुसंधान, स्वायत्तता तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के क्षेत्र में तीव्रता से अपनी स्थिति सुदृढ़ की है। भारत में उच्च...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध संदर्भ हाल ही में मक्का में हस्ताक्षरित सऊदी अरब–तुर्किये–पाकिस्तान पारस्परिक रक्षा समझौता (मक्का संयुक्त रक्षा समझौता) क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग में बढ़ती निकटता तथा अमेरिका-प्रधान सुरक्षा व्यवस्थाओं से हटकर रणनीतिक संतुलन स्थापित करने की संभावित दिशा का संकेत देता है। सऊदी अरब–तुर्किये–पाकिस्तान रक्षा समझौते के बारे में इस...
Read More

पाठ्यक्रम: GS1/ भारतीय विरासत और संस्कृति, GS3/ अर्थव्यवस्था संदर्भ राष्ट्रीय हथकरघा दिवस, जो प्रत्येक वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है, 1905 के स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में मनाया जाता है। यह भारत के आर्थिक प्रतिरोध, सांस्कृतिक पहचान, ग्रामीण रोजगार और सतत विकास में हथकरघा क्षेत्र की भूमिका को रेखांकित...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था; वित्तीय समावेशन संदर्भ भारत में डिजिटल ऋण के तीव्र विस्तार ने वित्तीय समावेशन में सुधार किया है, लेकिन प्रभावी उधार लागत के अधिक होने तथा एक साथ कई असुरक्षित ऋण लेने की बढ़ती प्रवृत्ति ने उपभोक्ता संरक्षण से संबंधित कुछ कमियों को उजागर किया है। भारत की डिजिटल...
Read More

पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन; जीएस-3/खाद्य सुरक्षा सन्दर्भ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 में एक प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के लाभ को प्रति परिवार 35 किग्रा से घटाकर प्रति व्यक्ति 7 किग्रा करना है (प्रति परिवार अधिकतम 35 किग्रा की सीमा के अधीन)। छोटे और वंचित परिवारों को...
Read More

पाठ्यक्रम: जीएस-3/कृषि  सन्दर्भ खाड़ी संघर्ष, वैश्विक उर्वरक एवं ऊर्जा बाज़ारों में उतार-चढ़ाव, तथा एल नीनो के कारण बढ़ते जलवायु तनाव के जोखिम ने भारतीय कृषि को सुदृढ़ बनाने और बाहरी निवेशों पर निर्भरता कम करने के उपाय के रूप में प्राकृतिक खेती (natural farming) में रुचि को पुनः बढ़ावा दिया...
Read More

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था सन्दर्भ डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में गठित 16वें वित्त आयोग (16th Finance Commission) ने वर्ष 2026–31 के लिए अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की। इसने कर हस्तांतरण और अनुदानों में व्यापक सुधारों की सिफारिश की, जिससे राजकोषीय संघवाद, समानता तथा केंद्र–राज्य संबंधों पर विवाद उत्पन्न हो गया। भारत में...
Read More
scroll to top