पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
सन्दर्भ
- नीट-यूजी 2024 प्रश्नपत्र लीक ने भारत में प्रणालीगत भ्रष्टाचार और संस्थागत जवाबदेही पर चर्चा को पुनः प्रज्वलित कर दिया, जिससे पारदर्शिता, शासन सुधारों तथा भ्रष्टाचार-रोधी उपायों की प्रभावशीलता पर नई बहस शुरू हुई।
भारत में भ्रष्टाचार
- भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत, निजी या किसी अनधिकृत समूह के लाभ के लिए सौंपी गई शक्ति या अधिकार का दुरुपयोग है।
- इसमें प्रभावशाली पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा किया गया बेईमानीपूर्ण या अनैतिक आचरण शामिल होता है तथा यह सरकारों, व्यवसायों और नागरिक समाज में विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है।
- यह सार्वजनिक सेवाओं की आपूर्ति, सार्वजनिक खरीद (Public Procurement), नियामकीय निर्णयों, चुनावों तथा कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित करता है।
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 में संशोधित) के अनुसार, भ्रष्टाचार में रिश्वतखोरी, लोक सेवकों द्वारा आपराधिक कदाचार तथा आधिकारिक पद का दुरुपयोग शामिल है।
- ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (Corruption Perceptions Index) 2025 के अनुसार, भारत को 39/100 अंक (जहाँ 0 का अर्थ अत्यधिक भ्रष्ट तथा 100 का अर्थ अत्यंत स्वच्छ है) के साथ विश्व के 182 देशों में 91वाँ स्थान प्राप्त हुआ है।
भ्रष्टाचार एवं भ्रष्ट आचरण के पीछे के कारण
- संस्थागत कमजोरी: जाँच और अभियोजन में देरी के कारण दंडात्मक प्रभाव कमजोर पड़ जाता है। जाँच एजेंसियों की सीमित स्वायत्तता अक्सर चयनात्मक प्रवर्तन (Selective Enforcement) को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करती है।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के अंतर्गत, लोक सेवकों द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों की जाँच के लिए पूर्व सरकारी स्वीकृति की आवश्यकता होती है।
- प्रशासनिक विवेकाधिकार एवं लालफीताशाही: जटिल प्रक्रियाएँ, अत्यधिक विनियम तथा नौकरशाही में देरी, किराया-लाभ की प्रवृत्ति (Rent-Seeking) और रिश्वतखोरी को बढ़ावा देती हैं।
- कमज़ोर पारदर्शिता ढाँचा: आशंका है कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित छूट का विस्तार करके सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के दायरे को कमजोर कर सकता है।
- न्यायिक विलंब: भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों के निपटारे में वर्षों लग जाते हैं, जिससे भ्रष्टाचार एक उच्च-लाभ, कम-जोखिम वाली गतिविधि बन जाता है।
- राजनीतिक भ्रष्टाचार: भाई-भतीजावादी पूँजीवाद (Crony Capitalism), अपारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण तथा चुनावी वित्तपोषण से जनता का विश्वास कमजोर हो रहा है।
- डिजिटल विभाजन: हाशिए पर रहने वाले नागरिकों को ऑनलाइन सेवाओं तक पहुँचने के लिए अक्सर बिचौलियों की आवश्यकता पड़ती है, जिससे दुरुपयोग के नए अवसर पैदा होते हैं, जबकि डिजिटल शासन ने छोटे स्तर के कुछ भ्रष्टाचार को कम किया है।
भ्रष्टाचार के प्रभाव
- शासन पर प्रभाव: लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है, प्रशासनिक प्रभावशीलता को घटाता है तथा सरकार के प्रति जनता के विश्वास को कम करता है।
- आर्थिक प्रभाव: परियोजनाओं की लागत बढ़ाता है, निवेश को हतोत्साहित करता है तथा बाज़ार में प्रतिस्पर्धा को विकृत करता है। यह भाई-भतीजावादी पूँजीवाद (Crony Capitalism) और संसाधनों के अकुशल आवंटन को बढ़ावा देता है।
- सामाजिक प्रभाव: नागरिकों को स्वास्थ्य, शिक्षा, पेंशन और खाद्य सुरक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं से वंचित करता है। कमजोर एवं वंचित वर्गों पर असमान रूप से अधिक प्रभाव डालकर असमानता को बढ़ाता है।
- राजनीतिक प्रभाव: चुनावी अखंडता और जवाबदेही को कमजोर करता है तथा सार्वजनिक पद के पक्षपातपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करता है।
- विधि के शासन पर प्रभाव: चयनात्मक न्याय तथा न्याय प्रशासन में विलंब संवैधानिक शासन और जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं।
क्या डिजिटलीकरण ने भ्रष्टाचार को कम किया है?
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) + JAM त्रयी (जन धन–आधार–मोबाइल): वर्ष 2013 में शुरू की गई DBT व्यवस्था, आधार प्रमाणीकरण के माध्यम से सब्सिडी सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजती है, जिससे पहले कल्याणकारी निधियों में हेराफेरी करने वाले बिचौलियों के नेटवर्क को समाप्त किया गया।
- आधार-आधारित पहचान सत्यापन: आधार के माध्यम से डिजिटल भुगतान और बायोमेट्रिक पहचान ने रोजगार, पेंशन तथा ईंधन सब्सिडी कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार को कम किया है।
- उदाहरण: आधार सीडिंग के माध्यम से डिजिटल सत्यापन के परिणामस्वरूप सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के अंतर्गत लगभग 5.87 करोड़ अपात्र राशन कार्ड समाप्त कर दिए गए।
- सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) द्वारा खरीद प्रणाली: GeM विनिर्देशों का मानकीकरण करता है, प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया को सक्षम बनाता है तथा एक ऑडिट ट्रेल तैयार करता है, जिससे खरीद प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की संभावनाओं वाले विवेकाधीन बिंदु कम हो जाते हैं।
- फेसलेस कर निर्धारण एवं जीएसटी: वर्ष 2018 से लागू आयकर की फेसलेस ई-आकलन प्रणाली में कर अधिकारी और करदाता के बीच आमने-सामने संपर्क नहीं होता, जिससे रिश्वतखोरी के एक प्रमुख माध्यम को समाप्त किया गया है।
- कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) एवं डिजिलॉकर (DigiLocker): CSC डिजिटल सेवा वितरण केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं और 5.2 लाख से अधिक केंद्रों के माध्यम से 80 करोड़ से अधिक नागरिकों को सेवाएँ प्रदान करते हैं। वहीं, डिजिलॉकर नागरिकों को आधार, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेज़ों का डिजिटल रूप में सुरक्षित भंडारण और साझा करने की सुविधा देता है, जहाँ सरकारी संस्थानों द्वारा API-आधारित प्रत्यक्ष दस्तावेज़ जारी किए जाते हैं।
चुनौतियाँ
- बहिष्करण संबंधी त्रुटियों को “भ्रष्टाचार-रोधी सफलता” मान लेना: J-PAL के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि झारखंड सरकार द्वारा आधार से लिंक न होने के कारण रद्द किए गए 88% राशन कार्ड वास्तव में पात्र और वास्तविक परिवारों के थे, न कि “फर्जी” लाभार्थियों के।
- डिजिटलीकरण बड़े स्तर के भ्रष्टाचार तक नहीं पहुँच पाया है: भूमि आवंटन, पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ, निर्माण परमिट तथा बड़े ठेकों में अब भी व्यापक मानवीय विवेकाधिकार मौजूद है। डिजिटल परिवर्तन ने छोटे स्तर की रिश्वतखोरी को तो कम किया है, लेकिन प्रणालीगत एवं उच्च-स्तरीय भ्रष्टाचार पर इसका प्रभाव सीमित रहा है।
- डिजिटल विभाजन एक बाधा के रूप में: डिजिटल विभाजन के कारण नए प्रकार के बिचौलिए उभर रहे हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में ग्रामीण और वंचित नागरिक सरकारी सेवाओं तक पहुँचने के लिए साइबर कैफ़े या एजेंटों पर निर्भर हैं।
- डिजिटल माध्यमों से किराया-लाभ (Rent-Seeking) के नए रूप: अब बिचौलिए लोगों से पोर्टलों का उपयोग करने, बायोमेट्रिक विफलताओं का समाधान करने या आधार अपडेट कराने में सहायता के नाम पर शुल्क वसूलते हैं, जिससे तकनीक के इर्द-गिर्द पुनः एक बिचौलिया-आधारित व्यवस्था विकसित हो गई है।
भारत में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हेतु किए गए विधायी एवं शासन संबंधी सुधार
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005: यह भारत के सबसे सशक्त पारदर्शिता कानूनों में से एक है, जिसने नागरिकों को सरकारों को जवाबदेह बनाने का अधिकार दिया है।
- इसने व्यापम भर्ती घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला, चुनावी बॉण्ड से संबंधित खुलासों तथा कल्याणकारी योजनाओं एवं सार्वजनिक खरीद में हुई अनेक अनियमितताओं को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत प्रतिवर्ष लगभग 60 लाख आवेदन प्राप्त होते हैं, जिससे यह विश्व के सबसे लोकप्रिय पारदर्शिता कानूनों में से एक बन गया है।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 में संशोधित): इसका उद्देश्य लोक सेवकों एवं वाणिज्यिक संस्थाओं के बीच भ्रष्टाचार को रोकना है।
- भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 को भारतीय कानूनों को संयुक्त राष्ट्र भ्रष्टाचार-विरोधी अभिसमय (UNCAC) के अनुरूप बनाने तथा रिश्वतखोरी के माँग और आपूर्ति, दोनों पक्षों से निपटने के लिए तैयार किया गया है।
- लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013: यह लोक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच हेतु वैधानिक निगरानी संस्थाओं की स्थापना का प्रावधान करता है।
- इसके अंतर्गत केंद्र स्तर पर लोकपाल तथा सभी राज्यों में लोकायुक्तों की स्थापना का प्रावधान किया गया है।
- व्हिसलब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2014: इसका उद्देश्य लोक सेवकों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार, शक्ति के दुरुपयोग या आपराधिक कृत्यों से संबंधित शिकायतों को स्वीकार करना तथा शिकायतकर्ता (व्हिसलब्लोअर) की पहचान की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
- बेनामी लेनदेन (निषेध) संशोधन अधिनियम, 2016: इसका उद्देश्य काले धन पर अंकुश लगाना, पारदर्शिता बढ़ाना तथा वित्तीय धोखाधड़ी से मुकाबला करना है।
- धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA): इसका उद्देश्य धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) को रोकना, धन शोधन से अर्जित संपत्ति को जब्त करना तथा वित्तीय अपराधों का मुकाबला करना है।
- संस्थागत उपाय: केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), केंद्रीय सूचना आयोग (CIC), भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) आदि।
- शासन संबंधी सुधार: डिजिटल इंडिया एवं ई-गवर्नेंस पहल, सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM), प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), लोक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) तथा आधार-सक्षम सेवा वितरण के माध्यम से रिसाव (Leakages) को कम करने के प्रयास।
संबंधित समितियाँ एवं सुधार
- संथानम समिति (1964): इसने केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की स्थापना की आधारशिला रखी।
- होता समिति (2004): इसने सिविल सेवा सुधारों तथा लोक प्रशासन में सत्यनिष्ठा (Integrity) को सुदृढ़ करने की सिफारिश की।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (Second ARC): नैतिक शासन और जवाबदेही में सुधार पर बल दिया।
- विवेकाधिकार को कम करने तथा प्रक्रियाओं को सरल बनाने की सिफारिश की।
- व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा सतर्कता तंत्र को सुदृढ़ करने पर बल दिया।
- विधि आयोग (Law Commission): भ्रष्टाचार-रोधी कानूनों में शीघ्र सुनवाई, संस्थाओं की स्वतंत्रता तथा अधिक पारदर्शिता पर जोर दिया।
आगे की राह: भ्रष्टाचार-रोधी अभियान को और सशक्त बनाना
- पारदर्शिता को बढ़ावा देते हुए तथा निजता संबंधी चिंताओं में संतुलन बनाए रखते हुए सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम को मजबूत किया जाए।
- सूचना आयोगों के रिक्त पद भरे जाएँ तथा नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए।
- सीबीआई, ईडी, लोकपाल तथा सतर्कता संस्थाओं जैसी एजेंसियों की स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए।
- समयबद्ध शिकायत निवारण के साथ प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए।
- भ्रष्टाचार के मामलों के त्वरित निपटारे हेतु समर्पित न्यायालयों द्वारा एक वर्ष के भीतर मामलों का निपटारा सुनिश्चित किया जाए।
- राजनीतिक वित्तपोषण तथा सार्वजनिक खरीद प्रणाली में अधिक पारदर्शिता लाई जाए।
- डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दिया जाए तथा सेवा केंद्रों को सुदृढ़ किया जाए, ताकि डिजिटल समावेशन बढ़े और बिचौलियों द्वारा होने वाले शोषण से बचा जा सके।
- सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit), स्वप्रेरित प्रकटीकरण (Proactive Disclosure) तथा व्हिसलब्लोअर्स की बेहतर सुरक्षा के माध्यम से नागरिकों की भागीदारी बढ़ाई जाए।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (Second ARC) की सिफारिशों को लागू कर तथा लोक प्रशासन में सत्यनिष्ठा को बढ़ावा देकर नैतिक शासन को सुदृढ़ किया जाए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत में भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों की चर्चा कीजिए। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, लोकपाल, डिजिटल शासन पहलों तथा सतर्कता संस्थाओं जैसे वर्तमान भ्रष्टाचार-रोधी तंत्रों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए। |
स्रोत: TH
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