भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार हेतु ऊर्जा भंडारण

पाठ्यक्रम: GS3 / ऊर्जा अवसंरचना

संदर्भ

  • विद्युत उत्पादन और उपभोग के बीच असंतुलन ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (ESS) को ग्रिड की स्थिरता, विश्वसनीयता तथा नवीकरणीय ऊर्जा के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य बनाता है।

भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता

  • भारत अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं तथा ऊर्जा सुरक्षा संबंधी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का तीव्र विस्तार कर रहा है।                        
  • नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत भारत की स्थापित विद्युत क्षमता का लगभग 53% (532 गीगावाट में से 283 गीगावाट) हिस्सा हैं।
  • इसमें सौर ऊर्जा का योगदान 150 गीगावाट से अधिक है।
  • तथापि, नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करती है, जिसे अंतरायिकता कहा जाता है। इसका आशय ऊर्जा उत्पादन के निरंतर न होकर असतत रूप से अथवा अनियमित अंतराल पर होने से है।

ऊर्जा भंडारण क्या है?

  • ऊर्जा भंडारण उन प्रौद्योगिकियों को संदर्भित करता है जो नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के उच्च स्तर वाले समय में उत्पन्न अतिरिक्त विद्युत को संग्रहित करती हैं तथा मांग आपूर्ति से अधिक होने पर उसे पुनः उपलब्ध कराती हैं।
    • यह विद्युत उत्पादन और उपभोग के बीच एक बफर के रूप में कार्य करता है।
  • ऊर्जा भंडारण के प्रमुख लाभ:
    • विद्युत आपूर्ति और मांग के बीच संतुलन स्थापित करना।
    • नवीकरणीय ऊर्जा की कटौती को कम करना।
    • ग्रिड की विश्वसनीयता में वृद्धि करना।
    • चरम भार प्रबंधन में सहायता करना।
    • चौबीसों घंटे नवीकरणीय ऊर्जा आपूर्ति को संभव बनाना।

वैश्विक परिदृश्य

  • पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS): वैश्विक स्थापित क्षमता लगभग 160 गीगावाट है।
    • अग्रणी देश:
      • चीन (~66 गीगावाट)
      • जापान (~21.8 गीगावाट)
      • संयुक्त राज्य अमेरिका (~18.9 गीगावाट)
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण : वैश्विक बैटरी भंडारण क्षमता लगभग 270 गीगावाट आंकी गई है।
    • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, वर्ष 2025 में 108 गीगावाट नई बैटरी भंडारण क्षमता जोड़ी गई, जो वर्ष 2024 की तुलना में 40% अधिक है।
    • वैश्विक वृद्धि में लगभग 60% योगदान चीन का रहा, जिसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप का स्थान है।
    • ऑस्ट्रेलिया तथा मध्य-पूर्व में भी ऊर्जा भंडारण की तैनाती तीव्रता से बढ़ रही है, जहाँ इसे ऊर्जा सुरक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत में ऊर्जा भंडारण की स्थिति

  • वर्तमान स्थापित क्षमता: 
    • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS): ~0.27 गीगावाट
    • पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS): ~7.2 गीगावाट
  • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) का 2035-36 हेतु अनुमान: वर्ष 2035-36 तक कुल ऊर्जा भंडारण आवश्यकता: 174 गीगावाट / 888 गीगावाट-घंटा (GWh)
    • जिसमें: BESS: 80 गीगावाट / 321 GWh, PHS: 94 गीगावाट / 567 GWh
  • 2030 के पश्चात नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती मात्रा को ग्रिड में समाहित करने के लिए 4–6 घंटे की अवधि वाले ऊर्जा भंडारण तंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।

विस्ताराधीन परियोजनाएँ

  • पम्प्ड हाइड्रो परियोजनाएँ: 13,120 मेगावाट क्षमता निर्माणाधीन।
    • 9,580 मेगावाट क्षमता स्वीकृत, किंतु निर्माण प्रारंभ होना शेष।
    • लगभग 75,000 मेगावाट क्षमता सर्वेक्षण एवं जांचाधीन।
  • बैटरी भंडारण परियोजनाएँ: 10,658.94 मेगावाट / 28,739.32 मेगावाट-घंटा क्षमता निर्माणाधीन।
    • 22,347.15 मेगावाट / 69,836.70 मेगावाट-घंटा क्षमता निविदा प्रक्रिया में।

प्रमुख ऊर्जा भंडारण प्रौद्योगिकियाँ

  • पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS): यह विश्व स्तर पर सबसे परिपक्व तथा व्यापक रूप से प्रयुक्त बड़े पैमाने की ऊर्जा भंडारण तकनीक है।
    • लाभ: दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण के लिए उपयुक्त।
      • उच्च विश्वसनीयता एवं लंबा परिचालन जीवन।
      • बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण की क्षमता।
    • सीमाएँ: विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों की आवश्यकता।
      • उच्च प्रारंभिक पूंजी निवेश।
      • पर्यावरणीय एवं भूमि अधिग्रहण संबंधी चुनौतियाँ।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS): यह विद्युत को विद्युत-रासायनिक रूप में संग्रहित करती है तथा आवश्यकता पड़ने पर उसे पुनः विद्युत के रूप में उपलब्ध कराती है।
    • लिथियम-आयन बैटरियाँ, विशेषकर लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियाँ, वैश्विक बाजार में प्रमुख हैं।
    • वर्ष 2025 में वैश्विक बैटरी भंडारण क्षमता में हुई वृद्धि का 90% से अधिक योगदान इन्हीं बैटरियों का रहा।
    • लाभ: तीव्र प्रतिक्रिया समय।
      • मॉड्यूलर तैनाती की सुविधा।
      • अल्पावधि (4–6 घंटे) ऊर्जा भंडारण के लिए उपयुक्त।
    • सीमाएँ: महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता।
      • समय के साथ बैटरियों का क्षरण।
      • सेल एवं घटकों के लिए आयात पर निर्भरता।

अन्य उभरती हुई ऊर्जा भंडारण प्रौद्योगिकियाँ

  •  सघन सौर तापीय भंडारण : इस तकनीक में दर्पणों और पिघले हुए लवणों के माध्यम से सौर ऊष्मा को संग्रहित किया जाता है, जिसे बाद में विद्युत उत्पादन हेतु उपयोग किया जाता है।
  • संपीड़ित वायु ऊर्जा भंडारण (CAES): इसमें संपीड़ित वायु को भूमिगत गुफाओं अथवा संरचनाओं में संग्रहित किया जाता है तथा चरम मांग के समय टर्बाइनों को चलाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
  • फ्लाईव्हील ऊर्जा भंडारण : इस तकनीक में तीव्र गति से घूमने वाले रोटरों में ऊर्जा संग्रहित की जाती है, जो ग्रिड स्थिरीकरण के लिए तत्काल विद्युत सहायता प्रदान करते हैं।
  • गुरुत्वाकर्षण-आधारित ऊर्जा भंडारण : इसमें भारी वस्तुओं को ऊपर उठाकर ऊर्जा संग्रहित की जाती है तथा उनके नीचे आने पर विद्युत का उत्पादन किया जाता है।

भारत में ऊर्जा भंडारण के समक्ष चुनौतियाँ

  • आयात पर निर्भरता: भारत में प्रयुक्त लिथियम-आयन सेल का लगभग 75–80% आयात किया जाता है, जबकि बैटरी प्रणाली की कुल लागत में सेल का योगदान लगभग 80% होता है।
    • इससे भू-राजनीतिक तनावों, आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों, व्यापारिक प्रतिबंधों तथा मूल्य अस्थिरता से संबंधित जोखिम उत्पन्न होते हैं।
  • उच्च पूंजीगत लागत: बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) के लिए पर्याप्त प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता होती है।
    • यद्यपि वैश्विक स्तर पर बैटरियों की कीमतों में कमी आ रही है, फिर भी बड़े पैमाने पर इनकी तैनाती अभी भी महंगी है।
  • सीमित घरेलू विनिर्माण क्षमता: उन्नत बैटरी सेल एवं अन्य महत्वपूर्ण घटकों का घरेलू उत्पादन अभी भी अपर्याप्त है।
    • आयातित प्रौद्योगिकी पर निर्भरता आत्मनिर्भरता तथा लागत प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करती है।
  • महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता संबंधी बाधाएँ: लिथियम, कोबाल्ट, निकेल तथा ग्रेफाइट बैटरी निर्माण के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिज हैं।
    • भारत में इन खनिजों के सीमित भंडार उपलब्ध हैं, जिसके कारण देश आयात पर निर्भर है।
  • भूमि एवं पर्यावरणीय चिंताएँ: पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज परियोजनाओं (PSPs) के लिए व्यापक भूमि क्षेत्र तथा उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों की आवश्यकता होती है।
    • पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ, जैव विविधता संरक्षण संबंधी चिंताएँ तथा विस्थापन के मुद्दे परियोजनाओं में विलंब का कारण बन सकते हैं।
  • पम्प्ड हाइड्रो परियोजनाओं की लंबी विकास अवधि: पम्प्ड हाइड्रो परियोजनाओं में विस्तृत सर्वेक्षण, विभिन्न अनुमोदन प्रक्रियाएँ तथा लंबी निर्माण अवधि शामिल होती है।
    • इनमें होने वाला विलंब नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण की गति को प्रभावित कर सकता है।
  • ग्रिड एकीकरण संबंधी चुनौतियाँ: ऊर्जा भंडारण प्रणालियों को वर्तमान पारेषण एवं वितरण नेटवर्क में एकीकृत करने के लिए व्यापक अवसंरचनात्मक उन्नयन की आवश्यकता होती है।
    • साथ ही, इनके संचालन एवं विनियमन से संबंधित ढाँचे अभी विकासशील अवस्था में हैं।
  • वित्तपोषण एवं निवेश संबंधी जोखिम राजस्व स्रोतों तथा बाजार तंत्रों को लेकर अनिश्चितता निजी निवेश को हतोत्साहित कर सकती है।
    • इसके अतिरिक्त, लंबी निवेश-वसूली अवधि वित्तीय जोखिमों को बढ़ाती है।
  • बैटरी निपटान एवं पुनर्चक्रण संबंधी समस्याएँ: बड़े पैमाने पर बैटरी तैनाती के परिणामस्वरूप भविष्य में भारी मात्रा में बैटरी अपशिष्ट उत्पन्न होगा।
    • भारत का बैटरी पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र अभी विकास के चरण में है।
  • विनियामक एवं नीतिगत अंतराल: ऊर्जा भंडारण की खरीद, मूल्य निर्धारण तथा ग्रिड सेवाओं के लिए मानकीकृत विनियम अभी विकसित किए जा रहे हैं।
    • नीतिगत अनिश्चितता निवेश एवं प्रौद्योगिकी अपनाने की गति को धीमा कर सकती है।
  • तकनीकी निर्भरता: उन्नत बैटरी प्रौद्योगिकियाँ तथा विनिर्माण संबंधी विशेषज्ञता कुछ सीमित देशों में केंद्रित हैं।
    • यह स्थिति ऊर्जा भंडारण क्षेत्र में भारत की तकनीकी स्वायत्तता को सीमित करती है।
  • भविष्य में बढ़ती मांग: नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार के साथ ऊर्जा भंडारण की आवश्यकता में तीव्र वृद्धि होने की संभावना है।
    • आवश्यक गति से ऊर्जा भंडारण अवसंरचना का विस्तार करना एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है।

भारत में ऊर्जा भंडारण को प्रोत्साहन देने हेतु पहल एवं प्रयास

  • राष्ट्रीय ऊर्जा भंडारण आवश्यकता नियोजन: केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने वर्ष 2035-36 तक 174 गीगावाट / 888 गीगावाट-घंटा ऊर्जा भंडारण क्षमता की आवश्यकता का अनुमान लगाया है।
    • यह ग्रिड में बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण के लिए एक स्पष्ट रोडमैप प्रदान करता है।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) हेतु व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) इसका उद्देश्य परियोजनाओं को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाना, ऊर्जा भंडारण लागत को कम करना तथा तैनाती की गति को बढ़ाना है।
  • उन्नत रसायन सेल (ACC) बैटरियों हेतु उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: यह योजना उन्नत रसायन सेल (ACC) के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करती है।
    • इसके माध्यम से आयातित बैटरी सेल पर निर्भरता कम होती है तथा घरेलू मूल्य शृंखला को सुदृढ़ बनाया जाता है।
  • उन्नत रसायन सेल (ACC) बैटरी भंडारण पर राष्ट्रीय कार्यक्रम: यह कार्यक्रम अगली पीढ़ी की बैटरी प्रौद्योगिकियों के स्वदेशी निर्माण को प्रोत्साहन देता है।
    • साथ ही, यह तकनीकी आत्मनिर्भरता एवं ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
  • पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाओं (PSPs) का विकास: पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज परियोजनाओं की स्वीकृति एवं निर्माण प्रक्रियाओं को तीव्र गति प्रदान की जा रही है।
    • कई परियोजनाएँ निर्माणाधीन हैं, जबकि अनेक अन्य सर्वेक्षण एवं जांच के चरण में हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण दायित्व (ESO): विद्युत मंत्रालय द्वारा इसे नवीकरणीय क्रय दायित्वों (RPOs) के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है।
    • इसके अंतर्गत निर्दिष्ट संस्थाओं को ऊर्जा भंडारण समर्थित नवीकरणीय स्रोतों से एक निश्चित अनुपात में विद्युत खरीदना अनिवार्य किया गया है।
  • हरित ऊर्जा गलियारा कार्यक्रम: यह कार्यक्रम नवीकरणीय ऊर्जा एवं ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के एकीकरण हेतु पारेषण अवसंरचना को सुदृढ़ बनाता है।
    • साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा के कुशल हस्तांतरण को सुगम बनाता है।
  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: यह मिशन नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से हरित हाइड्रोजन उत्पादन को प्रोत्साहित करता है।
    • भविष्य में हाइड्रोजन दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण के एक प्रभावी माध्यम के रूप में कार्य कर सकता है।
  • पीएम सूर्य घर : मुफ्त बिजली योजना: यह योजना रूफटॉप सौर ऊर्जा एवं विकेन्द्रीकृत ऊर्जा संसाधनों को प्रोत्साहन देती है।
    • इसके माध्यम से भविष्य में घरेलू स्तर पर बैटरी भंडारण प्रणालियों के एकीकरण की संभावनाएँ उत्पन्न होती हैं।
  • बैटरी अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2022: इन नियमों के अंतर्गत बैटरी निर्माताओं के लिए विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) की व्यवस्था की गई है।
    • यह पुनर्चक्रण, संसाधन पुनर्प्राप्ति तथा सतत बैटरी निपटान को प्रोत्साहित करता है।
  • महत्वपूर्ण खनिज रणनीति: भारत विदेशी खनिज परिसंपत्तियों को सुरक्षित करने तथा लिथियम एवं अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की घरेलू खोज को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
    • यह दीर्घकालिक बैटरी विनिर्माण एवं ऊर्जा भंडारण विस्तार को समर्थन प्रदान करता है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: भारत, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) जैसी पहलों तथा स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी साझेदारियों में सक्रिय भागीदारी कर रहा है।
    • इससे प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निवेश आकर्षण तथा सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं के आदान-प्रदान को प्रोत्साहन मिलता है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: विद्युत ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण में ऊर्जा भंडारण प्रणालियों की भूमिका का विवेचन कीजिए। भारत में ऊर्जा भंडारण क्षमता के विस्तार से संबंधित चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। 

स्रोत: IE

 

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