पंचायतों का सशक्तीकरण: मात्र अति-स्थानीय (Hyperlocal) प्रतिनिधित्व से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होंगे 

पाठ्यक्रम: राजव्यवस्था एवं शासन; स्थानीय स्वशासन

संदर्भ

  • हाल ही में नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (NBER) द्वारा लगभग 12 लाख वार्ड सदस्यों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने मात्र से शासन-प्रदर्शन या कल्याणकारी योजनाओं के वितरण में उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है।

भारत में शासन व्यवस्था में पंचायतों एवं ‘अति-स्थानीय’ (हाइपरलोकल) प्रतिनिधियों की भूमिका

  • पंचायतें कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन (जैसे- मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण, जल जीवन मिशन), ग्रामीण अवसंरचना विकास, जल एवं स्वच्छता प्रबंधन, सामाजिक न्याय एवं शिकायत निवारण, तथा स्थानीय नियोजन एवं सहभागी लोकतंत्र को प्रोत्साहन देने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों का निर्वहन करती हैं।
  • संवैधानिक पृष्ठभूमि: वर्ष 1992 के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को शासन के तृतीय स्तर के रूप में संस्थागत स्वरूप प्रदान किया गया।
    • इसका उद्देश्य विकेंद्रीकरण तथा सहभागी शासन के माध्यम से लोकतंत्र को अधिक गहन एवं सुदृढ़ बनाना था।
  • प्रमुख विशेषताएँ: त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था: ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर), पंचायत समिति (खंड/ब्लॉक स्तर) तथा जिला परिषद (जिला स्तर)।
    • प्रत्येक पाँच वर्ष में नियमित चुनाव।
    • अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) तथा महिलाओं के लिए आरक्षण।
    • राज्य वित्त आयोगों (SFCs) का गठन।
    • ग्राम सभा को स्थानीय लोकतंत्र की आधारभूत इकाई के रूप में मान्यता।

‘अति-स्थानीय’ (हाइपरलोकल) प्रतिनिधि 

  • वार्ड सदस्य अत्यंत छोटे निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित होते हैं और प्रायः केवल कुछ सौ नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे स्थानीय आवश्यकताओं की प्रभावी पहचान करें, जवाबदेही को सुदृढ़ बनाएं, कल्याणकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन को सुनिश्चित करें तथा नागरिक सहभागिता को प्रोत्साहन दें।

भारत में पंचायतों के समक्ष प्रमुख चिंताएँ एवं चुनौतियाँ

  • कमजोर प्रशासनिक क्षमता: विभिन्न वार्ड सदस्यों की औपचारिक शिक्षा सीमित होती है। साथ ही कल्याणकारी योजनाओं के प्रशासन संबंधी प्रशिक्षण का अभाव तथा डिजिटल शासन प्रणालियों की अपर्याप्त समझ भी एक बड़ी चुनौती है।
    • परिणामस्वरूप, निर्वाचित प्रतिनिधियों को योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  •  वित्तीय स्वायत्तता का अभाव: पंचायतों की कुल आय का केवल लगभग 1 प्रतिशत हिस्सा उनके स्वयं के स्रोतों से प्राप्त होता है।
    • वे केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा प्रदान किए जाने वाले अनुदानों पर अत्यधिक निर्भर रहती हैं। राज्य सरकारें प्रायः पर्याप्त वित्तीय शक्तियों के हस्तांतरण के प्रति अनिच्छुक रहती हैं।
    • यद्यपि 16वें वित्त आयोग ने वर्ष 2026–31 की अवधि के लिए स्थानीय निकायों को 7.91 ट्रिलियन रुपये के अनुदान की अनुशंसा की है, फिर भी राज्य वित्त आयोगों के गठन में होने वाली देरी के कारण निधियों का नियमित एवं पूर्वानुमेय प्रवाह अनिश्चित बना हुआ है।
  • शक्तियों का केंद्रीकरण: प्रतिनिधित्व में वृद्धि के बावजूद वित्तीय एवं कार्यकारी शक्तियाँ प्रायः पंचायत अध्यक्षों अथवा नौकरशाही के हाथों में केंद्रित रहती हैं।
    • वार्ड सदस्यों को निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में सार्थक अधिकार प्राप्त नहीं हो पाते।
    • इस प्रकार, राजनीतिक समावेशन प्रशासनिक सशक्तिकरण में परिवर्तित नहीं हो पाया है।
  • अपर्याप्त कार्मिक एवं तकनीकी सहयोग: पंचायतों से आवास योजनाओं, जलापूर्ति, स्वच्छता, रोजगार कार्यक्रमों तथा डिजिटल मंचों सहित अनेक दायित्वों के प्रबंधन की अपेक्षा की जाती है।
    • किन्तु अनेक ग्राम पंचायतों में प्रशिक्षित सचिवीय कर्मचारियों, तकनीकी विशेषज्ञों तथा डेटा प्रबंधन कर्मियों का अभाव है, जिससे योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की क्षमता कमजोर पड़ जाती है।
  • जवाबदेही संबंधी सीमित परिणाम: अध्ययन में पाया गया कि कल्याणकारी लाभार्थियों की पहचान, वित्तीय निगरानी तथा परियोजनाओं को नागरिकों की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने जैसे क्षेत्रों में बहुत कम सुधार हुआ है।
    • यद्यपि नागरिक सहभागिता तथा पारदर्शिता संबंधी प्रक्रियाओं में कुछ सीमित सुधार देखने को मिले, तथापि विकासात्मक परिणाम अधिकांशतः अपरिवर्तित रहे।
  • राज्यों के बीच शक्तियों के हस्तांतरण में असमानता: पंचायतों की प्रभावशीलता विभिन्न राज्यों में काफी भिन्न है क्योंकि—
    • 3F अर्थात् Funds (वित्त), Functions (कार्य) तथा Functionaries (कार्मिक) का हस्तांतरण अभी भी पूर्ण रूप से नहीं हो पाया है।
    • अनेक राज्य स्थानीय विकास संबंधी कार्यों पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं।

पंचायतों को सशक्त बनाने हेतु प्रमुख उपाय 

  • संवैधानिक एवं संस्थागत उपाय:
    • 73वाँ संविधान संशोधन: 73वें संविधान संशोधन अधिनियम ने पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया तथा लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को अनिवार्य बनाया।
    • वित्त आयोग अनुदान: क्रमिक वित्त आयोगों ने पेयजल, स्वच्छता, स्थानीय अवसंरचना तथा बुनियादी नागरिक सेवाओं के लिए बिना शर्त अनुदानों में वृद्धि की है।
  • पेसा अधिनियम, 1996: पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 ने अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय ग्राम सभाओं को व्यापक अधिकार एवं सशक्तिकरण प्रदान किया।
  • डिजिटल शासन सुधार: सरकार की विभिन्न पहलों, जैसे—
    • ई-ग्राम स्वराज – डिजिटल योजना एवं लेखांकन मंच,
    • ग्राम मानचित्र – जीआईएस आधारित योजना निर्माण उपकरण,
    • स्वामित्व योजना – ड्रोन तकनीक द्वारा संपत्ति मानचित्रण,
      • का उद्देश्य स्थानीय शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा दक्षता को बढ़ाना है।
  • महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी: महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण (जिसे अनेक राज्यों में बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है) बुनियादी स्तर पर लोकतंत्र को सुदृढ़ करने तथा राजनीतिक समावेशन को प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण रहा है।
  • क्षमता निर्माण कार्यक्रम: पंचायती राज मंत्रालय द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रमों, डिजिटल साक्षरता पहलों तथा ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) के लिए सहयोग प्रदान किया जाता है।
    • हालाँकि, इन कार्यक्रमों का क्रियान्वयन राज्यों एवं क्षेत्रों में समान रूप से प्रभावी नहीं है।

भारत में पंचायतों को सुदृढ़ बनाने की भावी दिशा

  •  शासन के वास्तविक विकेंद्रीकरण पर बल: भारत ने राजनीतिक विकेंद्रीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, किन्तु शासन संबंधी विकेंद्रीकरण अभी भी पूर्ण रूप से साकार नहीं हो पाया है।
    • पंचायतों के वास्तविक सशक्तीकरण के लिए वित्त , कार्य  एवं कार्मिक का प्रभावी हस्तांतरण आवश्यक है।
  • वित्तीय स्वायत्तता को सुदृढ़ करना: पंचायतों को स्थानीय करों एवं उपयोगकर्ता शुल्कों के निर्धारण और संग्रहण का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए।
    • उन्हें राजस्व के पूर्वानुमेय एवं स्थिर स्रोत उपलब्ध कराए जाने चाहिए तथा वित्त आयोगों द्वारा अनुशंसित निधियों का समयबद्ध हस्तांतरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
    • इस संदर्भ में राज्य वित्त आयोगों को अधिक प्रभावी एवं सशक्त बनाना अत्यंत आवश्यक है।
  •  प्रशासनिक क्षमता का विकास: पंचायत प्रतिनिधियों एवं कर्मचारियों को कल्याणकारी योजनाओं के प्रशासन, लोक वित्त प्रबंधन, डिजिटल शासन प्रणालियों तथा सामाजिक अंकेक्षण के संबंध में नियमित प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
    • क्षमता निर्माण को अवसर-आधारित गतिविधि के बजाय एक सतत एवं संस्थागत प्रक्रिया बनाया जाना चाहिए।
  • स्थानीय प्रशासनिक सहयोग  सुदृढ़ीकरण : ग्राम स्तर पर समर्पित तकनीकी विशेषज्ञों, डेटा प्रबंधन एवं लेखांकन सहायता कर्मियों तथा पंचायत विकास अधिकारियों की नियुक्ति के माध्यम से मानव संसाधनों का विस्तार किया जाना चाहिए।
    • योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त प्रशासनिक सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • कार्यों एवं उत्तरदायित्वों की स्पष्टता: राज्य सरकारों, जिला प्रशासन तथा पंचायतों के बीच दायित्वों एवं अधिकारों का स्पष्ट विभाजन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
    • इससे कार्यों के दोहराव में कमी आएगी तथा जवाबदेही और प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि होगी।
  • सहभागी लोकतंत्र को अधिक बेहतर बनाना: ग्राम सभाओं को सामाजिक अंकेक्षण, सार्वजनिक सूचना प्रकटीकरण तंत्र तथा नागरिक सहभागिता मंचों के माध्यम से अधिक सशक्त बनाया जाना चाहिए।
    • इससे शासन व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी, नागरिकों की भागीदारी सुदृढ़ होगी तथा स्थानीय स्तर पर स्वामित्व एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित होगी।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: पंचायतों के समक्ष प्रभावी ग्रामीण शासन सुनिश्चित करने में विद्यमान चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। भारत में पंचायती राज संस्थाओं के सशक्तीकरण हेतु आवश्यक उपायों पर चर्चा कीजिए। 

स्रोत: BS

 

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