पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- उच्चतम न्यायालय (SC) ने संबंधित न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना न्यायिक कार्यवाहियों के श्रव्य एवं दृश्य अभिलेखों के निष्कर्षण, संपादन, प्रसार, पुनर्प्रसारण, अपलोड अथवा सामाजिक माध्यम एवं अन्य डिजिटल मंचों पर उनके वाणिज्यिक उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है।
परिचय
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह अंतरिम आदेश न्यायिक कार्यवाहियों के निष्पक्ष समाचार-प्रस्तुतीकरण को प्रभावित नहीं करेगा।
- उच्च न्यायालयों को भी उच्चतम न्यायालय के आदर्श प्रत्यक्ष प्रसारण दिशानिर्देशों को अपनाने की स्थिति पर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने तथा न्यायिक कार्यवाहियों के निरंतर प्रत्यक्ष प्रसारण के प्रभावों का विवरण देने का निर्देश दिया गया है।
न्यायालयीय कार्यवाहियों का प्रत्यक्ष प्रसारण
- उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2022 में अपनी संवैधानिक पीठों की कार्यवाहियों का प्रत्यक्ष प्रसारण प्रारंभ किया।
- उद्देश्य: न्यायिक कार्यवाहियों को अधिक पारदर्शी एवं जनसुलभ बनाना।
- यह पहल सितंबर, 2018 में दिए गए स्वप्निल त्रिपाठी बनाम भारत संघ के निर्णय के अनुरूप थी, जिसमें न्यायालय ने न्यायालयीय कार्यवाहियों के प्रत्यक्ष प्रसारण को संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत न्याय तक पहुँच के अधिकार का अभिन्न अंग माना था।
- न्यायालय ने कहा कि प्रत्यक्ष प्रसारण के माध्यम से न्यायालय वास्तविक रूप से न्यायालय कक्ष की चारदीवारी से बाहर व्यापक जनसमुदाय तक पहुँच सकेगा।
- इसके पश्चात तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की ई-समिति ने भारत में न्यायालयीय कार्यवाहियों के प्रत्यक्ष प्रसारण के विनियमन हेतु आदर्श दिशानिर्देश जारी किए।
- वर्ष 2023 में उच्चतम न्यायालय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की सहायता से न्यायालयीय कार्यवाहियों के प्रत्यक्ष लिप्यंतरण की व्यवस्था प्रारंभ करने वाला भारत का प्रथम न्यायालय बना।
- इस पहल की घोषणा करते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि यह प्रौद्योगिकी न्यायालयीय कार्यवाहियों का विश्वसनीय अभिलेखीय अभिलेख तैयार करेगी तथा न्यायपालिका के लिए एक महत्त्वपूर्ण संसाधन सिद्ध होगी।
चिंताएँ
- प्रत्यक्ष प्रसारण का उद्देश्य पारदर्शिता तथा खुले न्याय के सिद्धांत को बढ़ावा देना था, किंतु प्रभावी विनियामक ढाँचे के अभाव में न्यायालयीय कार्यवाहियों के अभिलेखों को खंडित रूप में प्रस्तुत कर , संपादित कर तथा भ्रामक शीर्षकों के साथ प्रसारित किया जाने लगा है।
- चयनित अंशों को संपादित कर न्यायालयीय कार्यवाहियों के संबंध में भ्रामक आख्यान तैयार किए जाते हैं।
- न्यायिक कार्यवाहियों के अभिलेखों का दुरुपयोग न्यायाधीशों एवं अधिवक्ताओं को चरित्र-हनन तथा सार्वजनिक उपहास का लक्ष्य बनाता है, जिससे उनके कार्य निष्पादन पर निरोधात्मक प्रभाव पड़ता है।
- ऐसी सामग्री का प्रसार न्यायालयीय कार्यवाहियों के संबंध में शत्रुतापूर्ण वातावरण, भ्रामक सूचनाओं तथा जानबूझकर फैलाए गए सनसनीपूर्ण प्रचार को बढ़ावा देता है, जिससे न्याय प्रशासन में जनता का विश्वास कमजोर होता है।
आगे की राह
- व्यापक विनियामक ढाँचे का निर्माण: न्यायालयीय कार्यवाहियों के प्रत्यक्ष प्रसारण के अभिलेखन, पुनरुत्पादन, प्रसार तथा वाणिज्यिक उपयोग के संबंध में स्पष्ट वैधानिक एवं प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश तैयार किए जाएँ, ताकि पारदर्शिता तथा न्यायिक प्रक्रिया की अखंडता के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
- तकनीकी सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना: न्यायालयीय अभिलेखों के अनधिकृत संपादन, डीपफेक, तथा अन्य दुरुपयोग की पहचान के लिए डिजिटल जलचिह्न, सामग्री प्रमाणीकरण उपकरणों तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित निगरानी प्रणालियों का उपयोग किया जाए।
- प्रत्यक्ष प्रसारण संबंधी दिशानिर्देशों का समान क्रियान्वयन सुनिश्चित करना: सभी उच्च न्यायालय उच्चतम न्यायालय के आदर्श प्रत्यक्ष प्रसारण दिशानिर्देशों को अपनाएँ तथा समय-समय पर उनकी समीक्षा करें।
- विधिक जन-जागरूकता को सुदृढ़ करना: न्यायालयीय कार्यवाहियों के अभिलेखों के अनधिकृत प्रसार अथवा छेड़छाड़ के कानूनी परिणामों के संबंध में जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएँ तथा न्याय वितरण प्रणाली के प्रति नागरिकों की जागरूक एवं उत्तरदायी सहभागिता को प्रोत्साहित किया जाए।
स्रोत: TH
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