पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- वर्ष 2026 का NATO का अंकारा शिखर सम्मेलन, जो तुर्किये की राजधानी अंकारा में आयोजित हुआ, में गठबंधन ने सामूहिक रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता तथा यूरोप के रक्षा औद्योगिक आधार (DIB) को सुदृढ़ करने के संकल्प की पुनर्पुष्टि की।
NATO के अंकारा शिखर सम्मेलन के प्रमुख परिणाम
- सामूहिक रक्षा की पुनर्पुष्टि: NATO के सदस्य देशों ने वॉशिंगटन संधि के अनुच्छेद-5 के अंतर्गत सामूहिक रक्षा के प्रति अपनी “अटूट प्रतिबद्धता” की सर्वसम्मति से पुनर्पुष्टि की।
- सदस्य देशों ने विशेष रूप से रूस से उत्पन्न हो रहे उभरते सुरक्षा खतरों के मद्देनज़र अपनी सैन्य तैयारी को और अधिक सुदृढ़ करने का संकल्प लिया।
- रक्षा व्यय में वृद्धि: NATO सदस्यों ने हेग रक्षा प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की।
- इसके अंतर्गत प्रत्येक सदस्य देश ने वर्ष 2035 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का न्यूनतम 5% रक्षा व्यय पर खर्च करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
- यूक्रेन को निरंतर समर्थन: NATO ने यूक्रेन की स्वतंत्रता, संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए अपने “अडिग समर्थन” की घोषणा की।
- यूरोप के रक्षा औद्योगिक आधार (DIB) का पुनरोद्धार: गठबंधन के साझेदार देशों ने उच्च प्रौद्योगिकी एवं उच्च उत्पादन क्षमता वाले यूरोप-व्यापी रक्षा औद्योगिक आधार के निर्माण का संकल्प लिया।
- इसमें उन उद्योगों, विनिर्माण इकाइयों, प्रयोगशालाओं तथा कुशल मानव संसाधन का विकास सम्मिलित है, जो किसी देश की सैन्य शक्ति के निर्माण एवं उसके सतत् रख-रखाव के लिए आवश्यक होते हैं।
भारत के समक्ष चुनौतियाँ
- रक्षा उपकरणों के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा: NATO देशों द्वारा रक्षा व्यय में वृद्धि से उन्नत सैन्य उपकरणों की वैश्विक मांग बढ़ेगी।
- परिणामस्वरूप भारत जैसे देशों को रक्षा उपकरणों की आपूर्ति में अधिक समय का सामना करना पड़ सकता है।
- रक्षा खरीद की बढ़ती लागत: रक्षा उपकरणों की खरीद लागत में वृद्धि से भारत के रक्षा बजट पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ेगा।
- इससे सैन्य आधुनिकीकरण की गति प्रभावित हो सकती है।
- आपूर्ति शृंखला में व्यवधान: भारत अभी भी अनेक महत्त्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर है।
- उदाहरणार्थ, GE F-404 लड़ाकू विमान इंजन की आपूर्ति में हुई देरी के कारण तेजस Mk-1A लड़ाकू विमान के उत्पादन कार्यक्रम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
आगे की राह
- भारत को अपनी बढ़ती विनिर्माण क्षमता का उपयोग करते हुए मित्र देशों के लिए विश्वसनीय रक्षा उपकरण निर्यातक के रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहिए।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), रक्षा नवाचार कार्यक्रमों तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पहलों के माध्यम से निजी उद्योग, स्टार्टअप तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की भागीदारी का विस्तार किया जाना चाहिए।
- भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी, साइबर युद्ध तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।
- साथ ही, अर्धचालक, सेंसर, उन्नत सामग्री तथा इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों जैसे महत्त्वपूर्ण रक्षा अवयवों के स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
NATO के बारे में
- NATO (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) देशों का एक सैन्य गठबंधन है।
- स्थापना: इसकी स्थापना वर्ष 1949 में उत्तर अटलांटिक संधि , जिसे सामान्यतः वॉशिंगटन संधि कहा जाता है, पर हस्ताक्षर के साथ हुई।
- उद्देश्य: सदस्य देशों की सुरक्षा एवं रक्षा सुनिश्चित करना तथा सामूहिक रक्षा के सिद्धांत के माध्यम से उनकी सुरक्षा को सुदृढ़ करना।
- संस्थापक सदस्य: NATO के मूल सदस्य देश थे—
- बेल्जियम
- कनाडा
- डेनमार्क
- फ्रांस
- आइसलैंड
- इटली
- लक्ज़मबर्ग
- नीदरलैंड
- नॉर्वे
- पुर्तगाल
- यूनाइटेड किंगडम
- संयुक्त राज्य अमेरिका
- सामूहिक रक्षा: NATO की आधारशिला उत्तर अटलांटिक संधि के अनुच्छेद-5 पर आधारित है।
- इसके अनुसार, किसी एक अथवा अधिक सदस्य देशों पर किया गया सशस्त्र आक्रमण सभी सदस्य देशों पर आक्रमण माना जाएगा।
- निर्णय-निर्माण प्रक्रिया: NATO में सभी निर्णय सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाते हैं।
- उत्तर अटलांटिक परिषद , जिसमें सभी सदस्य देशों के राजदूत शामिल होते हैं, इसका सर्वोच्च राजनीतिक निर्णय-निर्माण निकाय है।
- सदस्य देश: वर्तमान में NATO के 32 सदस्य देश हैं।
- फिनलैंड तथा स्वीडन क्रमशः इसके 31वें एवं 32वें सदस्य बने हैं।
- सदस्यता की प्रतिबद्धता: संधि पर हस्ताक्षर करने के उपरांत सदस्य देश स्वेच्छा से संगठन की राजनीतिक परामर्श प्रक्रिया तथा सैन्य गतिविधियों में भाग लेने की प्रतिबद्धता स्वीकार करते हैं।
स्रोत: TH