माउंटबेटन योजना (3 जून घोषणा): ब्रिटिश भारत के विभाजन की रूपरेखा 

पाठ्यक्रम: GS1/इतिहास

संदर्भ

  •  माउंटबेटन योजना की घोषणा 3 जून 1947 को (3 जून घोषणा) की गई थी और यह ब्रिटिश भारत के विभाजन तथा भारत एवं पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र अधिराज्यों के गठन की आधारभूत रूपरेखा बनी।

पृष्ठभूमि

  •  22 मार्च 1947 को भारत के अंतिम वायसराय के रूप में पदभार ग्रहण करने वाले लॉर्ड लुई माउंटबेटन को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली द्वारा जून 1948 तक सत्ता के हस्तांतरण का दायित्व सौंपा गया था।
  • हालाँकि, उस समय देश की स्थिति तीव्रता से खराब हो रही थी। निम्नलिखित घटनाओं के बाद सांप्रदायिक हिंसा पूरे देश में फैल चुकी थी—
    • ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स (अगस्त 1946)
    • नोआखाली एवं बिहार के दंगे
    • बम्बई में सांप्रदायिक अशांति
    • पंजाब में बढ़ती हिंसा, विशेषकर अमृतसर, रावलपिंडी और तक्षशिला में
  • लॉर्ड माउंटबेटन शीघ्र ही इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि एक संयुक्त भारत अब राजनीतिक रूप से व्यवहार्य नहीं रह गया है तथा पाकिस्तान की माँग की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

3 जून योजना के प्रमुख प्रावधान

  • इस योजना ने विभाजन की रूपरेखा निर्धारित की, जिसकी घोषणा लॉर्ड माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और बलदेव सिंह द्वारा एक ऐतिहासिक रेडियो प्रसारण के माध्यम से की गई। इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे—
    • विभाजन की स्वीकृति: ब्रिटिश सरकार ने इस सिद्धांत को स्वीकार किया कि ब्रिटिश भारत को दो अधिराज्यों—भारत और पाकिस्तान—में विभाजित किया जा सकता है।
    • प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा निर्णय: पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं को यह निर्णय लेने के लिए मतदान करना था कि उनके प्रांत एकीकृत बने रहें या उनका विभाजन किया जाए।
    • जनमत-संग्रह: उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) तथा असम के सिलहट जिले में जनमत-संग्रह आयोजित किया जाना था, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि वे भारत में शामिल होंगे या पाकिस्तान में।
    • सिंध का विकल्प: सिंध विधानसभा को यह निर्णय लेने का अधिकार दिया गया कि सिंध भारत में सम्मिलित होगा या पाकिस्तान में।
    • सीमा आयोग: यदि पंजाब और बंगाल का विभाजन होता है, तो उनकी सीमाओं के निर्धारण हेतु सर साइरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में एक सीमा आयोग गठित किया जाना था।
    • दो अधिराज्यों का गठन: योजना में भारत अधिराज्य और पाकिस्तान अधिराज्य के गठन का प्रावधान था, जिनकी पृथक-पृथक संविधान सभाएँ होंगी।
    • देशी रियासतें: देशी रियासतों को भौगोलिक एवं प्रशासनिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए भारत अथवा पाकिस्तान में विलय का परामर्श दिया गया।
    • सत्ता हस्तांतरण की तिथि में परिवर्तन: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सत्ता हस्तांतरण की तिथि जून 1948 से अग्रिम कर 15 अगस्त 1947 निर्धारित कर दी गई।

कांग्रेस द्वारा योजना स्वीकार करने के कारण

  • सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए: कांग्रेस नेतृत्व का मानना था कि सत्ता का शीघ्र हस्तांतरण ही देश को अधिक अराजकता एवं रक्तपात से बचा सकता है।
  • सशक्त केंद्रीय सरकार की प्राथमिकता: सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं का मानना था कि सांप्रदायिक गतिरोध से ग्रस्त एक संयुक्त भारत की तुलना में छोटा किंतु राजनीतिक रूप से स्थिर भारत अधिक उपयुक्त होगा।
    • इंडिया विंस फ़्रीडम (मौलाना अबुल कलाम आज़ाद) के अनुसार, माउंटबेटन ने कांग्रेस नेताओं को यह विश्वास दिलाया कि कुछ क्षेत्रों का त्याग एक अधिक सशक्त एवं एकीकृत भारतीय संघ के निर्माण में सहायक होगा।
  • कांग्रेस-लीग सहयोग की विफलता: अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग के साथ कार्य करने के अनुभव ने अनेक कांग्रेस नेताओं को यह विश्वास दिलाया कि संयुक्त भारत में प्रभावी शासन अत्यंत कठिन होगा।
  • ‘प्लान बाल्कन’ से बचाव: कांग्रेस विशेष रूप से माउंटबेटन के पूर्व प्रस्ताव, जिसे लोकप्रिय रूप से ‘प्लान बाल्कन’ कहा जाता है, का विरोध कर रही थी। इस योजना के अंतर्गत प्रांतों को स्वतंत्र इकाइयों के रूप में अस्तित्व में आने की अनुमति मिल सकती थी।
    • कांग्रेस को आशंका थी कि इससे भारत अनेक संप्रभु इकाइयों में विखंडित हो जाएगा।

मुस्लिम लीग द्वारा योजना स्वीकार करने के कारण

  • पाकिस्तान की स्थापना की स्वीकृति : इस योजना ने औपचारिक रूप से पाकिस्तान के गठन को स्वीकार किया, जो 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद से मुस्लिम लीग की प्रमुख माँग रही थी।
  • राजनीतिक हाशियाकरण का भय: मुस्लिम लीग का तर्क था कि हिंदू-बहुल भारत में मुसलमान राजनीतिक रूप से अधीनस्थ हो जाएंगे। इसी कारण मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान नामक पृथक राज्य की माँग को आगे बढ़ाया।
    • विभाजन राजनीतिक आत्मनिर्णय की गारंटी के रूप में देखा गया।
  • रणनीतिक समझौता: यद्यपि जिन्ना पंजाब और बंगाल के विभाजन के विरोधी थे, फिर भी उन्होंने इस योजना को स्वीकार किया क्योंकि इससे पाकिस्तान की स्थापना का एक स्पष्ट मार्ग सुनिश्चित होता था।
    • जिन्ना पंजाब और बंगाल के विभाजन को त्रुटिपूर्ण मानते थे, किंतु पाकिस्तान की प्राप्ति के व्यापक हित में उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया।

घोषणा के पश्चात उत्पन्न तात्कालिक चुनौतियाँ

  •  अनिश्चित सीमाएँ: भारत और पाकिस्तान की सटीक सीमाएँ अभी निर्धारित नहीं की गई थीं।
  • जनसंख्या संबंधी प्रश्न: यह स्पष्ट नहीं था कि लोगों को सीमाओं के पार पलायन करना होगा या नहीं।
    • माउंटबेटन ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्हें व्यापक जन-स्थानांतरण की आशंका नहीं है।
  • प्रशासनिक विभाजन: संपत्तियों, सैन्य प्रतिष्ठानों, लोक सेवाओं तथा वित्तीय संसाधनों का विभाजन अभी शेष था।

योजना के परिणाम

  • 3 जून योजना के क्रियान्वयन का परिणाम भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के रूप में सामने आया। इसके फलस्वरूप 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान तथा 15 अगस्त 1947 को भारत का उदय हुआ।
  • इसके साथ ही मानव इतिहास के सबसे बड़े जन-स्थानांतरणों में से एक घटित हुआ तथा व्यापक सांप्रदायिक हिंसा और मानवीय त्रासदी देखने को मिली।
  • यास्मीन खान जैसे इतिहासकारों का मत है कि विभाजन में ‘‘विजेताओं और पराजितों के बीच कोई स्पष्ट रेखा नहीं थी’’, क्योंकि इसने सभी समुदायों के लिए विस्थापन, अनिश्चितता एवं पीड़ा को उत्पन्न किया।

निष्कर्ष

  • 3 जून योजना भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की दिशा में निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।
  • मुस्लिम लीग ने इसे पाकिस्तान की माँग की पूर्ति के रूप में देखा, जबकि कांग्रेस ने राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने तथा देश के अधिक विखंडन को रोकने के लिए इसे एक पीड़ादायक किंतु अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में स्वीकार किया।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: माउंटबेटन योजना ब्रिटिश भारत में सत्ता हस्तांतरण के लिए एक राजनीतिक समझौते तथा संवैधानिक रूपरेखा—दोनों का प्रतिनिधित्व करती थी। भारतीय उपमहाद्वीप पर इसके तात्कालिक एवं दीर्घकालिक प्रभावों की विवेचना कीजिए। 

स्रोत: IE

 

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