पाठ्यक्रम: GS3/कृषि; अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में, भारत के विभिन्न राज्यों ने विभिन्न गैर-सब्सिडी युक्त विशेष उर्वरकों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे भारत के उर्वरक क्षेत्र में नीतिगत सामंजस्य को लेकर प्रश्न उठे हैं। यह स्थिति तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब भारत के प्रधानमंत्री ने सतत कृषि को प्रोत्साहन देने तथा आयात-निर्भरता कम करने के लिए रासायनिक उर्वरकों की खपत घटाने की आवश्यकता पर बार-बार बल दिया है।
भारत की उर्वरक संबंधी चुनौती
- भारत के समक्ष चुनौती तीन महत्वपूर्ण उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित करने की है, अर्थात्—
- खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना,
- मृदा स्वास्थ्य बनाए रखना, तथा
- आयात-निर्भरता एवं सब्सिडी के भार को कम करना।
- हरित क्रांति के पश्चात भारतीय कृषि रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया एवं डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), पर अत्यधिक निर्भर हो गई है।
भारत की उर्वरक चुनौती के प्रमुख आयाम
- रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता : भारत प्रतिवर्ष 60 मिलियन टन से अधिक उर्वरकों का उपभोग करता है तथा विश्व के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ताओं में से एक है।
- नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटैशियम (NPK) का आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, जबकि भारत के अनेक राज्यों में नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण यह अनुपात 8:3:1 से भी अधिक हो गया है।
- आर्थिक प्रभाव : भारत उर्वरकों तथा उर्वरक निर्माण हेतु आवश्यक कच्चे माल, जैसे फॉस्फेट शैल , पोटाश, प्राकृतिक गैस एवं अमोनिया के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।
- वर्ष 2025–26 में उर्वरक आयात का मूल्य लगभग 27.2 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया।
- पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास आपूर्ति व्यवधान लागत को बढ़ा सकते हैं।
- इससे तीन प्रमुख कमजोरियाँ उत्पन्न होती हैं—
- विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव,
- सब्सिडी के कारण राजकोषीय भार, तथा
- वैश्विक आपूर्ति आघातों के प्रति संवेदनशीलता।
- पर्यावरणीय प्रभाव: खेतों में प्रयुक्त उर्वरकों का एक बड़ा भाग फसलों द्वारा अवशोषित नहीं हो पाता।
- इसके परिणामस्वरूप जल प्रदूषण, मृदा क्षरण, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तथा जैव विविधता में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- नाइट्रोजन का रिसाव तथा भूजल प्रदूषण प्रमुख पारिस्थितिकीय चिंताएँ बन चुके हैं।
- उपयोग में क्षेत्रीय असंतुलन : पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्य गहन कृषि पद्धतियों के कारण अनुपातहीन रूप से अधिक मात्रा में उर्वरकों का उपभोग करते हैं।
- इससे मृदा की उत्पादकता में कमी , जल-क्षय तथा पारिस्थितिकीय दबाव बढ़ा है।
भारत की उर्वरक नीति का विकास
- हरित क्रांति चरण : 1960 एवं 1970 के दशक में सरकार ने कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहित किया।
- उद्देश्य : खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना,
- गहन कृषि को समर्थन प्रदान करना, तथा
- किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराना।
- इसके परिणामस्वरूप उर्वरक सब्सिडी, नियंत्रित मूल्य व्यवस्था तथा सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी की शुरुआत हुई।
- उद्देश्य : खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना,
- प्रतिधारण मूल्य योजना (RPS): सरकार ने उर्वरक निर्माताओं को उत्पादन लागत एवं विक्रय मूल्य के बीच के अंतर की प्रतिपूर्ति की।
- परिणाम :उर्वरकों की उपलब्धता में वृद्धि हुई,
- किंतु सरकारी वित्त पर सब्सिडी का भारी भार पड़ा।
- परिणाम :उर्वरकों की उपलब्धता में वृद्धि हुई,
- पोषक-तत्त्व आधारित सब्सिडी योजना (NBS), 2010: सरकार ने फॉस्फेटिक एवं पोटाशिक उर्वरकों को पोषक-तत्त्व आधारित सब्सिडी प्रणाली के अंतर्गत शामिल किया।
- उद्देश्य :संतुलित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहन देना,
- प्रतिस्पर्धा एवं दक्षता को प्रोत्साहित करना।
- हालाँकि, यूरिया को NBS के दायरे से बाहर रखा गया तथा यह मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के अंतर्गत बना रहा।
- उद्देश्य :संतुलित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहन देना,
भारत की वर्तमान उर्वरक नीति की प्रमुख विशेषताएँ
- व्यापक सब्सिडी व्यवस्था : भारत विश्व की सबसे बड़ी उर्वरक सब्सिडी व्यवस्थाओं में से एक संचालित करता है।
- प्रमुख सब्सिडी युक्त उर्वरक: यूरिया
- डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP)
- म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP)
- यह सब्सिडी किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराती है, किंतु पोषक तत्त्वों की खपत के पैटर्न को विकृत भी करती है।
- प्रमुख सब्सिडी युक्त उर्वरक: यूरिया
- यूरिया मूल्य नियंत्रण : यूरिया की कीमतें अत्यधिक विनियमित हैं तथा अन्य उर्वरकों की तुलना में अत्यंत कम रखी जाती हैं।
- परिणाम : किसान असंतुलित रूप से यूरिया का अधिक उपयोग करते हैं, जिससे पोषक तत्त्वों का असंतुलन उत्पन्न होता है।
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ( DBT) प्रणाली: पारदर्शिता बढ़ाने तथा रिसाव को कम करने के उद्देश्य से DBT प्रणाली लागू की गई।
- प्रमुख विशेषताएँ: उर्वरक की बिक्री के बाद सब्सिडी उर्वरक कंपनियों को हस्तांतरित की जाती है।
- पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीनों के माध्यम से आधार-संबद्ध सत्यापन किया जाता है।
- प्रमुख विशेषताएँ: उर्वरक की बिक्री के बाद सब्सिडी उर्वरक कंपनियों को हस्तांतरित की जाती है।
राज्यों की परस्पर विरोधी नीतियाँ
- विशेष उर्वरकों पर प्रतिबंध: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने कथित रूप से गैर-सब्सिडी वाले उर्वरक उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगाया है। इनमें नैनो उर्वरक, जैव-उर्वरक, जल-विलेय उर्वरक, तरल उर्वरक, सूक्ष्म पोषक तत्व (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) तथा जैव-उत्तेजक (बायो-स्टिमुलेंट्स) शामिल हैं।
- इन उत्पादों का उपयोग सामान्यतः उच्च-मूल्य वाली बागवानी फसलों में किया जाता है तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा परीक्षण के उपरांत उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO) के अंतर्गत वैज्ञानिक रूप से अनुमोदित किया गया है।
- चिंताएँ:
- नीतिगत असंगति:राज्य सरकारें उन विकल्पों को हतोत्साहित कर रही हैं जो पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाते हैं, जबकि केंद्र सरकार पारंपरिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने का समर्थन कर रही है।
- नवाचार को हतोत्साहन: कंपनियाँ उन्नत पोषक उत्पादों के अनुसंधान एवं विकास (R&D) में भारी निवेश करती हैं। प्रतिबंधात्मक नीतियाँ नवाचार तथा नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने की प्रेरणा को कम करती हैं।
- व्यवसाय सुगमता पर प्रभाव: ये प्रतिबंध नियामकीय स्थिरता को कमजोर करते हैं तथा कृषि आधुनिकीकरण में निजी क्षेत्र की भागीदारी पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
सुधार की दिशा में सरकारी पहल
- PM-PRANAM योजना: पीएम कार्यक्रम फॉर रिस्टोरेशन, अवेयरनेस, न्यूरीशमेंट एंड अमेलियोरेशन ऑफ मदर अर्थ (PM-PRANAM) राज्यों को रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
- उद्देश्य: सतत एवं संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को प्रोत्साहन देना।
- नैनो यूरिया का प्रोत्साहन: इफको (IFFCO) की नैनो यूरिया पहल का उद्देश्य पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता को बढ़ाना है।
- लाभ:उर्वरकों की खपत में कमी
- परिवहन लागत में कमी
- पोषक तत्वों के बेहतर अवशोषण की सुविधा
- लाभ:उर्वरकों की खपत में कमी
- नीम-लेपित यूरिया: यूरिया के दुरुपयोग एवं विचलन को रोकने तथा नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए नीम-लेपित यूरिया की शुरुआत की गई।
- प्रभाव: नाइट्रोजन का धीमा उत्सर्जन
- पोषक तत्वों की बर्बादी में कमी
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना
- यह योजना किसानों को पोषक तत्वों के उपयोग संबंधी वैज्ञानिक अनुशंसाएँ प्रदान करती है।
- प्रभाव: नाइट्रोजन का धीमा उत्सर्जन
PM-Kisan 2.0 : एक संभावित विकल्प
- उत्पाद सब्सिडी के स्थान पर प्रत्यक्ष आय सहायता: भारत को धीरे-धीरे उर्वरक सब्सिडी आधारित व्यवस्था से हटकर, विस्तारित पीएम-किसान ढाँचे के माध्यम से किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान करने की दिशा में बढ़ना चाहिए।
- इस मॉडल के अंतर्गत:
- उर्वरकों की कीमतें बाजार द्वारा निर्धारित होंगी।
- किसानों को सुनिश्चित आय सहायता प्राप्त होगी।
- पोषक तत्वों के उपयोग संबंधी निर्णय अधिक तर्कसंगत होंगे।
- बाजार में उत्पन्न विकृतियाँ कम होंगी।
- इस मॉडल के अंतर्गत:
- संभावित लाभ:
- उर्वरकों का दक्षतापूर्ण उपयोग:किसान सब्सिडी के प्रभाव के बजाय फसल की वास्तविक आवश्यकता के आधार पर उर्वरकों का चयन करेंगे।
- राजकोषीय अनुशासन: रिसाव तथा अत्यधिक सब्सिडी भार में कमी आ सकती है।
- पर्यावरणीय स्थिरता: संतुलित पोषक तत्वों के उपयोग से मृदा एवं जल संसाधनों का स्वास्थ्य बेहतर होगा।
- किसान सशक्तिकरण: प्रत्यक्ष आय सहायता किसानों को अधिक लचीलापन और विकल्प प्रदान करती है।
भारत की उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था में सुधार
- भारत की उर्वरक सब्सिडी प्रणाली अभी भी उत्पाद-विशिष्ट एवं मूल्य-विकृत करने वाली है। सब्सिडी का अधिकांश भाग यूरिया पर केंद्रित है, जिससे यह अन्य संतुलित पोषक तत्वों की तुलना में कृत्रिम रूप से सस्ता बना रहता है।
- इसके परिणामस्वरूप:
- सब्सिडीयुक्त उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग
- मृदा पोषक तत्वों में असंतुलन
- उर्वरकों का दुरुपयोग एवं विचलन
- सरकारी वित्त पर बढ़ता सब्सिडी भार
- हाल के वर्षों में वैश्विक मूल्य वृद्धि के दौरान उर्वरक सब्सिडी व्यय ₹2 लाख करोड़ से अधिक तक पहुँच चुका है।
आगे की राह : उर्वरक नीति सुधार
- उत्पाद सब्सिडी से आय सहायता की ओर संक्रमण: विस्तारित पीएम-किसान जैसी प्रत्यक्ष आय सहायता योजनाओं की ओर बढ़ने के पक्ष में समर्थन बढ़ रहा है।
- लाभ: उर्वरकों का तर्कसंगत उपयोग
- सब्सिडी से उत्पन्न विकृतियों में कमी
- किसानों को अधिक विकल्प एवं स्वतंत्रता
- लाभ: उर्वरकों का तर्कसंगत उपयोग
- संतुलित पोषक तत्व उपयोग को प्रोत्साहन : नीति को जैव-उर्वरकों, नैनो उर्वरकों, जैविक खादों तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए।
- संतुलित उर्वरीकरण से उत्पादकता और स्थिरता दोनों में सुधार होता है।
- परिशुद्ध कृषि को प्रोत्साहन: ड्रिप सिंचाई, फर्टिगेशन तथा पर्णीय पोषक तत्व अनुप्रयोग जैसी तकनीकें उर्वरकों की बर्बादी को उल्लेखनीय रूप से कम कर सकती हैं।
- आयात निर्भरता में कमी: भारत को उर्वरकों के आयात स्रोतों में विविधता लानी चाहिए, घरेलू उत्पादन क्षमता को सुदृढ़ करना चाहिए तथा हरित अमोनिया एवं वैकल्पिक प्रौद्योगिकियों में निवेश बढ़ाना चाहिए।
- सहकारी संघवाद को सुदृढ़ बनाना: राज्य सरकारों को वैज्ञानिक रूप से अनुमोदित विशेष उर्वरकों पर प्रतिबंध लगाने के बजाय राष्ट्रीय सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप अपनी नीतियों का समन्वय करना चाहिए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत की उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था ने पारिस्थितिकीय असंतुलन, राजकोषीय दबाव तथा पोषक तत्वों के अकुशल उपयोग को प्रोत्साहन दिया है। टिप्पणी कीजिए तथा भारत की उर्वरक नीति में सुधार की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: IE
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