पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक विरोध-प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के संबंध में की गई कथित टिप्पणी को लेकर नोएडा पुलिस ने एक महिला के विरुद्ध शून्य प्राथमिकी (Zero FIR) दर्ज की।
परिचय
- प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, धारा 353(1) तथा धारा 356(1) के अंतर्गत अपमान, लोक उपद्रव तथा मानहानि से संबंधित प्रावधान लगाए गए हैं।
- धारा 352 के अंतर्गत अपराध सिद्ध करने के लिए यह प्रमाणित करना आवश्यक है कि आरोपी का आशय अथवा ज्ञान ऐसा था कि उसके द्वारा किया गया अपमान लोक शांति के वास्तविक भंग को उकसा सकता था; केवल किसी व्यक्ति का अपमानित महसूस करना पर्याप्त नहीं है।
- धारा 353 (लोक उपद्रव) मुख्यतः उकसावे से संबंधित है, जैसे—सशस्त्र बलों में विद्रोह के लिए उकसाना, लोगों में ऐसा भय उत्पन्न करना जिससे वे राज्य के विरुद्ध अपराध करने के लिए प्रेरित हों, अथवा विभिन्न समुदायों के बीच शत्रुता फैलाना।
- अतः यह प्रावधान किसी सार्वजनिक नेता की तीखी अथवा कठोर आलोचना की अपेक्षा कहीं अधिक उच्च मानक निर्धारित करता है।
- मानहानि संबंधी विधि में भी लंबे समय से यह अपवाद विद्यमान है कि किसी सार्वजनिक पदाधिकारी के सार्वजनिक आचरण पर सद्भावना के आधार पर की गई टिप्पणी दंडनीय नहीं मानी जाती।
- इस प्रकरण ने विशेषकर सार्वजनिक नेताओं के विरुद्ध प्रयुक्त अभद्र भाषा के संदर्भ में नैतिकता-आधारित विमर्श को पुनः जन्म दिया है।
भारत में अश्लीलता संबंधी विधिक प्रावधान
- ऑनलाइन सामग्री में अश्लीलता के विनियमन का विधिक ढाँचा मुख्यतः भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत निहित है।
- अश्लीलता की परिभाषा: कोई भी सामग्री अश्लील मानी जाएगी यदि वह कामोत्तेजक हो, कामुक रुचि को उत्तेजित करती हो अथवा उसका प्रभाव ऐसा हो जिससे उसे पढ़ने, देखने या सुनने वाले व्यक्तियों का नैतिक पतन एवं भ्रष्टाचार होने की संभावना हो।
- सार्वजनिक स्थानों पर अश्लीलता: कानून सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील कृत्यों तथा अश्लील गीतों के प्रदर्शन को प्रतिबंधित करता है।
- इस अपराध में दोषसिद्ध व्यक्ति को अधिकतम तीन माह का कारावास तथा जुर्माना दिया जा सकता है।
- ऑनलाइन सामग्री: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 294 अश्लील सामग्री के विक्रय, आयात, निर्यात, विज्ञापन तथा प्रदर्शन, जिसमें ऑनलाइन सामग्री भी सम्मिलित है, को अपराध घोषित करती है।
- यह विशेष रूप से ऐसी सामग्री को लक्षित करती है जो कामोत्तेजक हो, कामुक रुचि को उत्तेजित करती हो अथवा अत्यधिक यौन प्रकृति की हो।
- प्रथम अपराध के लिए अधिकतम दो वर्ष का कारावास तथा ₹5,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील सामग्री के प्रकाशन अथवा प्रसारण को अपराध घोषित करती है।
- यह प्रावधान परिभाषा की दृष्टि से बीएनएस की धारा 294 के समान है, किंतु इसमें अधिक कठोर दंड का प्रावधान है, जिसके अंतर्गत प्रथम अपराध पर अधिकतम तीन वर्ष का कारावास तथा ₹5 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के संबंधित निर्णय
- हिकलिन परीक्षण: वर्ष 2014 तक न्यायपालिका अश्लीलता का निर्धारण करने के लिए हिकलिन परीक्षण का उपयोग करती थी।
- यह परीक्षण अंग्रेजी विधि के रेजिना बनाम हिक्लिन (1868) वाद से विकसित हुआ था।
- इसके अनुसार यदि किसी रचना का कोई भी भाग ऐसे व्यक्तियों के नैतिक पतन एवं भ्रष्टाचार का कारण बन सकता है जिनके मन ऐसे प्रभावों के प्रति संवेदनशील हों, तो पूरी रचना को अश्लील माना जा सकता है।
- वर्ष 2014 में अवीक सरकार एवं अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य वाद की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने हिकलिन परीक्षण को त्याग दिया।
- न्यायालय ने कहा कि किसी चित्र, लेख अथवा पुस्तक के अश्लील होने का निर्धारण समकालीन सामाजिक मानकों तथा राष्ट्रीय मानकों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि अत्यधिक संवेदनशील अथवा विशेष रूप से प्रभावित होने वाले व्यक्तियों के दृष्टिकोण से।
क्या अभद्र या अशिष्ट भाषा अपराध है?
- वर्ष 2024 में टीवीएफ की एक वेब-शृंखला पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी, क्योंकि उसकी सामग्री को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अंतर्गत अश्लील बताया गया था।
- तथापि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में दर्ज प्राथमिकी को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि अशिष्टता एवं अभद्र भाषा अपने-आप में अश्लीलता के समान नहीं हैं।
- न्यायालय ने कहा कि यद्यपि प्रयुक्त शब्दों का शाब्दिक अर्थ यौन प्रकृति का हो सकता है, किंतु उनका सामान्य प्रयोग किसी विवेकशील एवं सामान्य समझ वाले व्यक्ति में यौन उत्तेजना उत्पन्न नहीं करता।
- इसके विपरीत, ऐसे शब्द प्रायः क्रोध, आक्रोश, निराशा, शोक अथवा उत्साह जैसी भावनाओं की अभिव्यक्ति के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
निष्कर्ष
- वर्ष 2025 में तेलंगाना उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियाँ कठोर अथवा अभद्र भाषा से युक्त हो सकती हैं, किंतु यदि उनसे लोक व्यवस्था के लिए कोई वास्तविक खतरा उत्पन्न नहीं होता, तो उन पर बीएनएस की धारा 352 अथवा 353 लागू नहीं की जा सकती।
- न्यायालयों ने अपने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि किसी कथन को अश्लील सिद्ध करने के लिए यह प्रदर्शित करना आवश्यक है कि वह कामोत्तेजक प्रकृति का था।
- कामोत्तेजक का अर्थ है—ऐसी अभिव्यक्ति या सामग्री जो यौन इच्छा को प्रबल रूप से, अथवा अनुचित ढंग से, व्यक्त या उद्दीप्त करती हो।
- जो सामग्री इस मानदंड पर खरी नहीं उतरती, उसे सामान्यतः आपराधिक विधि के अंतर्गत “अश्लील” नहीं माना जाएगा।
स्रोत: TH
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