पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- 16वें वित्त आयोग (FC) की सिफारिशों से राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता, संसाधनों के वितरण में समानता एवं दक्षता, तथा परिसीमन के पश्चात उत्पन्न राजनीतिक एवं जनसांख्यिकीय प्रभावों को लेकर परिचर्चा शुरू हो गई है।
भारत में वित्त आयोग एवं राजकोषीय संघवाद
- वित्त आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है।
- यह केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के शुद्ध आय के वितरण (ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण), राज्यों के बीच आवंटन (क्षैतिज हस्तांतरण), अनुच्छेद 275 के अंतर्गत अनुदान, तथा राज्य वित्त को सुदृढ़ करने के उपायों की अनुशंसा करता है।
- राजकोषीय संघवाद: यह सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच वित्तीय संबंधों को संदर्भित करता है। इसका उद्देश्य सहकारी संघवाद सुनिश्चित करना, संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना, विकेंद्रीकृत शासन को सशक्त करना, तथा सामाजिक क्षेत्र के व्यय का समर्थन करना है।
- ऊर्ध्वाधर असंतुलन का सुधार: केंद्र के पास अधिक कराधान शक्तियाँ हैं, जबकि राज्यों पर अधिक व्यय का उत्तरदायित्व है।
- क्षैतिज असंतुलन का सुधार: राज्यों के बीच राजकोषीय क्षमता में अंतर।
16वें वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशें
- 41% ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण का संरक्षण: 16वें FC ने राज्यों का हिस्सा विभाज्य कर पूल में 41% पर बनाए रखा, जो 15वें FC की व्यवस्था की निरंतरता है।
- 14वें FC द्वारा 42% से कमी जम्मू एवं कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के गठन के कारण हुई थी।
- समानता पर निरंतर बल: FC ने वित्तीय रूप से कमजोर राज्यों की ओर पुनर्वितरण की नीति को बनाए रखा।
- मुख्य मानदंड एवं भारांक:
- आय असमानता: 42.5%
- जनसंख्या: 17.5%
- क्षेत्रफल, वन एवं पारिस्थितिकी, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन, तथा GDP में योगदान: प्रत्येक 10%
- मुख्य मानदंड एवं भारांक:
- GDP योगदान मानदंड का परिचय: पूर्ववर्ती कर प्रयास मानदंड को प्रतिस्थापित किया गया।
- हालाँकि, वास्तविक GSDP हिस्सों को वर्गमूल परिवर्तन द्वारा संशोधित किया गया, जिससे समृद्ध राज्यों का लाभ कम हुआ।
- कुछ अनुदानों का हटाना: FC ने राजस्व घाटा अनुदान, क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान, तथा राज्य-विशिष्ट अनुदान समाप्त कर दिए।
- राज्यों को ऑफ-बजट उधारी समाप्त करने, देनदारियों को बजट अभिलेखों में सम्मिलित करने, तथा राजकोषीय घाटा GSDP के 3% से नीचे बनाए रखने का परामर्श दिया गया।
| 15वें FC की तुलना में 16वें FC के प्रमुख परिवर्तन | ||
| पहलू | 15वाँ FC | 16वाँ FC |
| ऊर्ध्वाधर वितरण | 41% | 41% यथावत |
| कर प्रयास मानदंड | सम्मिलित | GDP योगदान द्वारा प्रतिस्थापित |
| जनसांख्यिकीय मानदंड | प्रतिलोम प्रजनन दर | जनसंख्या वृद्धि |
| समानता बनाम दक्षता | 75:25 | 70:30 |
| अनुदान | राजस्व घाटा एवं क्षेत्रीय अनुदान | अधिकांशतः समाप्त |
| GDP भारांक | सीमित | वर्गमूल सूत्र द्वारा परिवर्तित रूप में सम्मिलित |
वित्त आयोग के समक्ष प्रमुख चिंताएँ
- उपकर एवं अधिभार का बढ़ता प्रयोग: अनुच्छेद 270 के अंतर्गत उपकर एवं अधिभार राज्यों के साथ साझा नहीं किए जाते।
- इनका हिस्सा सकल कर राजस्व का 15% से अधिक हो गया है।
- राज्यों ने इन्हें विभाज्य कर पूल में शामिल करने या 8–10% पर सीमित करने की माँग की।
- इससे वास्तविक हस्तांतरण घट जाता है, भले ही नाममात्र का हस्तांतरण अधिक दिखे।
- राज्यों का संकुचित राजकोषीय क्षेत्र:राज्य अनेक दबावों का सामना कर रहे हैं:
- GST-संबंधी बाधाएँ: कराधान स्वायत्तता का ह्रास, दरों का तर्कसंगतीकरण जिससे राजस्व लचीलापन कम हुआ।
- COVID-19 प्रभाव: कल्याणकारी व्यय में वृद्धि, राजस्व में कमी, और ऋण भार में वृद्धि।
- केंद्रीय प्रायोजित योजनाएँ (CSS): बंधित व्यय में वृद्धि, और लचीलापन में कमी।
- समानता बनाम दक्षता: पुनर्वितरण एवं आय-समानता की ओर अत्यधिक भारांक।
- दक्षिणी एवं औद्योगिक राज्यों का तर्क है कि दक्ष शासन को दंडित किया जा रहा है, जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों की उपेक्षा हो रही है, और उच्च कर योगदान का पर्याप्त प्रतिफल नहीं मिल रहा।
- दक्षिणी राज्यों के हिस्से में कमी: 6वें FC काल में 24.8% से 15वें FC काल में 15.8% तक।
- वहीं लाभार्थी राज्यों का हिस्सा उल्लेखनीय रूप से बढ़ा।
- स्थायी क्षेत्रीय असमानताएँ: अधिक हस्तांतरण के बावजूद गरीब राज्य सार्वजनिक सेवाओं में पिछड़े हुए हैं।
- स्वास्थ्य व्यय (2022-23): बिहार (₹937 प्रति व्यक्ति), अरुणाचल प्रदेश (₹10,148)।
- शिक्षा व्यय: बिहार (₹20,282 प्रति छात्र); सिक्किम (₹1.3 लाख प्रति छात्र)।
- राजनीतिक अर्थव्यवस्था एवं परिसीमन संबंधी चिंताएँ: भारत के आर्थिक रूप से सशक्त राज्य संसद में सदैव राजनीतिक रूप से प्रभावी नहीं होते।
- परिसीमन के बाद, अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है, जिससे भविष्य के राजकोषीय हस्तांतरण प्रभावित हो सकते हैं।
- इससे राजकोषीय न्याय, सहकारी संघवाद, एवं पुनर्वितरण की राजनीतिक निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
आगे की राह
- वैकल्पिक हस्तांतरण मॉडल: राजकोषीय योगदान एवं आर्थिक दक्षता को अधिक भारांक दिया जाना चाहिए।
- यदि GDP योगदान को मान्यता दी जाती, तो महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं तमिलनाडु को उल्लेखनीय रूप से अधिक हिस्सा मिलता।
- उपकर एवं अधिभार का तर्कसंगतीकरण: इन्हें सकल कर राजस्व के 8–10% तक सीमित किया जाए।
- इनके कुछ हिस्से को विभाज्य पूल में शामिल किया जाए।
- उपकर उपयोग पर पारदर्शिता एवं संसदीय पर्यवेक्षण बढ़ाया जाए।
- राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता में वृद्धि: बंधित अनुदानों को घटाकर असंबद्ध हस्तांतरण बढ़ाए जाएँ।
- योजनाओं के डिज़ाइन में अधिक लचीलापन दिया जाए।
- GST ढाँचे के अंतर्गत राज्यों की कराधान शक्तियों को सुदृढ़ किया जाए।
- समानता एवं दक्षता में संतुलन: भावी वित्त आयोगों को कर प्रयास, राजकोषीय अनुशासन, मानव विकास परिणाम, पूंजीगत व्यय दक्षता, एवं व्यवसाय सुगमता संकेतकों को अधिक भारांक देना चाहिए।
- डेटा-आधारित एवं वैज्ञानिक सूत्रों का प्रयोग: प्रधान घटक विश्लेषण (PCA), समग्र राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक, एवं परिणाम-आधारित मूल्यांकन पद्धतियों का उपयोग किया जाए।
- GST क्षतिपूर्ति एवं राजस्व स्थिरता को सुदृढ़ करना: समय पर GST क्षतिपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
- GST आधार का विस्तार किया जाए।
- डिजिटल प्रणालियों द्वारा अनुपालन सुधारा जाए।
- स्थायी GST स्थिरीकरण तंत्र बनाया जाए।
- अत्यधिक मितव्ययिता के बिना राजकोषीय उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित करना: राजकोषीय उत्तरदायित्व लक्ष्यों को जारी रखा जाए।
- पूंजीगत व्यय, जलवायु लचीलापन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा निवेश हेतु नियंत्रित लचीलापन दिया जाए।
- राजकोषीय समेकन से विकासात्मक व्यय प्रभावित न हो।
- केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं (CSS) का सुधार: योजनाओं की संख्या तर्कसंगत की जाए।
- क्रियान्वयन में लचीलापन बढ़ाया जाए।
- राज्यों की राजकोषीय क्षमता के आधार पर योगदान अनुपात में भिन्नता लाई जाए।
- जनसंख्या आकार मात्र पर नहीं, परिणामों पर प्रोत्साहन: जनसंख्या स्थिरीकरण, बेहतर शिक्षा परिणाम, स्वास्थ्य संकेतक, पर्यावरण संरक्षण, एवं राजस्व एकत्रित करने के प्रयासों हेतु राज्यों को पुरस्कृत किया जाए।
- स्थानीय सरकारों को सुदृढ़ करना: पंचायतों एवं शहरी स्थानीय निकायों को पूर्वानुमेय अनुदान बढ़ाया जाए।
- स्थानीय राजस्व एकत्रित करने की क्षमता सुधारी जाए।
- लेखांकन एवं लेखा-परीक्षण क्षमता विकसित की जाए।
- परिसीमन के पश्चात राजकोषीय संघवाद की सुरक्षा: FC की सिफारिशों को राजनीतिक दबावों से मुक्त रखा जाए।
- केवल जनसांख्यिकीय कारकों पर नहीं, बल्कि वस्तुनिष्ठ राजकोषीय संकेतकों पर आधारित किया जाए।
- संसाधन आवंटन में संवैधानिक निष्पक्षता बनाए रखी जाए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] ‘भारत के क्रमिक वित्त आयोगों की सिफारिशों ने भारत के राजकोषीय संघवाद में समानता और दक्षता के बीच परिचर्चा को तीव्र किया है।’ 16वें वित्त आयोग के हस्तांतरण सूत्र एवं वित्तीय रूप से सशक्त राज्यों द्वारा उठाई गई चिंताओं के संदर्भ में विवेचना कीजिए। |
स्रोत: TH
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वित्त आयोग हस्तांतरण तथा समानता संबंधी मुद्दा