भारत में निर्धनता : मापन, क्षेत्रीय विषमताएँ और नीतिगत चुनौतियाँ

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • एक दशक से अधिक समय पश्चात, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने 2022-23 और 2023-24 के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (CES) जारी किए, जिससे भारत में गरीबी के आकलन, गरीबी रेखा की पद्धति तथा वास्तविक वंचना की सीमा पर पुनः परिचर्चा प्रारम्भ हो गई।

भारत में निर्धनता के बारे में

  • यह व्यक्तियों अथवा परिवारों की उस असमर्थता को संदर्भित करता है, जिसमें वे भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास तथा अन्य मूलभूत आवश्यकताओं से संबंधित न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते।
  • महत्वपूर्ण आर्थिक विकास और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के बावजूद निर्धनता विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में असमान रूप से वितरित बनी हुई है।
  • भारत ने आर्थिक विकास, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के विस्तार तथा आवास, स्वच्छता और विद्युत तक बेहतर पहुँच के माध्यम से दशकों में निर्धनता में उल्लेखनीय कमी देखी है।
  • फिर भी, भारत में निर्धनता निम्नलिखित विशेषताओं को प्रदर्शित करती है—
    • संरचनात्मक विशेषताएँ: निम्न उत्पादकता और अवसरों की कमी से जुड़ी हुई।
    • क्षेत्रीय संकेन्द्रण: कुछ राज्यों और जिलों में अत्यधिक केंद्रित।
    • अंतर-पीढ़ीगत स्थायित्व: शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल की कमी के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहने वाली।

भारत में निर्धनता के मापन की विधियाँ एवं आकलन

  • उपभोग व्यय-आधारित मापन: भारत में निर्धनता का आकलन मुख्यतः प्रति व्यक्ति मासिक उपभोक्ता व्यय (MPCE) तथा NSSO/MoSPI द्वारा संचालित घरेलू उपभोग सर्वेक्षणों के आधार पर किया जाता है।
    • यह पद्धति यह निर्धारित करती है कि कोई व्यक्ति वस्तुओं और सेवाओं की न्यूनतम आवश्यक बास्केट का उपभोग वहन करने में सक्षम है या नहीं।
  • निर्धनता आकलन समितियाँ:
    • अलघ समिति (1979): प्रथम आधिकारिक गरीबी रेखा; मुख्यतः कैलोरी मानकों पर आधारित—ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2400 कैलोरी प्रतिदिन तथा शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 कैलोरी प्रतिदिन।
    • लक्षदवाला समिति (1993): कैलोरी-आधारित दृष्टिकोण को जारी रखा; राज्य-विशिष्ट गरीबी रेखाओं की शुरुआत की।
    • तेंदुलकर समिति (2009): कैलोरी मानकों से हटकर व्यापक उपभोग व्यय पर बल दिया; स्वास्थ्य और शिक्षा व्यय को शामिल किया; तथा आधिकारिक आकलनों में व्यापक रूप से प्रयुक्त हुई।
    • रंगराजन समिति (2014): उच्च गरीबी रेखाओं की अनुशंसा की—ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ₹972 प्रति व्यक्ति प्रति माह तथा शहरी क्षेत्रों के लिए ₹1,407 प्रति व्यक्ति प्रति माह (2011-12 की कीमतों पर)।
      •  इसमें भोजन, वस्त्र, किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं को सम्मिलित किया गया। 
  •  गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्रों के औसत MPCE के 68% तथा शहरी क्षेत्रों के औसत MPCE के 54% के बराबर थी।

CES 2023-24 और 2024-25 पर आधारित वर्तमान अनुमान

  • हाल के उपभोग व्यय आँकड़ों के अनुरूप अद्यतन की गई रंगराजन पद्धति के अनुसार—
    • ग्रामीण भारत: ₹2,802 प्रति व्यक्ति प्रति माह (₹93.4 प्रतिदिन)
    • शहरी भारत: ₹3,778 प्रति व्यक्ति प्रति माह (₹126 प्रतिदिन)
  • अनुमानित निर्धनता अनुपात:
    • ग्रामीण निर्धनता: 29%
    • शहरी निर्धनता: 22%
    • समग्र निर्धनता: 26.8%
  • निर्धनों की संख्या: लगभग 374 मिलियन लोग गरीबी रेखा से नीचे अनुमानित किए गए हैं और उन्हें जीवन-निर्वाह आधारित हस्तक्षेपों की आवश्यकता है।

अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा बनाम भारतीय अनुमान

  • विश्व बैंक की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा: जून 2025 में अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा को क्रय शक्ति समता (PPP) समायोजन के आधार पर $3 प्रतिदिन निर्धारित किया गया।
    • इसके समतुल्य भारत में लगभग ₹60 प्रतिदिन बैठता है; इस मानक के अनुसार भारत की केवल 5.3% जनसंख्या निर्धन मानी जाती है।
  • आर्थिक सर्वेक्षण के अनुमान: तेंदुलकर पद्धति के अनुसार निर्धनता 2011-12 में 21.9% से घटकर 2023-24 में 2.3% रह गई।

निर्धनता की संरचनात्मक एवं क्षेत्रीय प्रकृति

  • उच्च निर्धनता संकेन्द्रण वाले राज्य: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल जैसे राज्य, कुल जनसंख्या में 40% से कम हिस्सेदारी होने के बावजूद, भारत के लगभग 48% निर्धनों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • 45% से अधिक निर्धनता वाले राज्य: झारखंड, छत्तीसगढ़ तथा ओडिशा।
    • भारत के लगभग 80% निर्धन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, महाराष्ट्र तथा राजस्थान में निवास करते हैं।
  • निर्वाह कृषि प्रधान क्षेत्र बिहार, उत्तर प्रदेश तथा असम जैसे राज्यों में निम्न कृषि उत्पादकता, छोटे भू-स्वामित्व, मौसमी रोजगार तथा आर्थिक विविधीकरण के अभाव जैसी समस्याएँ विद्यमान हैं।
  • खनिज-संपन्न क्षेत्र: झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा तथा राजस्थान जैसे राज्यों में संसाधन अभिशाप , स्थानीय औद्योगीकरण की कमी, विस्थापन तथा कमजोर मानव विकास संकेतकों जैसी समस्याएँ पाई जाती हैं।

संबंधित सरकारी उपाय एवं प्रयास

  • खाद्य सुरक्षा संबंधी उपाय:
    • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013: लगभग 67% जनसंख्या को रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराता है तथा संवेदनशील परिवारों को पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
    • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY): NFSA के लाभार्थियों को निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराती है तथा कोविड-19 के दौरान और उसके पश्चात महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • रोजगार सृजन कार्यक्रम:
    • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA): ग्रामीण परिवारों को 100 दिनों के मजदूरी-आधारित रोजगार की गारंटी प्रदान करता है; ग्रामीण आय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है; तथा तालाब, सड़क और सिंचाई संरचनाओं जैसी ग्रामीण परिसंपत्तियों का निर्माण करता है।
    • PM विश्वकर्मा योजना: पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को समर्थन प्रदान करती है; कौशल प्रशिक्षण, ऋण सहायता, टूलकिट तथा बाजार संपर्क उपलब्ध कराती है।
    • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): सब्सिडी को सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में हस्तांतरित करता है तथा रिसाव और भ्रष्टाचार को कम करता है।
    • JAM त्रिमूर्ति: जन धन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी के एकीकरण से लक्षित वितरण तथा वित्तीय समावेशन में सुधार हुआ है।
  • वित्तीय समावेशन पहलें:
    • प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY): निर्धन परिवारों के लिए सार्वभौमिक बैंकिंग पहुँच सुनिश्चित करती है तथा बचत और औपचारिक वित्तीय भागीदारी को प्रोत्साहित करती है।
    • मुद्रा योजना: सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को बिना जमानत ऋण प्रदान करती है तथा स्वरोजगार और उद्यमिता को प्रोत्साहन देती है।
  • आवास एवं मूलभूत सुविधाएँ:
    • प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): ग्रामीण एवं शहरी निर्धनों को किफायती आवास उपलब्ध कराती है।
    • जल जीवन मिशन: ग्रामीण परिवारों को कार्यात्मक नल-जल कनेक्शन प्रदान करता है।
    • स्वच्छ भारत मिशन: स्वच्छता में सुधार तथा खुले में शौच की प्रवृत्ति में कमी लाने में सहायक।
    • सौभाग्य योजना: ग्रामीण विद्युतीकरण तथा घरेलू विद्युत पहुँच सुनिश्चित करती है।
  • स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी उपाय:
    • आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY): आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान करती है।
    • पोषण अभियान (POSHAN Abhiyaan): महिलाओं और बच्चों में कुपोषण की समस्या के समाधान हेतु कार्यरत।
    • एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS): पूरक पोषण तथा प्रारंभिक बाल देखभाल सेवाएँ प्रदान करती है।
  • शिक्षा एवं कौशल विकास:
    • समग्र शिक्षा अभियान: एकीकृत विद्यालयी शिक्षा कार्यक्रम।
    • स्किल इंडिया मिशन: व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा रोजगारयोग्यता में वृद्धि पर केंद्रित।
    • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY): युवाओं को उद्योग-उन्मुख कौशल प्रशिक्षण प्रदान करती है।
  • कृषि एवं ग्रामीण विकास संबंधी उपाय:
    • PM-KISAN: किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान करता है।
    • e-NAM: राष्ट्रीय कृषि बाजार मंच।
    • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): सिंचाई कवरेज और जल उपयोग दक्षता का विस्तार करती है।
    • राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM): स्वयं सहायता समूहों (SHGs) तथा महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करता है।
  • आकांक्षी एवं पिछड़े जिलों हेतु उपाय:
    • आकांक्षी जिला कार्यक्रम: स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, अवसंरचना तथा वित्तीय समावेशन के आधार पर पिछड़े जिलों को लक्षित करता है। यह अभिसरण तथा जिला-स्तरीय निगरानी पर बल देता है।
    • खनिज क्षेत्र विकास: जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMF) प्रभावित समुदायों के कल्याण हेतु खनन राजस्व का उपयोग करता है। निधियों का उपयोग विद्यालयों, स्वास्थ्य केंद्रों, पेयजल, कौशल विकास तथा अवसंरचना निर्माण में किया जाता है।
  • सामाजिक सुरक्षा संबंधी उपाय:
    • PM श्रम योगी मानधन: असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए पेंशन योजना।
    • अटल पेंशन योजना: निम्न आय वर्ग के श्रमिकों को पेंशन सहायता प्रदान करती है।
    • e-Shram पोर्टल: असंगठित श्रमिकों के लिए डेटाबेस तथा कल्याणकारी योजनाओं के एकीकरण का मंच।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत में गरीबी मापन की विधियों पर चर्चा कीजिए तथा गरीबी उन्मूलन से संबंधित प्रमुख क्षेत्रीय विषमताओं एवं नीतिगत चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। 

स्रोत: BL

 

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