पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- हाल ही में मानसून सत्र के उपरांत संसदीय कार्य मंत्री द्वारा लोकसभा की 19% और राज्यसभा की 39% कार्यक्षमता की जानकारी दी गई। इससे संसदीय कार्यवाही में व्यवधान के कारण विधायी कार्यों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंताएँ पुनः उभर आई हैं।
भारत में संसदीय व्यवधान के बारे में
- संसदीय व्यवधान से आशय बार-बार होने वाले स्थगन, विरोध-प्रदर्शन, नारेबाजी अथवा ऐसी अन्य कार्रवाइयों से है, जिनके कारण सदनों की निर्धारित कार्यवाही संचालित नहीं हो पाती।
- निरंतर होने वाले व्यवधान संसद के विचार-विमर्श तथा जवाबदेही संबंधी कार्यों को कमजोर करते हैं। हालांकि, विपक्ष द्वारा तत्काल एवं महत्वपूर्ण मुद्दों को सदन के ध्यान में लाने के लिए व्यवधान का प्रयोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक वैध संसदीय साधन हो सकता है।
पूर्व में हुए संसदीय व्यवधान
- शीतकालीन सत्र (2010): 2G स्पेक्ट्रम विवाद तथा संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के गठन की विपक्ष की मांग के बीच सत्र लगभग पूरी तरह बाधित रहा। लोकसभा निर्धारित समय का केवल 5% और राज्यसभा 2% ही कार्य कर सकी।
- शीतकालीन सत्र (2013): 2G संबंधी JPC की रिपोर्ट, तेलंगाना तथा अन्य मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शनों के कारण लोकसभा की उत्पादकता घटकर 6% और राज्यसभा की 19% रह गई।
- अंतरिम बजट सत्र (2014): लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता क्रमशः केवल 21% और 27% रही।
- मानसून सत्र (2015): ललित मोदी एवं व्यापमं विवादों के बीच लोकसभा ने 46%, जबकि राज्यसभा ने केवल 9% निर्धारित समय में कार्य किया।
- शीतकालीन सत्र (2016): नोटबंदी के विरोध में हुए व्यवधानों के कारण लोकसभा और राज्यसभा की उत्पादकता क्रमशः 15% और 18% रही।
- बजट सत्र (2018): कावेरी विवाद, आंध्र प्रदेश के लिए विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा देने की मांग तथा PNB से संबंधित आरोपों ने कार्यवाही को प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता क्रमशः 21% और 27% रही।
- मानसून सत्र (2021): पेगासस संबंधी आरोपों तथा कृषि कानूनों के विरोध के कारण लोकसभा की उत्पादकता 21% और राज्यसभा की 29% रही।
- बजट सत्र (2023): अडानी विवाद, विदेश में राहुल गांधी की टिप्पणियों तथा उसके बाद उनकी अयोग्यता से जुड़े मुद्दों के कारण लोकसभा की उत्पादकता 33% और राज्यसभा की 24% रही।
भारत में विधायी उत्पादकता में गिरावट
- 17वीं लोकसभा (2019–2024) ने 15 सत्रों में केवल 274 बैठकें कीं, जो भारतीय इतिहास में किसी पूर्ण कार्यकाल वाली लोकसभा के लिए सबसे कम है।
- संसदीय स्थायी समितियों को भेजे गए विधेयकों का अनुपात 15वीं लोकसभा (2009–14) में 71% से घटकर 16वीं लोकसभा (2014–19) में 27% और 17वीं लोकसभा (2019–24) में लगभग 16% रह गया।
- मानसून सत्र 2025 के दौरान लोकसभा ने निर्धारित समय का केवल 29%, जबकि राज्यसभा ने 34% समय ही कार्य किया।

संसदीय व्यवधान क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- विधायी समीक्षा प्रभावित होती है: विधेयकों पर पर्याप्त परिचर्चा एवं समितियों द्वारा विस्तृत परीक्षण का अवसर कम हो सकता है।
- कार्यपालिका की जवाबदेही कमजोर होती है: प्रश्नकाल तथा सरकारी नीतियों पर चर्चा के अवसर बाधित या समाप्त हो जाते हैं।
- सार्वजनिक धन का अपव्यय होता है: संसदीय समय एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक संसाधन है, जिसका प्रभावी उपयोग आवश्यक है।
- संघीय मुद्दों को सीमित स्थान मिलता है: राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है; इसलिए उसका प्रभावी ढंग से कार्य करना संघीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
- लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है: संविधान की भावना के अनुरूप संसद का उद्देश्य विभिन्न हितों एवं मतों में संवाद और परिचर्चा के माध्यम से संतुलन स्थापित करना है।
प्रमुख चिंताएँ एवं मुद्दे
- राजनीतिक ध्रुवीकरण एवं टकराव में वृद्धि।
- संसदीय रणनीति के रूप में व्यवधान का बार-बार प्रयोग।
- विपक्ष को अपनी बात संरचित एवं प्रभावी ढंग से रखने के सीमित अवसर।
- महत्वपूर्ण विधेयकों को संसदीय समितियों के पास भेजे जाने में कमी।
- सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहनों का अभाव।
- पर्याप्त विचार-विमर्श के बिना विधेयकों के पारित होने का जोखिम।
आगे की राह: सुदृढ़ीकरण के उपाय
- अधिक सहमति-निर्माण: सरकार को कार्य मंत्रणा संबंधी तंत्रों के माध्यम से विपक्ष की चिंताओं को पर्याप्त अवसर प्रदान करना चाहिए।
- प्रश्नकाल की सुरक्षा: व्यवधानों के कारण कार्यपालिका की जवाबदेही के प्रमुख माध्यम प्रश्नकाल को नियमित रूप से बाधित या समाप्त नहीं होने देना चाहिए।
- संसदीय समितियों को सशक्त बनाना: अधिकाधिक विधेयकों को विस्तृत संसदीय समिति परीक्षण के लिए भेजा जाना चाहिए।
- समयबद्ध चर्चा: प्रमुख राष्ट्रीय एवं राज्य-विशिष्ट मुद्दों पर चर्चा के लिए समर्पित समय निर्धारित किया जा सकता है।
- नियमों का निष्पक्ष अनुपालन: पीठासीन अधिकारियों को वैध असहमति की रक्षा करते हुए अनुशासनात्मक प्रावधानों को समान एवं निष्पक्ष रूप से लागू करना चाहिए।
- संसद के बैठक दिवस बढ़ाना: निर्धारित बैठक के दिनों में वृद्धि से सीमित सत्रों में अत्यधिक विधायी कार्य निपटाने का दबाव कम किया जा सकता है।
- संसदीय आचार-नीति को बढ़ावा देना: राजनीतिक दलों को निरंतर एवं अनावश्यक अवरोध के विरुद्ध द्विदलीय संसदीय मानदंड विकसित करने चाहिए।
निष्कर्ष
- संसदीय व्यवधान कभी-कभी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आवश्यक साधन हो सकता है, किंतु निरंतर व्यवधान विचार-विमर्श का विकल्प नहीं हो सकता।
- उद्देश्य ऐसी संसद का होना चाहिए, जहाँ विपक्ष सरकार से प्रभावी ढंग से प्रश्न कर सके और सरकार परिचर्चा, जवाबदेही तथा संवैधानिक मर्यादाओं के ढाँचे के भीतर कुशलतापूर्वक विधायी कार्य कर सके।
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