इसरो की नाविक प्रणाली अब स्वतंत्र रूप से नौवहन संबंधी आँकड़े उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं :सरकार

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी

संदर्भ 

  • भारतीय तारामंडल आधारित नौवहन प्रणाली (NavIC), परिचालन उपग्रहों की संख्या आवश्यक न्यूनतम सीमा से कम हो जाने के कारण, अब स्वतंत्र रूप से नौवहन सेवाएँ प्रदान करने की क्षमता खो चुकी है।

परिचय

  • वर्तमान में इस प्रणाली के केवल तीन परिचालन उपग्रह ही स्थिति निर्धारण, नौवहन एवं समय-निर्धारण (PNT) सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं।
  • IRNSS-1F उपग्रह पर स्थापित अंतिम परमाणु घड़ी मार्च 2026 में विफल हो गई।
    • चूँकि किसी उपयोगकर्ता की स्थिति का स्वतंत्र रूप से निर्धारण करने के लिए कम-से-कम चार उपग्रहों की आवश्यकता होती है, इसलिए NavIC अब स्वतंत्र रूप से उपयोगकर्ता का स्थान निर्धारित नहीं कर सकता।
  • इस स्थिति ने भारत के स्वदेशी नौवहन नेटवर्क की विश्वसनीयता एवं सुदृढ़ता को लेकर नई चिंताएँ उत्पन्न कर दी हैं। इस नेटवर्क का विकास नागरिक एवं सामरिक उपयोगों के लिए विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से किया गया था।
  • हालांकि, अधिकांश स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं के लिए तत्काल कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होगा, क्योंकि उनके उपकरण सामान्यतः एकाधिक वैश्विक उपग्रह आधारित नौवहन प्रणालियों, जैसे GPS, का संयुक्त रूप से उपयोग करते हैं।

नाविक

  • नाविक (NavIC), जिसे आधिकारिक रूप से भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) के रूप में संचालित किया गया, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा विकसित भारत की स्वदेशी उपग्रह आधारित नौवहन प्रणाली है।
  • इसका उद्देश्य भारत तथा उसकी सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक के आसपास के क्षेत्र में उपयोगकर्ताओं को सटीक स्थिति, वेग एवं समय-निर्धारण (PNT) सेवाएँ उपलब्ध कराना है।
  • प्रमुख विशेषताएँ एवं क्षमताएँ:
    • कवरेज क्षेत्र: सम्पूर्ण भारतीय भू-भाग तथा भारत की सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक का आसपास का क्षेत्र।
    • सटीकता: प्राथमिक कवरेज क्षेत्र में नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए 10 मीटर से बेहतर सटीकता।
      • भारत के मुख्य भू-भाग में 5 मीटर से बेहतर सटीकता।
  • सेवा के प्रकार:
    • मानक स्थिति निर्धारण सेवा (SPS): यह सभी नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध है तथा आधुनिक स्मार्टफ़ोन एवं वाहन ट्रैकिंग प्रणालियों में एकीकृत की जा चुकी है।
    • प्रतिबंधित सेवा (RS): यह एक कूटबद्ध संकेत है, जो केवल अधिकृत सामरिक उपयोगकर्ताओं, जैसे भारतीय सशस्त्र बलों एवं सुरक्षा एजेंसियों, के लिए आरक्षित है।
  • NavIC के मानक स्थिति निर्धारण सेवा संकेत अन्य वैश्विक उपग्रह आधारित नौवहन प्रणालियों, जैसे GPS, GLONASS, Galileo तथा BeiDou, के साथ संगत हैं।
  • NavIC को प्रारंभ में सात उपग्रहों वाले समूह के रूप में विकसित किया गया था, जिसमें तीन उपग्रह भू-स्थिर कक्षा तथा चार उपग्रह झुकी हुई भू-समकालिक कक्षा में स्थापित किए गए थे, ताकि भारत एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में निरंतर सेवाएँ सुनिश्चित की जा सकें।
    • इस कार्यक्रम के अंतर्गत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अब तक 11 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर चुका है, जिनमें प्रतिस्थापन उपग्रह भी शामिल हैं।

नाविक का महत्त्व

  • NavIC का विकास भारत को स्वतंत्र नौवहन क्षमता प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया था, ताकि उसे अमेरिका के GPS, रूस के GLONASS, यूरोप के Galileo तथा चीन के BeiDou जैसी विदेशी प्रणालियों पर पूर्णतः निर्भर न रहना पड़े।
  • स्वदेशी प्रणाली की आवश्यकता 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान स्पष्ट हुई, जब उस क्षेत्र में GPS आँकड़ों तक पहुँच सीमित कर दी गई थी। इससे विदेशी नौवहन प्रणालियों पर निर्भरता के सामरिक जोखिम उजागर हुए।
  • NavIC का उपयोग अनेक नागरिक क्षेत्रों में किया जाता है, जिनमें—
    • वाहन ट्रैकिंग,
    • सड़क, रेल एवं समुद्री नौवहन,
    • आपदा प्रबंधन,
    • सर्वेक्षण,
    • मानचित्रण,
    • स्थान-आधारित सेवाएँ,
    • तथा सटीक समय-निर्धारण शामिल हैं।

आगे की राह

  • परिचालन क्षमता में आई कमी के बावजूद सरकार ने स्पष्ट किया है कि उपयोगकर्ताओं के लिए कोई सुरक्षा अथवा परिचालन संबंधी जोखिम उत्पन्न नहीं हुआ है।
  • भारतीय सशस्त्र बल भी अपनी परिचालन क्षमता को बिना किसी व्यवधान के बनाए रखने के लिए संकर वैश्विक उपग्रह आधारित नौवहन ढाँचे का उपयोग कर रहे हैं।
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अब पुनः उपग्रह समूह का निर्माण कर भारत तथा उसकी सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में पूर्णतः स्वतंत्र नौवहन सेवाएँ बहाल करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
  • NVS-03 उपग्रह प्रक्षेपण के लिए पूर्णतः तैयार है, जबकि NVS-04 तथा NVS-05 वर्तमान में निर्माण एवं विकास के उन्नत चरण में हैं।

स्रोत: BS

 

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