कावेरी नदी
पाठ्यक्रम: GS-1/भूगोल
संदर्भ
- तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु परियोजना को कोई भी वैधानिक अथवा प्रशासनिक स्वीकृति तब तक न दी जाए, जब तक कि वह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (2007) के निर्णय तथा कावेरी जल बँटवारे पर उच्चतम न्यायालय के वर्ष 2018 के निर्णय के अनुरूप न हो।
कावेरी नदी के बारे में
- कावेरी दक्षिण भारत की एक अंतर्राज्यीय नदी तथा प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख पूर्ववाहिनी नदियों में से एक है, जो अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- इसका उद्गम कर्नाटक के कोडागु (कूर्ग) जिले में पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि पहाड़ियों स्थित तलकावेरी से होता है।
- कावेरी नदी बेसिन कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल तथा पुडुचेरी तक विस्तृत है तथा इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 81,155 वर्ग किलोमीटर है।
- नदी की कुल लंबाई लगभग 800 किलोमीटर है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ:
- हरंगी
- हेमावती
- शिम्शा
- अर्कावती
- दाएँ तट की सहायक नदियाँ:
- लक्ष्मणतीर्था
- काबिनी
- सुवर्णवती
- भवानी
- नोय्यल
- अमरावती
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ:

स्रोत: TH
पीएम केयर्स निधि(PM CARES Fund)
पाठ्यक्रम: GS-2/शासन | GS-3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- पीएम केयर्स निधि ने वित्तीय वर्ष 2022-23 के बाद से अब तक कोई भी लेखा-परीक्षित वित्तीय विवरण सार्वजनिक नहीं किया है।
पीएम केयर्स निधि
- प्रधानमंत्री नागरिक सहायता एवं आपातकालीन स्थिति राहत निधि (PM CARES Fund) एक सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास है।
- इसकी स्थापना मार्च 2020 में सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों तथा अन्य आपदाओं के दौरान राहत कार्यों के समर्थन हेतु की गई थी।
- यह पूर्णतः स्वैच्छिक अंशदानों से संचालित होता है तथा इसकी लेखा-परीक्षा एक स्वतंत्र लेखा-परीक्षक द्वारा की जाती है।
- प्रधानमंत्री इस निधि के पदेन अध्यक्ष हैं, जबकि रक्षा मंत्री, गृह मंत्री तथा वित्त मंत्री इसके पदेन न्यासी हैं।
- इस निधि में दिए गए दान पर आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80G के अंतर्गत 100% कर कटौती का लाभ प्राप्त होता है।
- साथ ही, यह दान कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) व्यय के रूप में भी मान्य है।
- इस निधि को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के अंतर्गत भी छूट प्रदान की गई है, जिससे यह विदेशी व्यक्तियों एवं संस्थाओं से नामित विदेशी अंशदान खाते के माध्यम से दान प्राप्त कर सकती है।
उद्देश्य
- सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों, आपदाओं एवं प्राकृतिक विपदाओं के दौरान राहत एवं सहायता प्रदान करना।
- अनुसंधान, औषधि निर्माण सुविधाओं तथा स्वास्थ्य अवसंरचना के विकास को समर्थन देना।
- प्रभावित व्यक्तियों एवं समुदायों को वित्तीय सहायता एवं अनुदान उपलब्ध कराना।
क्या आप जानते हैं?
- प्रधानमंत्री कार्यालय ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत दायर एक आवेदन के उत्तर में पीएम केयर्स निधि के गठन एवं संचालन से संबंधित जानकारी देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि यह निधि सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत “लोक प्राधिकरण” नहीं है।
- वर्तमान में पीएम केयर्स निधि सूचना का अधिकार अधिनियम, संसदीय परीक्षण तथा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा लेखा-परीक्षा के दायरे से बाहर है।
स्रोत: TH
संसदीय समिति द्वारा ध्रुवीय(Polar) राजदूत नियुक्त करने एवं आर्कटिक परिषद् की सदस्यता प्राप्त करने की सिफारिश
पाठ्यक्रम: GS-2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- विदेश मामलों संबंधी संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि भारत को आर्कटिक क्षेत्र से जुड़े मामलों में अपनी भागीदारी सुदृढ़ करने के लिए एक ध्रुवीय राजदूत नियुक्त करना चाहिए तथा आर्कटिक परिषद् की पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
परिचय
- वर्तमान में भारत आर्कटिक परिषद् के 13 पर्यवेक्षक देशों में से एक है।
- इस परिषद् में आठ ऐसे देश शामिल हैं, जिनका भू-भाग आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है।
- पर्यवेक्षक देशों को निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त नहीं होता।
- वे परिषद् को वित्तीय योगदान नहीं दे सकते तथा आर्कटिक क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से अनुसंधान भी नहीं कर सकते।
आर्कटिक परिषद्
- यह एक अंतर-सरकारी मंच है, जिसकी स्थापना आर्कटिक क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास तथा वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी।
- इसके आठ सदस्य देश हैं—
- कनाडा,
- डेनमार्क,
- फ़िनलैंड,
- आइसलैंड,
- नॉर्वे,
- रूस,
- स्वीडन,
- संयुक्त राज्य अमेरिका।
- इसकी स्थापना वर्ष 1996 में ओटावा घोषणा के माध्यम से की गई थी।
आर्कटिक अनुसंधान में भारत की भूमिका
- यद्यपि भारत आर्कटिक क्षेत्र का देश नहीं है, फिर भी वह आर्कटिक अनुसंधान में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
- राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र: भारत यहाँ जलवायु परिवर्तन, समुद्री जैव विविधता तथा हिमनदों की गतिशीलता से संबंधित वैज्ञानिक अनुसंधान करता है।
- भारत की आर्कटिक नीति: “भारत और आर्कटिक : सतत विकास के लिए साझेदारी का निर्माण” शीर्षक से भारत की आर्कटिक नीति वर्ष 2022 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा जारी की गई।
- हिमाद्रि अनुसंधान केंद्र: भारत ने वर्ष 2008 में नॉर्वे के स्वालबार्ड में अपना अनुसंधान केंद्र “हिमाद्रि” स्थापित किया।
- इस केंद्र का उद्देश्य आर्कटिक की जलवायु प्रणालियों तथा उनके वैश्विक प्रभावों का अध्ययन करना है।
स्रोत: IE
भारत समुद्री बीमा पूल (BMIP) के अंतर्गत संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति बीमा
पाठ्यक्रम: GS-3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- वित्तीय सेवा विभाग ने भारत समुद्री बीमा पूल (BMIP) के अंतर्गत भारत का प्रथम संप्रभु गारंटी समर्थित संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति बीमा उत्पाद प्रारंभ किया है।
भारत का प्रथम संप्रभु गारंटी समर्थित संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति बीमा उत्पाद
- इसे न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी द्वारा विकसित किया गया है।
- यह तृतीय पक्ष देयताओं के विरुद्ध वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, जिनमें शामिल हैं—
- चालक दल एवं माल से संबंधित देयता,
- प्रदूषण से संबंधित देयता,
- डूबे हुए जहाज़ों को हटाने का व्यय,
- 24×7 बंदरगाह संवाददाता नेटवर्क।
- बीमा पूल की संयुक्त क्षमता के माध्यम से 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर तक की क्षतिपूर्ति सीमा उपलब्ध कराई जाती है।
भारत समुद्री बीमा पूल (BMIP)
- अप्रैल 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹12,980 करोड़ की संप्रभु गारंटी के साथ भारत समुद्री बीमा पूल की स्थापना को स्वीकृति दी, ताकि समुद्री बीमा कवरेज की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
- इसका उद्देश्य भारतीय ध्वज वाले अथवा भारतीय नियंत्रण वाले जहाज़ों तथा भारत से आने-जाने वाले मालवाहक जहाज़ों को, उच्च भू-राजनीतिक जोखिम वाले क्षेत्रों में भी, किफायती समुद्री बीमा उपलब्ध कराना है।
- यह तृतीय पक्ष देयता बीमा के लिए अंतरराष्ट्रीय संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति क्लबों पर भारत की निर्भरता को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
बीमा कवरेज
- यह पूल समुद्री क्षेत्र के प्रमुख जोखिमों को कवर करता है, जिनमें शामिल हैं—
- जहाज़ का ढाँचा एवं मशीनरी।
- माल बीमा।
- संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति बीमा।
- युद्ध जोखिम बीमा।
- सदस्य बीमा कंपनियाँ कुल ₹950 करोड़ की बीमा अंडरराइटिंग क्षमता तक बीमा पॉलिसियाँ जारी करेंगी।
उद्देश्य
- समुद्री युद्ध जोखिम बीमा की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- देश में समुद्री बीमा अंडरराइटिंग क्षमता का विकास करना।
- भारत के जहाज़रानी एवं व्यापार क्षेत्र से जुड़े हितधारकों का विश्वास सुदृढ़ करना।
- संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति बीमा को भी इस पूल में सम्मिलित करने से भारत की समुद्री जोखिम प्रबंधन व्यवस्था अधिक सशक्त होगी तथा समुद्री बीमा तंत्र की लचीलापन क्षमता में वृद्धि होगी।
स्रोत: Air
लैवेंडर की खेती
पाठ्यक्रम: GS-3/कृषि
संदर्भ
- जम्मू-कश्मीर में लैवेंडर की खेती का विस्तार हो रहा है, क्योंकि किसान अपेक्षाकृत गर्म होती सर्दियों, अनियमित वर्षा तथा सिंचाई स्रोतों में कमी की परिस्थितियों के अनुरूप अधिक उपयुक्त फसलों की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
परिचय
- वर्ष 1970 में वैज्ञानिक अख्तर हुसैन ने बुल्गारिया से लैवेंडर को जम्मू-कश्मीर में परिचित कराया।
- लैवेंडर एक बहुवर्षीय झाड़ीदार पौधा है, जो ढलान वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह उगता है तथा पूरे बढ़वार काल में केवल एक या दो बार सिंचाई की आवश्यकता होती है।
- यह स्वाभाविक रूप से अनेक कीटों के प्रति प्रतिरोधी होता है तथा रोपण के बाद लगभग दो दशकों तक पुष्प उत्पादन करता रहता है।

- वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने जम्मू-कश्मीर के समशीतोष्ण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त लैवेंडर की उन्नत किस्म विकसित की तथा किसानों को निःशुल्क पौधे और सम्पूर्ण कृषि तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई।
- परिषद ने जम्मू-कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों में आवश्यक तेल निष्कर्षण हेतु आसवन इकाइयाँ भी स्थापित की हैं।
- जम्मू-कश्मीर में लैवेंडर की खेती की सफलता के कारण इसे “बैंगनी क्रांति” के नाम से जाना जाने लगा।
महत्त्व
- लैवेंडर की खेती से आवश्यक तेल, सूखे पुष्प तथा लैवेंडर शहद के माध्यम से किसानों के लिए आय के नए स्रोत विकसित हुए हैं।
- इसने ग्रामीण जम्मू-कश्मीर की महिलाओं के लिए रोजगार एवं आजीविका के नए अवसर भी सृजित किए हैं।
- प्रत्येक वर्ष ग्रीष्म ऋतु में भद्रवाह के खिले हुए लैवेंडर के खेत पर्यटकों, छायाकारों तथा शोधकर्ताओं को आकर्षित करते हैं, जिससे मौसमी पर्यटन अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिला है।
स्रोत: DTE
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पैलेटाइज़िंग प्रौद्योगिकी
पाठ्यक्रम: GS-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
समाचार में
- गोदामों में बार-बार होने वाले भार उठाने एवं वस्तुओं की छँटाई के कार्यों के स्वचालन के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पैलेटाइज़िंग प्रौद्योगिकी का उपयोग तीव्रता से बढ़ रहा है। फ्यूचर मार्केट इनसाइट्स के अनुसार वर्ष 2036 तक इसका वैश्विक बाज़ार 9 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
परिचय
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पैलेटाइज़िंग एवं डीपैलेटाइज़िंग से आशय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कंप्यूटर विज़न, मशीन लर्निंग तथा रोबोटिक भुजाओं के उपयोग द्वारा वस्तुओं को पैलेट पर व्यवस्थित रूप से रखना तथा वहाँ से उतारने की प्रक्रिया का स्वचालन करना है।
- पारंपरिक रोबोटिक पैलेटाइज़र का उपयोग कई दशकों से विनिर्माण उद्योग में किया जा रहा है। किंतु ये प्रणालियाँ सामान्यतः पूर्व-निर्धारित प्रोग्रामिंग पर आधारित होती हैं तथा समान आकार एवं आकृति वाले उत्पादों के साथ ही प्रभावी ढंग से कार्य करती हैं।
- मिश्रित आकार के कार्टन, अनियमित पैकेजिंग अथवा क्षतिग्रस्त बक्सों के प्रबंधन में ये पारंपरिक प्रणालियाँ अपेक्षाकृत कम प्रभावी होती हैं।
- इन सीमाओं को दूर करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पैलेटाइज़िंग प्रणाली विकसित की गई है।
- इसमें रोबोटिक भुजाओं, कंप्यूटर विज़न, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सॉफ़्टवेयर तथा मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का समन्वित उपयोग किया जाता है।
- यह प्रणाली विभिन्न प्रकार के उत्पादों की पहचान कर सकती है, उन्हें पकड़ने के उपयुक्त बिंदु निर्धारित कर सकती है तथा प्रत्येक नए पैकेज विन्यास के लिए मैनुअल पुनः प्रोग्रामिंग के बिना सबसे सुरक्षित ढंग से वस्तुओं को व्यवस्थित करने का निर्णय ले सकती है।

स्रोत: BS
भारत का प्रथम दूरसंचार विनिर्माण क्षेत्र (TMZ)
पाठ्यक्रम: GS-3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- हाल ही में दूरसंचार विभाग तथा मध्य प्रदेश सरकार ने ग्वालियर में भारत का प्रथम समर्पित दूरसंचार विनिर्माण क्षेत्र स्थापित करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
परिचय
- यह 350 एकड़ में विकसित एक औद्योगिक परिसर होगा, जहाँ कोई कंपनी केवल दूरसंचार उपकरणों का संयोजन (असेंबली) ही नहीं करेगी, बल्कि उत्पाद का अभिकल्पन (डिज़ाइन), स्थल पर स्थित प्रयोगशाला में परीक्षण, प्रमाणीकरण तथा विनिर्माण जैसे सभी कार्य एक ही परिसर में कर सकेगी।
- इसी अवधारणा को “प्लग-एंड-प्ले” मॉडल कहा जाता है।
- इसके संचालन के लिए एक विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) का गठन किया जाएगा, जिसमें मध्य प्रदेश सरकार की 51% तथा दूरसंचार विभाग की 49% हिस्सेदारी होगी।
- यह क्षेत्र दूरसंचार क्षेत्र की संपूर्ण मूल्य शृंखला को समाहित करेगा, जिसमें—
- मोबाइल हैंडसेट,
- प्रकाशीय फाइबर केबल,
- एंटीना,
- राउटर,
- उपग्रह संचार उपकरण,
- तथा अर्द्धचालक चिप का विनिर्माण शामिल होगा।
- इस परियोजना से लगभग ₹3,500 करोड़ के निवेश आकर्षित होने तथा राज्य में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होने की संभावना है।
स्रोत: AIR
हौबारा बस्टर्ड
पाठ्यक्रम: GS-3/समाचारों में प्रजातियाँ
समाचार में
- उज़्बेकिस्तान, कज़ाख़स्तान तथा संयुक्त अरब अमीरात के सहयोग से काराकल्पाकस्तान स्थित अराल सागर क्षेत्र में 672 कृत्रिम प्रजनन द्वारा तैयार हौबारा बस्टर्ड पक्षियों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाएगा।
हौबारा बस्टर्ड के बारे में
- एशियाई हौबारा (क्लैमाइडोटिस मैक्वीनी) को मैकक्वीन बस्टर्ड के नाम से भी जाना जाता है।
- यह बस्टर्ड कुल का पक्षी है। इसी कुल में भारत का ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) भी शामिल है, यद्यपि संरक्षण की दृष्टि से दोनों की स्थिति भिन्न है।
- यह मुख्यतः शुष्क एवं अर्ध-शुष्क आवासों में पाया जाता है, जिनमें—
- रेतीले एवं पथरीले मरुस्थल,
- कंकरीले मैदान,
- शुष्क घासभूमियाँ,
- तथा खुले झाड़ीदार क्षेत्र शामिल हैं।
- इसका प्राकृतिक वितरण मध्य एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण एशिया के कुछ भागों, विशेषकर थार मरुस्थल एवं कच्छ के रण, तक फैला हुआ है।
- इसके शरीर का रेतीले-भूरे रंग का चित्तीदार ऊपरी भाग तथा हल्के रंग का निचला भाग इसे मरुस्थलीय मिट्टी में आसानी से छिप जाने में सहायता करता है।
- इसके मजबूत पैर इसे कठिन मरुस्थलीय भू-भाग पर तीव्र गति से चलने में सक्षम बनाते हैं तथा यह सामान्यतः तभी उड़ान भरता है जब उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता।
- संरक्षण स्थिति:
- IUCN रेड लिस्ट — संकटग्रस्त
- वन्य जीव एवं वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधी अभिसमय (CITES) — परिशिष्ट-I
- (अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक व्यापार पर सख्त प्रतिबंध)
- प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय — परिशिष्ट-I
- (प्रवास मार्गों में कठोर संरक्षण का प्रावधान)
स्रोत: DTE
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संक्षिप्त समाचार 31-07-2026