पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- येल विश्वविद्यालय ने पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक (EPI), 2026 जारी किया, जिसमें भारत को 177 देशों में 176वाँ स्थान प्राप्त हुआ। इस रिपोर्ट ने भारत की निरंतर बनी हुई पर्यावरणीय चुनौतियों को रेखांकित किया तथा इसकी कार्यप्रणाली एवं नीतिगत प्रभावों को लेकर पुनः व्यापक चर्चा प्रारंभ हो गई।
पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक (EPI)
- यह येल पर्यावरण कानून एवं नीति केंद्र तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी विज्ञान सूचना नेटवर्क केंद्र द्वारा संयुक्त रूप से विकसित द्विवार्षिक वैश्विक सूचकांक है।
- उद्देश्य:
- यह मापता है कि विभिन्न देश पर्यावरणीय स्वास्थ्य एवं पारिस्थितिकी तंत्र की सुदृढ़ता की रक्षा कितनी प्रभावी ढंग से करते हैं।
- यह पर्यावरणीय परिणामों तथा नीतियों की प्रभावशीलता का आँकड़ों पर आधारित मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
- यह सरकारों को पर्यावरणीय शासन को सुदृढ़ बनाने हेतु प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने में सहायता प्रदान करता है।
प्रमुख निष्कर्ष (EPI 2026)
- एस्टोनिया 74.79 अंकों के साथ प्रथम स्थान पर रहा, जबकि लाओस सबसे निचले स्थान पर रहा।
- अधिक सुदृढ़ पर्यावरणीय कानूनों एवं संस्थागत क्षमता के कारण अनेक औद्योगिक देशों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा।
- वायु प्रदूषण, जैव विविधता का ह्रास तथा जलवायु परिवर्तन शमन आज भी वैश्विक स्तर पर प्रमुख चिंताएँ बनी हुई हैं।
- पर्यावरणीय गुणवत्ता का मूल्यांकन निम्नलिखित क्षेत्रों के आधार पर किया जाता है—
- वायु गुणवत्ता,
- जलवायु परिवर्तन,
- जैव विविधता,
- जल संसाधन,
- कृषि,
- मत्स्य पालन,
- अपशिष्ट प्रबंधन,
- स्वच्छता।

भारत से संबंधित निष्कर्ष (2026)
- भारत को 177 देशों में 176वाँ स्थान प्राप्त हुआ तथा उसका स्कोर 22.46 रहा।
- पूर्व वर्षों में भारत की रैंकिंग निम्नानुसार रही—
- 2016 – 141वाँ
- 2018 – 177वाँ
- 2020 – 168वाँ
- 2022 – 180वाँ
- 2024 – 176वाँ
- प्रमुख अवलोकन: वर्ष 2022 से भारत लगातार पाँच सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल रहा है।
- रिपोर्ट के अनुसार भारत के समक्ष आर्थिक विकास, ऊर्जा तक पहुँच तथा पर्यावरणीय सततता के मध्य संतुलन स्थापित करना एक बड़ी चुनौती है।
- बढ़ते शहरीकरण एवं औद्योगीकरण के कारण वायु गुणवत्ता, जैव विविधता तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर निरंतर दबाव बना हुआ है।
सुधार वाले क्षेत्र
- जलवायु परिवर्तन (130वाँ स्थान): विगत एक दशक में भारत के प्रदर्शन में 13.98 अंकों का सुधार हुआ है।
- यह नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार, ऊर्जा दक्षता में वृद्धि तथा जलवायु परिवर्तन संबंधी विनियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को दर्शाता है।
- अपशिष्ट प्रबंधन (141वाँ स्थान): नगर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कार्यक्रमों तथा स्वच्छ भारत मिशन के कारण इस क्षेत्र में प्रगति हुई है।
- स्वच्छता (141वाँ स्थान): स्वच्छता अवसंरचना के विस्तार तथा शौचालयों तक बेहतर पहुँच के कारण सकारात्मक सुधार दर्ज किया गया है।
प्रमुख चिंता के क्षेत्र
- वायु गुणवत्ता (174वाँ स्थान): राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के बावजूद विगत एक दशक में वायु गुणवत्ता का स्कोर कुछ गिरा है।
- इसके प्रमुख स्रोत हैं—
- वाहनों से होने वाला उत्सर्जन,
- कोयला आधारित विद्युत उत्पादन,
- औद्योगिक प्रदूषण,
- निर्माण कार्यों से उत्पन्न धूल,
- बायोमास का दहन।
- इसके प्रमुख स्रोत हैं—
- जैव विविधता (174वाँ स्थान): आवासीय क्षेत्रों का विनाश, वनों की कटाई, आधारभूत संरचना का विस्तार तथा पारिस्थितिकी तंत्र का विखंडन प्रमुख समस्याएँ बनी हुई हैं।
- वृक्ष आच्छादन: वनों के अन्य उपयोगों में परिवर्तन तथा भूमि उपयोग परिवर्तन के कारण पिछले दशक में प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई है।
- मत्स्य पालन: अत्यधिक दोहन तथा जलीय आवासों के क्षरण के कारण सततता संबंधी संकेतकों में गिरावट आई है।
- कीटनाशक प्रदूषण: रासायनिक आधारित कृषि पर निरंतर निर्भरता के कारण पर्यावरणीय प्रदर्शन प्रभावित हुआ है।
- शहरी पर्यावरण प्रबंधन: अनेक नगरों में अपशिष्ट जल का उपचार तथा प्रदूषण नियंत्रण अभी भी अपर्याप्त है।
भारत में संबंधित प्रयास
- संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 48(क) – पर्यावरण का संरक्षण एवं सुधार।
- अनुच्छेद 51(क)(ग) – प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य।
- सरकारी पहलें:
- राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम।
- जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना।
- स्वच्छ भारत मिशन।
- नमामि गंगे कार्यक्रम।
- हरित भारत मिशन।
- राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना।
- प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण निधि।
- जल जीवन मिशन।
- प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम – विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व।
- मिशन लाइफ (पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली)।
वैश्विक स्तर पर संबंधित प्रयास
- पेरिस समझौता (2015)।
- संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य, विशेषकर लक्ष्य 6, 11, 12, 13, 14 एवं 15।
- जैव विविधता पर अभिसमय।
- वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा, कुनमिंग–मॉन्ट्रियल (2022)।
- जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा अभिसमय।
- आर्द्रभूमियों पर रामसर अभिसमय।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल तथा किगाली संशोधन।
- संयुक्त राष्ट्र पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन दशक (2021–2030)।
आगे की राह
- पर्यावरणीय नियमों के प्रभावी अनुपालन हेतु निगरानी एवं प्रवर्तन तंत्र को सुदृढ़ बनाया जाए।
- स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण को तीव्र गति प्रदान करते हुए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम की जाए।
- शहरी वायु गुणवत्ता में सुधार हेतु स्वच्छ परिवहन, औद्योगिक उत्सर्जन का प्रभावी नियमन तथा धूल प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए।
- अपशिष्ट जल शोधन तथा एकीकृत शहरी अपशिष्ट प्रबंधन को सुदृढ़ किया जाए।
- सतत कृषि को प्रोत्साहित करते हुए कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग में कमी लाई जाए तथा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाए।
- पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन, वनीकरण तथा जैव विविधता संरक्षण संबंधी गतिविधियों का विस्तार किया जाए।
- पर्यावरणीय आँकड़ों की गुणवत्ता, पारदर्शिता तथा परिणाम-आधारित निगरानी को सुदृढ़ बनाया जाए।
- संतुलित एवं समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए विकास योजनाओं में पर्यावरणीय सततता को समाहित किया जाए।
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