जल बजट निर्धारण एवं भारत की ग्रामीण जल सुरक्षा

पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/जल संरक्षण

संदर्भ

  • भारत में बढ़ते जल-संकट, भूजल स्तर में निरंतर गिरावट तथा कृषि क्षेत्र की बढ़ती जल मांग के बीच जल बजट निर्धारण ग्रामीण जल शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभरकर सामने आया है।

जल बजट निर्धारण क्या है?

  • जल बजट निर्धारण एक ऐसी व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत किसी परिभाषित भौगोलिक इकाई—जैसे ग्राम, जलग्रहण क्षेत्र , विकासखंड अथवा जिला—में उपलब्ध जल संसाधनों एवं उनकी मांग का आकलन किया जाता है, ताकि जल उपयोग और नवीकरणीय जल उपलब्धता के मध्य संतुलन स्थापित किया जा सके।
  • इसके अंतर्गत वर्षा, सतही जल तथा भूजल पुनर्भरण जैसे जल स्रोतों की उपलब्धता का आकलन कृषि, घरेलू उपयोग, पशुपालन एवं उद्योगों की कुल जल मांग के संदर्भ में किया जाता है।

भारत को जल बजट निर्धारण की आवश्यकता क्यों है?

  • सुशासन एवं साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण: जल बजट निर्धारण नीति-निर्माताओं एवं स्थानीय प्रशासन को साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में सहायता प्रदान करता है।
    • यह जल अधिशेष एवं जल-अभाव वाले क्षेत्रों की पहचान कर विभिन्न क्षेत्रों के मध्य जल के कुशल एवं न्यायसंगत आवंटन को सुनिश्चित करता है।
  • जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव: भारत विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 17.5 प्रतिशत भाग वहन करता है।
    • विश्व के कुल पशुधन का लगभग 11.6 प्रतिशत भारत में है।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपयोग का लगभग 80–90 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र द्वारा उपभोग किया जाता है।
    • इन परिस्थितियों के कारण देश के जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव उत्पन्न होता है।

सरकारी पहलें

  • जल जीवन मिशन (JJM): वर्ष 2019 में प्रारंभ किए गए इस मिशन का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (FHTC) उपलब्ध कराना है।
    • इस मिशन के माध्यम से लगभग प्रत्येक दस में से आठ ग्रामीण परिवारों तक नल से जलापूर्ति पहुँचाई जा चुकी है।
    • यह स्वास्थ्य एवं स्वच्छता में सुधार करता है।
    • महिलाओं पर जल-संग्रहण का भार कम करता है।
    • विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन को सुदृढ़ बनाता है।
    • मिशन की अवधि को वर्ष 2028 तक बढ़ा दिया गया है।
  • अटल भूजल योजना (ATAL JAL): यह योजना जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में सतत भूजल प्रबंधन पर केंद्रित है।
    • प्रमुख विशेषताएँ:
      • सामुदायिक भागीदारी
      • जल बजट निर्धारण
      • जलभृत (Aquifer) मानचित्रण
      • व्यवहारगत परिवर्तन
    • यह योजना आपूर्ति-आधारित प्रबंधन से मांग-आधारित प्रबंधन की ओर संक्रमण को दर्शाती है।
  • राष्ट्रीय जल मिशन (NWM): राष्ट्रीय जल मिशन जल बजट निर्धारण को एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM) के आधारभूत तत्व के रूप में मान्यता प्रदान करता है।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इस योजना का उद्देश्य “प्रति बूंद अधिक फसल” सुनिश्चित करना है।
    • प्रमुख घटक:
      • सूक्ष्म सिंचाई
      • ड्रिप सिंचाई प्रणाली
      • स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली
      • जल-कुशल कृषि पद्धतियाँ
  • अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT):
    • इस मिशन का उद्देश्य—
      • शहरी जलापूर्ति में सुधार,
      • मलजल शोधन प्रणालियों का विकास,
      • अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग को बढ़ावा देना है।
    • तीव्रता से बढ़ती जनसंख्या एवं प्रदूषण के कारण शहरी भारत पर जल संबंधी दबाव लगातार बढ़ रहा है।
  • नमामि गंगे कार्यक्रम: यह एक समेकित नदी पुनर्जीवन कार्यक्रम है, जिसका ध्यान निम्नलिखित क्षेत्रों पर केंद्रित है—
    • प्रदूषण नियंत्रण
    • मलजल शोधन
    • जैव विविधता संरक्षण
    • नदी तट विकास
    • यह नदी शासन के नदी बेसिन आधारित दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है।
  • वरुणी वेब अनुप्रयोग: यह एक डिजिटल मंच है, जो आँकड़ा-आधारित विश्लेषण के माध्यम से विकासखंड स्तर पर जल बजट निर्धारण को समर्थन प्रदान करता है।
    • उपयोगिता: जल अधिशेष एवं जल-अभाव वाले क्षेत्रों की पहचान
      • स्थानीय प्रशासन को निर्णय-निर्माण में सहायता
  • जलयुक्त शिवार अभियान (JSA): वर्ष 2014 में प्रारंभ इस अभियान का उद्देश्य भूजल पुनर्भरण एवं जल संरक्षण के माध्यम से गाँवों को सूखा-प्रतिरोधी बनाना है।
    • प्रमुख उपलब्धियाँ: 11,000 से अधिक गाँवों को सूखा-मुक्त बनाने में सहायता।
      • भूजल स्तर में लगभग 1.5 से 2 मीटर तक वृद्धि।
      • कृषि उत्पादकता में 30–50 प्रतिशत तक सुधार।

चुनौतियाँ

  • संस्थागत विखंडन: सिंचाई, पेयजल, भूजल, स्वच्छता तथा शहरी जलापूर्ति का प्रबंधन विभिन्न एजेंसियों द्वारा किया जाता है।
    • इसके परिणामस्वरूप—
      • नीतिगत अतिव्यापन,
      • समन्वय की कमी,
      • तथा जवाबदेही का अभाव उत्पन्न होता है।
  • अंतर्राज्यीय जल विवाद: कावेरी जल विवाद
    • कृष्णा जल विवाद
    • रावी–ब्यास जल विवाद
    • जैसे उदाहरण जल-साझाकरण में सहकारी संघवाद की सीमाओं को उजागर करते हैं।
  • अभियांत्रिकी-केंद्रित दृष्टिकोण की प्रधानता: भारत की जल प्रबंधन नीतियाँ ऐतिहासिक रूप से बड़े बाँधों, नहरों एवं सिंचाई अवसंरचना पर केंद्रित रही हैं।
    • यह दृष्टिकोण जल आपूर्ति बढ़ाने को प्राथमिकता देता है, जबकि पारिस्थितिकीय स्थिरता एवं मांग प्रबंधन अपेक्षाकृत उपेक्षित रह जाते हैं।
  • कमजोर आँकड़ा प्रणाली: देश में विश्वसनीय, व्यापक एवं सुलभ जल आँकड़ों का अभाव है। इसके परिणामस्वरूप—
    • अपर्याप्त योजना निर्माण,
    • जल का अकुशल आवंटन,
    • तथा जल संसाधनों का अनियंत्रित दोहन होता है।
  • कृषि नीतियाँ: धान एवं गेहूँ जैसी अधिक जल-आधारित फसलों को प्रोत्साहित करने वाली कृषि नीतियों के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ है।
  • जलवायु परिवर्तन: वर्षा के प्रतिरूपों में परिवर्तन के कारण—
    • बाढ़,
    • सूखा,
    • तथा चरम मौसमी घटनाओं
    • की आवृत्ति एवं तीव्रता बढ़ रही है, जिससे जलवायु-सहिष्णु जल शासन की आवश्यकता बढ़ गई है।
  • प्रदूषण एवं जल गुणवत्ता: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्टों के अनुसार—
    • अनुपचारित मलजल एवं औद्योगिक अपशिष्टों के कारण नदियाँ गंभीर रूप से प्रदूषित हैं।
    • आर्सेनिक एवं फ्लोराइड से भूजल प्रदूषण कई राज्यों में एक गंभीर समस्या बना हुआ है।

आगे की राह

  • ग्राम स्तर पर जल बजट निर्धारण का संस्थानीकरण: चूँकि संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत जल राज्य सूची का विषय है, अतः राज्यों को ग्राम पंचायत एवं जलग्रहण क्षेत्र स्तर पर जल बजट निर्धारण को संस्थागत स्वरूप प्रदान करना चाहिए, जिससे सहभागी एवं साक्ष्य-आधारित जल शासन को सुदृढ़ किया जा सके।
  • फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में अधिक जल-आधारित फसलों की खेती को कम करते हुए फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • भूजल विनियमन को सुदृढ़ बनाना: जलभृत मानचित्रण
    • भूजल पुनर्भरण उपाय
    • सामुदायिक भागीदारी
    • के माध्यम से भूजल प्रबंधन को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • आधुनिक जल सूचना प्रणाली का विकास: वास्तविक समय आधारित जल आँकड़ा संग्रहण, डिजिटल निगरानी तथा GIS-आधारित नियोजन उपकरणों का व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए।
  • जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना का निर्माण: बाढ़, सूखा तथा वर्षा की अनिश्चितता जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए जलवायु-सहिष्णु जल अवसंरचना का विकास आवश्यक है।

निष्कर्ष

  • जल बजट निर्धारण ग्रामीण जल सुरक्षा सुनिश्चित करने, भूजल दोहन को नियंत्रित करने तथा जल संसाधनों के सतत एवं न्यायसंगत उपयोग को प्रोत्साहन देने का एक प्रभावी साधन है। सहभागी शासन, वैज्ञानिक योजना निर्माण तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी के समन्वित उपयोग के माध्यम से भारत जल-सुरक्षित एवं जलवायु-सहिष्णु ग्रामीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति कर सकता है।

Source: PIB

 

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