पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- देशभर के ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले का भंडार अनुशंसित स्तर के आधे से भी कम हो गया है। इनमें 50 संयंत्रों को “अत्यंत निम्न” कोयला भंडार वाले संयंत्रों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
मुख्य बिंदु
- इन 50 ताप विद्युत संयंत्रों की कुल संयुक्त क्षमता लगभग 224 GW है। इनमें कोयले का भंडार 28.2 मिलियन टन (MT) था, जबकि निर्धारित आवश्यकता 58.7 MT थी। यह निर्धारित मानक आवश्यकता का केवल 48% है।
- उपलब्ध कोयला भंडार 85% प्लांट लोड फैक्टर (PLF) पर लगभग 9 दिनों की खपत के बराबर था, जबकि सामान्य आवश्यकता लगभग 19 दिनों की होती है।
- जब किसी विद्युत संयंत्र में कोयले का भंडार उसके निर्धारित मानक भंडार की 25% आवश्यकता से नीचे चला जाता है, तो उसे कोयला-भंडार की कमी से प्रभावित माना जाता है।
भारत में कोयला उत्पादन
- भारत के पास विश्व के पाँचवें सबसे बड़े कोयला भंडार हैं और वह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उपभोक्ता है। अतः देश की ऊर्जा आवश्यकताओं में कोयले पर अत्यधिक निर्भरता बनी हुई है।
- वर्तमान वित्तीय वर्ष में जुलाई तक संचयी कोयला उत्पादन 302.04 MT रहा, जबकि कुल कोयला प्रेषण में वर्ष-दर-वर्ष लगभग 6% की वृद्धि होकर यह 354.7 MT हो गया।
- विभिन्न चरणों में उपलब्ध कोयला भंडार में ताप विद्युत संयंत्रों के पास 34.55 MT तथा खदान-मुखों (pitheads) पर अथवा परिवहन के दौरान लगभग 113 MT कोयला शामिल था। इस प्रकार कुल संयुक्त भंडार लगभग 148 MT था।
- लगभग 230.8 GW की स्थापित क्षमता वाले कोयला एवं लिग्नाइट आधारित विद्युत संयंत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
कोयला भंडार में कमी के कारण
- कम एवं असमान वर्षा: कम और असमान वर्षा के कारण विशेष रूप से वातानुकूलन के अधिक उपयोग से विद्युत की माँग बढ़ी है।
- शीतलन की बढ़ी हुई माँग: रात के समय भी शीतलन की माँग अधिक बनी हुई है, जब सौर ऊर्जा का उत्पादन उपलब्ध नहीं होता। इससे ताप विद्युत उत्पादन पर निर्भरता बढ़ जाती है।
- मानसून का प्रभाव: मानसून का मौसम प्रत्येक वर्ष कोयला खनन, परिवहन तथा रेल नेटवर्क के माध्यम से कोयले की आवाजाही को प्रभावित करता है।
- कम वर्षा: मानसून अवधि के दौरान भारत में सामान्य से लगभग 12% कम वर्षा हुई, जिससे कोयला आधारित विद्युत उत्पादन पर निर्भरता बढ़ गई।
सरकार की पहल
- ताप विद्युत संयंत्रों के लिए कोयला भंडार संबंधी आवश्यकताएँ कई वर्षों से लागू हैं।
- वर्तमान केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) का ढाँचा दिसंबर 2021 में प्रभावी हुआ। इसमें ईंधन सुरक्षा और भंडार नियोजन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से संशोधित तथा संयंत्र-विशिष्ट कोयला भंडारण मानदंड लागू किए गए।
- वर्ष 2025 में अनुमोदित संशोधित SHAKTI (भारत में कोयले के पारदर्शी तरीके से दोहन और आवंटन की योजना) नीति के अंतर्गत कोयला-लिंकेज आवंटन को दो विंडो में सुव्यवस्थित किया गया है।
- विंडो I: केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली विद्युत उत्पादन कंपनियों तथा राज्य विद्युत उपयोगिताओं को अधिसूचित कीमतों पर कोयला लिंकेज प्रदान करती है।
- विंडो II: आयातित कोयले पर आधारित संयंत्रों सहित अन्य पात्र उत्पादकों को अधिसूचित कीमत से अधिक प्रीमियम पर नीलामी के माध्यम से कोयला खरीदने की अनुमति देती है।
- अंतर-मंत्रालयी समन्वय: कोयला, विद्युत और रेल मंत्रालय कोयले की आपूर्ति की निगरानी तथा विद्युत संयंत्रों तक उसकी आवाजाही को सुगम बनाने के लिए नियमित रूप से समन्वय करते हैं, विशेषकर आपूर्ति में व्यवधान की अवधि के दौरान।
- वाणिज्यिक कोयला खनन: उत्पादन, दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के उद्देश्य से कोयला खनन क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया है।
- कोयला मित्र पोर्टल: विद्युत संयंत्रों के लिए लचीले कोयला आवंटन की सुविधा प्रदान करने हेतु विकसित किया गया है, जिससे कोयले की आपूर्ति का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके।
आगे की राह
भारत में हालिया कोयला-भंडार की स्थिति यह दर्शाती है कि चुनौती आवश्यक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर कोयले की कमी की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि उपलब्ध कोयले की आपूर्ति का कितनी दक्षता से आवंटन और परिवहन किया जाता है तथा उसे संयंत्र-स्तर पर पर्याप्त भंडार में कितनी प्रभावी ढंग से परिवर्तित किया जाता है।- चूँकि ताप विद्युत ग्रिड की स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी, इसलिए विश्वसनीय और निर्बाध विद्युत आपूर्ति बनाए रखने के लिए कोयला भंडारण मानदंडों के अनुपालन को सुदृढ़ करना तथा आपातकालीन परिस्थितियों में कोयले का समान एवं प्रभावी पुनर्वितरण सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।
कोयले का वर्गीकरण
- एन्थ्रेसाइट (Anthracite): यह कोयले की सर्वोत्तम गुणवत्ता है, जिसमें 80 से 95% तक कार्बन की मात्रा होती है। इसका ऊष्मीय मान सर्वाधिक होता है।
- यह जम्मू और कश्मीर में कम मात्रा में पाया जाता है।
- बिटुमिनस (Bituminous): इसमें 60 से 80% तक कार्बन की मात्रा तथा आर्द्रता की कम मात्रा होती है। इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है और इसका ऊष्मीय मान उच्च होता है।
- यह झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पाया जाता है।
- लिग्नाइट (Lignite): यह सामान्यतः भूरे रंग का होता है। इसमें 40 से 55% तक कार्बन की मात्रा होती है। इसमें आर्द्रता की मात्रा अधिक होती है, इसलिए जलने पर धुआँ उत्पन्न करता है।
- यह राजस्थान, लखीमपुर (असम) और तमिलनाडु में पाया जाता है।
- पीट (Peat): इसमें 40% से कम कार्बन की मात्रा होती है। इसका ऊष्मीय मान कम होता है और यह लकड़ी की तरह जलता है।
कोल इंडिया लिमिटेड (CIL)
- CIL, कोयला मंत्रालय के अधीन एक महारत्न सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (PSU) है।
- इसकी स्थापना नवंबर 1975 में हुई थी।
- मुख्यालय: कोलकाता।
- उत्पाद: CIL कोकिंग कोयला, अर्द्ध-कोकिंग कोयला, गैर-कोकिंग कोयला, धुला एवं संवर्धित कोयला, कोयला फाइन्स तथा कोक का उत्पादन करता है।
- CIL के अंतर्गत 21 प्रशिक्षण संस्थान और 76 व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र हैं।
- रणनीतिक महत्त्व: यह भारत के कुल घरेलू कोयला उत्पादन में 80% तथा कुल कोयला-आधारित विद्युत उत्पादन में 75% का योगदान देता है।
स्रोत: TH
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